अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविष्णुस्मृतिः ॥ १५
त्यक्त्वापुत्रादिकंसर्वं योगमार्गव्यवस्थितः ॥८३॥
इन्द्रियाणिमनश्चैव कर्षन्हंसोभिधीयते ।
कृच्छ्रैश्चान्द्रायणैश्चैव तुलापुरुषसंज्ञकैः ॥ ८४ ॥
अन्यैश्चशोषयेद्देहमाकाङ्क्षन्ब्रह्मणःपदम् ।
यज्ञोपवीतंदंडंच वस्त्रंजंतुनिवारणम् ॥ ८५ ॥
अयं परिग्रहोनान्यो हंसस्यश्रुतिवेदिनः ।
आध्यात्मिकंब्रह्मजपन्प्राणायामांस्तथाचरन् ॥८६॥
वियुक्तःसर्वसंगेभ्यो योगी नित्यंचरेन्महीम् ।
आत्मनिष्ठःस्वयंयुक्तस्त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥ ८७ ॥
चतुर्थोयंमहानेषांध्यानभिक्षुरुदाहृतः ।
त्रिदण्डंकुण्डिकांचैव सूत्रंचाथकपालिकाम् ॥८८ ॥
जन्तूनांनिवारणंवस्त्रं सर्वंभिक्षुरिदंत्यजेत् ।
भा०-इस से सब पुत्रादि को त्याग और योगमार्ग में ठहर कर ॥४३॥ इन्द्रियां और मन को वश में करता हुआ संन्यासी हंस कहाता है। कृकू, चान्द्रायण, तुला पुरुष ॥८४॥ तथा अन्य व्रतों द्वारा ब्रह्मपद की इच्छा करता हुआ संन्यासी अपने देह को सुखादे-यज्ञोपवीत, दंड और जिस से जीव देह पर न गिरें ऐसा वस्त्र ॥ ८५ ॥ वेद के ज्ञाता हंस नामक संन्यासी को यही परिग्रह नाम वस्तुस्वीकार है अन्य नहीं। ४चौथा अध्यात्म नाम व्यापक प्रणव ब्रह्म को जपता और प्राणायामों को करता हुआ ॥ ८६ ॥ सब संगों से वियुक्त (रहित) अपने आपे में स्थित स्वयं युक्त हो कर सब स्वीकारों को त्यागने वाला योगी होकर पृथिवी पर नित्य विचरे ॥ ८७ ॥ यह चौथा इन चारों में बड़ा और ध्यान भिक्ष (परम हंस) कहा है। त्रिदंड-कुंडी-यज्ञोपवीत-(कपालिका) बड़े नारियल का आधा टुकड़ा वा खप्पर भिक्षा का पात्र ॥ ८८ ॥ जन्तुओं के निवारणार्थ वस्त्र इन सब को भी यह भिक्षु त्यागदे-कौपीन ओढने