भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१६ | भाषाधर्मसंहिता ॥

कोपोनाच्छादनार्थंच वासोऽद्यञ्चपरिग्रहेत् ॥ ८८ ॥
कुर्यात्परमहंसस्तु दण्डमेकंचधारयेत् ।
आत्मन्येवात्मनाबुद्ध्या परित्यक्तशुभाशुभः ॥९०॥
अव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्तश्च चरेद्भिक्षुःसमाहितः ।
प्राप्तपूजोनसंतुष्येदलाभेत्यक्तमत्सरः ॥ ९१ ॥
त्यक्ततृष्णःसदाविद्वान्मूकवत्पृथिवींचरेत् ।
देहसंरक्षणार्थंतु भिक्षामीहेद्द्विजातिषु ॥ ९२ ॥
पात्रमस्यभवेत्पाणिस्तेननित्यंगृहानटेत् ।
अतैजसानिपात्राणि भिक्षार्थंक्लृप्तवान्मनुः ॥९३॥
सर्वेषामेवभिक्षूणां दार्बलाबुमयानिच ।
कांस्यपात्रेनभुञ्जीत आपद्यपिकथंचन ॥९४॥
मलाशाःसर्वउच्च्यन्ते यतयःकांस्यभोजनाः ।


का वस्त्र इन का ही केवल धारण ॥ ८८ ॥ परम हंस करै और एक दण्ड का धारण करै और अपने मन में ही अपनी बुद्धि से त्याग दिया है शुभ और अशुभ कर्म जिसने ॥९०॥ ऐसा अपने चिन्ह को छिपा कर अप्रकट होकर सावधान हुआ विचरै पूजा ( बड़ाई ) की प्राप्ति से प्रसन्न न हो और आदर सत्कार न होने पर क्रोध न करै ॥ ९१ ॥ त्यागी है तृष्णा जिसने ऐसा ज्ञानी गूंगे के समान पृथिवी पर विचरै और देह की रक्षा के अर्थ द्विजातियों से भिक्षा मांगे ॥९२॥ भिक्षुक का पात्र हाथ है उसीसे नित्य गृहों में विचरै अर्थात् भिक्षा मांगे और मनु जी ने भिक्षा के लिये धातु से भिन्न काष्ठ तुंबा आदि के पात्र ॥९३॥ सब संन्यासियों को कहे हैं । और कांसे के पात्र में विपत्ति के समय भी संन्यासी लोग भोजन न करें ॥९४॥ कांसे के पात्र में खाने वाले सब संन्यासी मल ( विष्ठा ) के खाने वाले कहे हैं । कांसी के पात्र बनाने वाले को और