अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ भाषार्थसहिता ॥
अपत्येषुवसेन्नित्यं ममत्वंयत्नतस्त्यजेत् ॥ ७७ ॥ नान्यस्यगेहेभुञ्जीत भुञ्जानोदोषभाग्भवेत् । कामंक्रोधंचलोभंच तथेर्ष्या'सत्यमेवच ॥ ७८ ॥ कुटीचकस्त्यजेत्सर्वं पुत्रार्थंचैवसर्वतः । भिक्षाटनादिकेऽशक्तो यतिःपुत्रेषुसंन्यसेत् ॥ ७९ ॥ कुटीचकइतिज्ञेयः परित्राट्त्यक्तबान्धवः। त्रिदण्डंकुण्डिकांचैव भिक्षाधारंतथैवच ॥ ८० ॥ सूत्रंतथैवगृह्णीयान्नित्यमेवबहूदकः । प्राणायामेप्यभिरतो गायत्रींसततंजपेत् ॥ ८१ ॥ विश्वरूपंहृदिध्यायन्नयेत्कालं जितेन्द्रियः । ईषत्कृतकषायस्य लिंगमाश्रित्यतिष्ठतः ॥ ८२ ॥ अन्नार्थंलिङ्गमुद्दिष्टं नमोक्षार्थमितिस्थितिः ।
अपने लड़कों ही में निश्चय बसे और यत्न से ममता को त्याग दे ॥ ७७ ॥ अन्य के घर में भोजन न करै क्योंकि दोष का भागी होता है और कामक्रोध लोभ ईर्ष्या, झूठ इन को छोड़ देवे ॥ ७८ ॥ पुत्र के लिये १ कुटीचक सब प्रकार से सब अन्नधनादि त्याग दे-भिक्षा मांगने आदि में असमर्थ हो तो संन्यासी अपने पुत्रों को ही अपना देह सौंपदे ॥ ७९ ॥ इस को कुटीचक कहते हैं-२ दूसरा त्याग दिये हैं बंधु जिसने ऐसा संन्यासी त्रिदंड-कुंडी और भिक्षा का पात्र ॥८० ॥ यज्ञोपवीत इन को बहूदक नित्य ग्रहण करै । प्राणायाम में तत्पर हुआ निरंतर गायत्री को जपे ॥ ८१ ॥ विश्व रूप भगवान् का हृदय में ध्यान करता हुआ इन्द्रियों को जीतकर काल को व्यतीत करै-कुछेक गेरुवा वस्त्रों को करके एक चिह्न (संन्यासकी पहचान) बनाकर अपने आश्रम में ठहरते हुए संन्यासी के ५२ ८२ ॥ चिन्ह अन्न भिक्षा मिलने के लिये नियत किये हैं मोक्ष के लिये कोई चिन्ह नहीं है ।