अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ भाषार्थसहिता ॥
वक्ष्यमाणन्तु यो धर्मस्तत्त्वतस्तन्निबोधत । तेजः सत्यं धृतिर्दाक्ष्यं संग्रामेष्वनिवर्तिता ॥१०१॥ दानमीश्वरभावश्च क्षत्रधर्मः प्रकीर्तितः । क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानांपरिपालनम् ॥१०२॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षयेन्नृपतिः प्रजाः । त्रीणि कर्माणि कुर्वीत राजन्यस्तु प्रयत्नतः ॥१०३॥ दानमध्ययनं यज्ञं ततो योगनिषेवणम् । ब्राह्मणानांच सन्तुष्टिमाचरेत्सततंतथा ॥१०४॥ तेषु तुष्टेषु नियतं राज्यं कोशश्च वर्द्धते । वाणिज्यं कर्पणंचैव गपांच परिपालनम् ॥ १०५ ॥ ब्राह्मणक्षत्रसेवाच वैश्यकर्म प्रकीर्तितम् । खलयज्ञं कृषीजांच गोयज्ञंचैव यत्नतः ॥ १०६ ॥ कुर्याद्वैश्यश्च सततं गपांच शरणंतथा ।
जो धर्म, उस को हम कहते हैं तुम सुनो। तेज, सत्य, धैर्य दक्षता (चतुराई) संग्राम से न भागना ॥१०१॥ दान देना, ईश्वरता (सबाये हुकूमत करना) यह क्षत्रिय का धर्म कहा है। प्रजाओं को पालना करना क्षत्रियों का परमधर्म है ॥१०२॥ इस से सब यत्न से राजा प्रजाओं की रक्षा करे और क्षत्रिय बड़े यत्न से तीन कामों को करे कि ॥१०३॥ दान-पढ़ना-यज्ञ और फिर योगमार्ग का सेवन और ब्राह्मणों को निरन्तर सदा प्रसन्न सन्तुष्ट करने का उद्योग करता रहे ॥१०४॥ उनके प्रसन्न हुये पर राजा का राज्य और कोश (खज़ाना) बढ़ता है। ब्यवह० (लेन देन) कृषि गौओं को पालना ॥१०५॥ ब्राह्मण और क्षत्रिय की सेवा ये कर्म वैश्य के कहे हैं। और कृषि (खेती) के खलियान के यज्ञ और गौओं के रक्षार्थ यज्ञ को ॥१०६॥ और गौओं के शरण (घर) इन को वैश्य निरन्तर करे और गूढ़ ईर्ष्या को त्याग कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इन की