अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविष्णुस्मृतिः ॥ ९१
कांस्यकस्यतुयत्पापं गृहस्थस्यतथैवच ॥६५॥
कांस्यभोजीयतिःसर्वं तयोःप्राप्नोतिकिल्विषम् ।
ब्रह्मचारीगृहस्थश्च वानप्रस्थोयतिस्तथा ॥६६॥
उत्तमांवृत्तिमाश्रित्य पुनरावर्त्तयेद्यदि ।
आरूढपतितोज्ञेयः सर्वधर्म्मबहिष्कृतः ॥६७॥
निन्द्यश्चसर्वदेवानां पितॄणांचतथोच्यते।
त्रिदण्डंलिङ्गमाश्रित्य जीवन्तिबहवोद्विजाः ॥६८॥
नतेषामपवर्गोस्ति लिङ्गमात्रोपजीविनाम् ।
त्यक्त्वालोकांश्चवेदांश्च विषयानिन्द्रियाणिच ॥६९॥
आत्मन्येवस्थितोयस्तु प्राप्नोतिपरमंपदम् ।
इति० वैष्ण० धर्म्म० चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
राज्ञांतुपुण्यवृत्तानां त्रिवर्गपरिकाङ्क्षिणाम् ॥१००॥
उस में भोजन कराने वाले गृहस्थ को जो पाप होता है ॥६५॥ उन दोनों के उस पाप को काँसे के पात्र में भोजन करने वाला संन्यासी प्राप्त होता है । जो ब्रह्मचारी-गृहस्थ-वानप्रस्थ और संन्यासी इन में से कोई भी ॥६६॥ उत्तम आचरण नियम व्रत को स्वीकार कर फिर उसका त्याग करता है उसे आरूढ पतित कहते वह सब धर्मों से बहिष्कृत ( बाह्य ) ॥६७॥ वह सब देवता और पितरों में निन्दित कहा है । संन्यास वेष का आश्रय लेकर बहुत से ब्राह्मण संसार में जीविका करते पुजाते हैं ॥ ६८ ॥ वेषमात्र से जीविका करने वाले उन का मोक्ष नहीं होता-और जो लोक-वेद, विषय, इन्द्रिय, इन सम्बन्धी सब भोगों वा विषयों को त्याग कर ॥६९॥ अपने आत्मा में ही स्थित रहता है वह परमपद को प्राप्त होता है ॥
इति वैष्णवे धर्मशास्त्रे ४ अध्यायः ॥
पवित्र है आचार जिन का ऐसे धर्म अर्थ काम के अभिलाषी राजाओंका ॥१००॥