अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
३२ भाषार्थसहिता ॥
वक्ष्यमाणन्तु यो धर्मस्तत्त्वतस्तन्निबोधत । तेजः सत्यं धृतिर्दाक्ष्यं संग्रामेष्वनिवर्तिता ॥१०१॥ दानमीश्वरभावश्च क्षत्रधर्मः प्रकीर्तितः । क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानांपरिपालनम् ॥१०२॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षयेन्नृपतिः प्रजाः । त्रीणि कर्माणि कुर्वीत राजन्यस्तु प्रयत्नतः ॥१०३॥ दानमध्ययनं यज्ञं ततो योगनिषेवणम् । ब्राह्मणानांच सन्तुष्टिमाचरेत्सततंतथा ॥१०४॥ तेषु तुष्टेषु नियतं राज्यं कोशश्च वर्द्धते । वाणिज्यं कर्पणंचैव गपांच परिपालनम् ॥ १०५ ॥ ब्राह्मणक्षत्रसेवाच वैश्यकर्म प्रकीर्तितम् । खलयज्ञं कृषीजांच गोयज्ञंचैव यत्नतः ॥ १०६ ॥ कुर्याद्वैश्यश्च सततं गपांच शरणंतथा ।
जो धर्म, उस को हम कहते हैं तुम सुनो। तेज, सत्य, धैर्य दक्षता (चतुराई) संग्राम से न भागना ॥१०१॥ दान देना, ईश्वरता (सबाये हुकूमत करना) यह क्षत्रिय का धर्म कहा है। प्रजाओं को पालना करना क्षत्रियों का परमधर्म है ॥१०२॥ इस से सब यत्न से राजा प्रजाओं की रक्षा करे और क्षत्रिय बड़े यत्न से तीन कामों को करे कि ॥१०३॥ दान-पढ़ना-यज्ञ और फिर योगमार्ग का सेवन और ब्राह्मणों को निरन्तर सदा प्रसन्न सन्तुष्ट करने का उद्योग करता रहे ॥१०४॥ उनके प्रसन्न हुये पर राजा का राज्य और कोश (खज़ाना) बढ़ता है। ब्यवह० (लेन देन) कृषि गौओं को पालना ॥१०५॥ ब्राह्मण और क्षत्रिय की सेवा ये कर्म वैश्य के कहे हैं। और कृषि (खेती) के खलियान के यज्ञ और गौओं के रक्षार्थ यज्ञ को ॥१०६॥ और गौओं के शरण (घर) इन को वैश्य निरन्तर करे और गूढ़ ईर्ष्या को त्याग कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इन की
विष्णुस्मृतिः ॥ १८
ब्राह्मणक्षत्रवैश्यांश्च चरन्नित्यममत्सरः ॥ १०७ ॥
कुर्वंस्तुशूद्रःशुश्रूषां लोकान्जयतिधर्मतः ।
पंचयज्ञविधानंतु शूद्रस्यापि विधीयते ॥ १०८ ॥
तस्यप्रोक्तोनमस्कारः कुर्वन्नित्यंनहीयते ।
शूद्रोपिद्विविधोज्ञेयः श्राद्धीचैवेतरस्तथा ॥ १०९ ॥
श्राद्धीभोज्यस्तयोरुक्तो ह्यभोज्यस्त्वतरोमतः ।
प्राणानर्थांस्तथादारा-न्ब्राह्मणार्थंनिवेदयेत् ॥ ११० ॥
सशूद्रजातिर्भोज्यः स्या-दभोज्यःशेषउच्यते ।
कुर्याच्छूद्रस्तुशुश्रूषां ब्रह्मक्षत्रविशांक्रमात् ॥ १११ ॥
कुर्यादुत्तरयोर्वैश्यः क्षत्रियोब्राह्मणस्यतु ।
आश्रमास्तुत्रयःप्रोक्ता वैश्यराजन्ययोस्तथा ॥ ११२ ॥
पारिव्राज्याश्रमप्राप्ति-र्ब्राह्मणस्यैवचोदिता ।
नित्य सेवा करे ॥१०७॥ क्योंकि इन की शुश्रूषा को धर्म से करता हुआ शूद्र लोक ( स्वर्गादि ) को जीतता ( प्राप्त होता ) है और पंचयज्ञ का करना शूद्र को भी कहा है ॥ १०८ ॥ उस शूद्र को देवता के नामान्त में नमः लगा कर नाम मन्त्रों से पञ्च यज्ञ करने चाहिये जैसे ( अग्नयेनमः ) इत्यादि इस प्रकार नित्य २ करता हुआ शूद्र पतित नहीं होता—शूद्र भी दो प्रकार का है एक श्राद्ध का अधिकारी और दूसरा अनधिकारी ॥ १०९ ॥ उन दोनों में से श्राद्धके अधिकारी का भोजन करना चाहिये--और अनधिकारी का नहीं जो शूद्र अपने प्राण-धन, स्त्री इत्यादि सब ब्राह्मण को समर्पण करदे ॥ ११० ॥ वह शूद्र भोजन करने योग्य है और शेष शूद्र का अन्न अभोज्य है । और शूद्र क्रम से ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य--इन की सेवा करे ॥१११॥ वैश्य ब्राह्मण क्षत्रिय की सेवा करे और क्षत्रिय, ब्राह्मण की ही सेवा करे । वैश्य और क्षत्रिय इन के तीन आश्रम कहे हैं । अर्थात् ब्रह्मचर्य-गृहस्थ, वानप्रस्थ ॥ ११२ ॥ और संन्यास
२० भाषार्थसहिता ॥
आश्रमानामयं प्रोक्तो मयाधर्मः सनातनः ॥ ११३ ॥
यदत्राविदितंकिंचित्तदन्येभ्योगमिष्यथ ॥
इति विष्णुप्रोक्तं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥
आश्रम की प्राप्ति केवल ब्राह्मण को ही कही है—यह चारो आश्रमों का सनातन धर्म हमने कहा ॥ ११३ ॥ जो कुछ इस ग्रन्थ में तुमने नहीं जाना उस को अन्य धर्म शास्त्र ग्रन्थों से जान जाओगे ॥
इति वैष्णवधर्मशास्त्रभाषासमाप्ता ॥
अथ हारीतस्मृतिः
येवर्णाश्रमधर्मस्थास्तेभक्ताःकेशवं प्रति ।
इतिपूर्वंत्वयाप्रोक्तं भूर्भुवःस्वर्द्विजोत्तमाः ॥ १ ॥
वर्णानामाश्रमाणाञ्च धर्मान्नोब्रूहिसत्तम ।
येनसन्तुष्यतेदेवो नारसिंहःसनातनः ॥ २ ॥
अत्राहंकथयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम् ।
ऋषिभिःसहसंवादं हारीतस्यमहात्मनः ॥ ३ ॥
हारीतंसर्वधर्मज्ञमासीनमिवपावकम् ।
प्रणिपत्याऽब्रुवन्सर्वे मुनयोधर्मकाङ्क्षिणः ॥ ४ ॥
भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्त्तक ।
वर्णानामाश्रमाणांच धर्मान्नोब्रूहिभार्गव ॥ ५ ॥
समासाद्योगशास्त्रंच विष्णुभक्तिकारंपरम् ।
भा०:–जो वर्ण तथा आश्रम के धर्ममें स्थित तीनों लोक के ब्राह्मण हैं वे केशव भ-
गवान् के भक्त होते हैं यह प्रथम तुमने कहा था– ॥ १ ॥ अब हे पुरुषों में
श्रेष्ठ जिस से सनातन नरसिंह देव प्रसन्न हों उन वर्ण आश्रम के धर्मों को क-
हो ॥ २ ॥ इस विषय में उत्तम पुरातन वृत्तान्त हम कहेंगे कि जो हारीत म-
हात्मा के संग ऋषियों का संवाद हुआ है ॥ ३ ॥ तपोबल से अग्नि के स-
मान तेजस्वी–बैठे हुए सब धर्मों के मर्म ज्ञाता–हारीत से धर्म के अभिलाषी
सम्पूर्ण मुनि नमस्कार करके बोले कि ॥ ४ ॥ हे भगवन् हे सब धर्मों के जानने
वाले–हे सब धर्मों के प्रवर्त्तक और हे भृगुवंश में उत्पन्न ! वर्ण और आश्रमों के
धर्मों को हम से कहिये ॥ ५ ॥ जो विष्णु भगवान् में उत्तम भक्ति प्रकट करने
२ भाषाधर्मसंहिता ॥
एतच्चान्यच्चभगवन् ब्रूहिनःपरमोगुरुः ॥ ६ ॥ हारीतस्तानुवाचाथ तैरैवंचोदितोमुनिः । शृण्वन्तुमुनयःसर्वे धर्म्मान्वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥७॥ वर्णानामाश्रमाणांच योगशास्त्रंचसत्तमाः । सन्धार्थमुच्यतेमर्त्यो जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ८ ॥ पुरादेवोजगत्स्रष्टा परमात्माजलोपरि । सुष्वापभोगिपर्य्यंके शयनेतुश्रियासह ॥ ९ ॥ तस्यसुप्तस्यनाभौतु महत्पद्ममभूत्किल । पद्ममध्येऽभवद्ब्रह्मा वेदवेदांगभूषणः ॥ १० ॥ सचोक्तोदेवदेवेन जगत्सृजपुनःपुनः ।
वाला योगशास्त्र है उस को और हे भगवन् अन्य उत्तम उपदेश को संक्षेप से कहो क्यों कि तुम हमारे परम गुरु हो ॥ ६ ॥ उन मुनियों के इस प्रकार प्रेरणा करने पर हारीत मुनि उन से बोले कि हे सम्पूर्ण मुनियो ! सुनो मैं सनातन धर्मों को कहता हूं ॥ ७ ॥ वर्ण तथा आश्रमों के धर्म और योगशास्त्र को भली प्रकार जान कर मनुष्य संसार के बन्धन से छूट जाता है ॥ ८ ॥ पूर्व प्रलय समय में जगत् के रचने वाले देव परमात्मा जलों के ऊपर शेष शय्या पर लक्ष्मी सहित सोये ॥९ ॥ सोते हुये उन की नाभि से महान् (बड़ा) कमल हुआ उस पद्म के बीच वेद और वेदांगों के भूषण ब्रह्मा जी प्रकट हुए ॥१०॥ उन को देवों के देव परब्रह्म ने वारंवार यह कहा कि तुम जगत् को रचो।
वि० (९ । १०) आकाश मण्डल में निराधार रहने वाला जल यहां लेना उचित है उसी जल पर नौका स्थानीय वा आधार भूत जो सामान था वही शय्या है प्रलय के समय भगवान् लक्ष्मी वा स्त्री शक्ति रूप प्रकृति को अपन में लीन कर विश्राम करते हैं । जब संसार रचने का समय आता है तब स्वयमेव भगवान् के नाभि नाम मध्य भाग में कमलाकार अण्ड पैदा होता उसी के बीच ब्रह्मा जी होते हैं जो आगे सब सृष्टि को बनाते हैं ।
हारीतस्मृतिः ॥
सोपिसृष्ट्वाजगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ११ ॥
यज्ञसिद्ध्यर्थमनघान् ब्राह्मणान्मुखतोऽसृजत् ।
असृजत्क्षत्रियान्बाह्वोर्वैश्यानप्यूरुदेशतः ॥ १२ ॥
शूद्रांश्चपादयोःसृष्ट्वा तेषांचैवानुपूर्वशः ।
यथाप्रोवाचभगवान् ब्रह्मयोनिःपितामहः ॥ १३ ॥
तद्वचःसंप्रवक्ष्यामि शृणुतद्विजसत्तमाः ।
धन्यंयशस्यमायुष्यंस्वर्ग्यंमोक्षफलप्रदम् ॥ १४ ॥
ब्राह्मण्यांब्राह्मणेनैव ह्युत्पन्नोब्राह्मणःस्मृतः ।
तस्यधर्म्मं प्रवक्ष्यामि तद्योग्यंदेशमेवच ॥ १५ ॥
कृष्णसारोमृगोयत्र स्वभावेनप्रवर्त्तते ।
तस्मिन्देशेवसेद्धर्माः सिद्ध्यन्तिद्विजसत्तमाः ॥ १५॥
षट्कर्माणिर्निजान्याहु-र्ब्राह्मणस्यमहात्मनः ।
तैरेवसततंयस्तु वर्तयेत्सुखमेधते ॥ १६ ॥
अध्यापनंचाध्ययनं याजनंयजनंतथा ।
उन ब्रह्माजी ने भी देवता, असुर, मनुष्य, इन सहित संपूर्ण जगत् को रचकर ॥ ११ ॥ यज्ञ की सिद्धि के लिये पाप रहित तपस्वी ऋषि/ब्राह्मणों को मुख से। क्षत्रियों को भुजाओं से। वैश्यों को जंघाओं से/१२ और शूद्रों को चरणों से उत्पन्न किया।। इस क्रम से उन चारों को रच कर भगवान् ब्रह्मयोनि (ब्रह्मा) जी ने यह वचन कहा कि॥ १३॥ हे ब्रह्मर्षि लोगो ! उस वचन को मैं कहता हूं तुम सुनो और वह वचन धन, यश, अवस्था, स्वर्ग तथा मोक्षफल देनेवाला है॥१४॥ब्राह्मण पिता सेजो ब्राह्मणी माता में पैदा हो उसे ब्राह्मण कहते हैं उसका धर्म और उस के निवास के योग्य देश को हम कहेंगे ॥ १५ ॥
काला मृग जिस में स्वभाव से विचरता हो उस देश में ब्राह्मण बसे और उसी देश में किया धर्म, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! सिद्ध नाम सुफल होता है॥१६॥
महात्मा ब्राह्मणों के छः कर्म निज के हैं उन्हीं कर्मों सहित जो निरंतर व-
४ भाषार्थसहिता ॥
दानंप्रतिग्रहश्चेति षट्कर्माणीतिचोच्यते ॥ १७ ॥
अध्यापनञ्चत्रिविधं धर्म्मार्थमृक्थकारणात् ।
शुश्रूषाकरणंचेति त्रिविधंपरिकीर्तितम् ॥ १८ ॥
एषामन्यतमाभावे वृथाचारोभवेद्विजः ।
तत्रविद्यानदातव्या पुरुषेणहितैषिणा ॥ १९ ॥
योग्यानध्यापयेच्छिष्या=नयोग्यानपिवर्जयेत् ।
विदितात्प्रतिगृह्णीयाद् गृहेधर्मप्रसिद्धये ॥ २० ॥
वेदञ्चैवाभ्यसेन्नित्यं शुचौदेशेसमाहितः ।
धर्म्मशास्त्रंतथापाठ्यंब्राह्मणैःशुद्धमानसैः ॥ २१ ॥
वेदवत्पठितव्यंच श्रोतव्यंचदिवानिशि ।
स्मृतिहीनायविप्राय श्रुतिहीनेतथैवच ॥ २२ ॥
दानंभोजनमन्यच्च दत्तंकुलविनाशनम् ।
संतान रहे वह सुख से बढ़ता है अर्थात् धन पुत्रवान् होता है ॥१६॥वेदका पढ़ाना पढ़ना-द्विजों को यज्ञ कराना और स्वयं यज्ञ करना-सुपात्र को दान देना और प्रतिग्रह (दान) लेना ये छः कर्म कहे हैं ॥१७॥ वेदादिशास्त्र का पढ़ाना भी तीन प्रकार का है १ धर्म के अर्थ २ धन को लेकर और ३ सेवा के लिये ॥ १८ ॥ इन तीनों में से जिस शिष्य में धर्मादि एक भी न हो उस के पढ़ाने से ब्राह्मण वृथाचारी होता है ऐसे शिष्य को अपने हित का अभिलाषी पुरुष विद्या न दे ॥ १९ ॥ योग्य शिष्यों को पढ़ावे और अयोग्यों को वर्जेदे और गृहस्थ धर्म के निर्वाहार्थ प्रसिद्ध पुरुष (धनी) से प्रतिग्रह ले ॥२०॥ शुद्ध देश में सावधान होकर वेदका अभ्यास करे और शुद्ध मनवाले ब्राह्मणों को धर्म शास्त्र भी पढ़ना चाहिये ॥२१॥वेद के समान धर्म शास्त्र को भी प्रतिदिन पढ़ना और सुनना चाहिये, स्मृति नाम धर्मशास्त्र श्रुति वेद इन दोनों से हीन ब्राह्मण को॥२२॥ दान-भोजन-और अन्य जो दिया जाय वह कुलको नष्टकरता है।इस से
हारीतस्मृतिः ॥
५
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन धर्मशास्त्रं पठेद्द्विजः ॥ २३॥
श्रुतिस्मृतीचविप्राणां चक्षुषीदेवनिर्म्मिते ।
काणस्तत्रैकयाहीनो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ॥२४॥
गुरुशुश्रूषणञ्चैव यथान्यायमतन्द्रितः ।
सायंप्रातरुपासीत विवाहाग्निंद्विजोत्तमः ॥२५॥
सुस्नातस्तुप्रकुर्वीत वैश्वदेवंदिनेदिने ।
अतिथीनागतांश्छक्त्यापूजयेदविचारतः ॥ २६ ॥
अन्यानभ्यागतान्विप्रान्पूजयेच्छक्तितोगृही ।
स्वदारनिरतोनित्यं परदारविवर्जितः ॥ २७ ॥
कृतहोमस्तुभुञ्जीत सायंप्रातरुदारधीः ।
सत्यवादीजितक्रोधो नाधर्मेवर्त्तयन्मतिम् ॥२८॥
स्वकर्मणिचसंप्राप्ते प्रमादान्ननिवर्त्तते ।
सब यत्न से ब्राह्मण धर्म शास्त्र को अवश्य पढ़े ॥२३॥ श्रुति स्मृति ये दोनों परमेश्वर के रचे हुये ब्राह्मणों के नेत्र हैं इन दोनों में से जो एक से हीन है वह काणा, और दोनों से हीन को अंधा कहा है ॥ २४ ॥ आलस्य को त्याग कर गुरु की सेवा करे और ब्राह्मण सायं प्रातः काल विवाहाग्नि ( जिस में विवाह का होम हो फिर अपने घर लाकर जीवन पर्यन्त बनाये रक्खे ) की उपासना ( उसी में स्मार्त्त होम ) करै ॥ २५ ॥ भले प्रकार स्नान करके प्रति दिन बलिवैश्व देव करै तथा आये हुए विरक्त अतिथियों को बिना विचारे शक्ति के अनुसार पूजे ॥२६॥ और अन्य गृहस्थ ब्राह्मणादि अभ्यागतों को भी गृहस्थी ब्राह्मण शक्ति के अनुसार पूजे तथा अपनी स्त्री से ही सदा प्रेम रक्खे पर स्त्री को वर्ज दे ॥ २७ ॥ उदार बुद्धि वाला ब्राह्मण साय प्रातःकाल के समय अग्निहोत्र करके भोजन करे। सत्य बोले, क्रोध को जीते तथा अधर्म में बुद्धि को कभी न लगावे ॥ २८ ॥ अपने सन्ध्यादि कर्म के समय में प्रमाद से कर्म को न छोड़े । सत्य सब की हितकारिणी और परलोक में अ-
६ भाषार्थसहित
सत्यांहितांवदेद्वाचं परलोकाहितैषिणीम् ॥ २९ ॥
एषधर्म्मःसमुद्दिष्टो ब्राह्मणस्यसमासतः ।
धर्ममेवहियःकुर्यात्सयातिब्रह्मणःपदम् ॥ ३० ॥
इत्येषधर्मःकथितोमयायं पृष्टोभवद्भिस्त्वखिलाघहारी ।
वदामिराज्ञामपिचैवधर्म्मान्पृथक्पृथग्बोधतविप्रवर्याः ॥३१॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
क्षत्रादीनांप्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्व्वशः ।
येषुप्रवृत्ताविधिना सर्वेयान्तिपरांगतिम् ॥१॥
राज्यस्थःक्षत्रियश्चापि प्रजाधर्मेणपालयन् ।
कुर्यादध्ययनंसम्यग् यजेद्यज्ञान्यथाविधि ॥२॥
दद्याद्दानंद्विजातिभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः ।
स्वभार्यानिरतोनित्यं षड्भागार्हःसदानृपः ॥३॥
नीतिशास्त्रार्थकुशलः सन्धिविग्रहतत्त्ववित् ।
पना हित करने वाली वाणी को बोला करे ॥ २९ ॥ यह धर्म ब्राह्मण का संक्षेप से कहा, जो ब्राह्मण धर्म को ही करता है वह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! जो धर्म तुमने मुझे पूछा था संपूर्ण पापों का ना-शक वह यह धर्म हमने कहा और राजाओं के भी पृथक् २ धर्मों को कहते हैं तुम सुनो ॥ ३१ ॥
इति हारीते धर्म शास्त्रे १ अध्याय भाषा समाप्त।
अब क्षत्रियादि के धर्म को यथार्थ क्रम से हम कहते हैं कि जिन धर्मों को विधि से करते हुए (क्षत्रियादि) परमगति को प्राप्त होते हैं ॥१॥ राज्य पदवी पर स्थित धर्म से प्रजा की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय भी वेद पढ़े और विधिपूर्वक यज्ञ करे ॥२॥ जो राजा धर्मानुकूल बुद्धि करके ब्राह्मणों को दान दे और अपनी स्त्री में ही प्रेम रक्खे वेश्यादि से सदा बचे ऐसा राजा सदैव प्रजा से षष्ठांश कर लेने योग्य होता है ॥३॥ नीतिशास्त्र में कुशल और सन्धि
हारीतस्मृतिः ॥ ९
देवब्राह्मणभक्तश्च पितृकार्यपरस्तथा ॥४॥
धर्मेणयजनंकार्य मधर्मपरिवर्जनम् ।
उत्तमाङ्गतिमाप्नोति क्षत्रियोऽप्येवमाचरन् ॥५॥
गोरक्षांकृषिवाणिज्यं कुर्याद्वैश्योयथाविधि ।
दानंदेयंयथाशक्त्या ब्राह्मणानांचभोजनम् ॥६॥
दम्भमोहविनिर्मुक्तः सत्यवागनसूयकः ।
स्वदारनिरतोदान्तः परदारविवर्जितः ॥७॥
धनैर्विप्रान्भोजयित्वा यज्ञकालेतुयाजकान् ।
अवसुत्वेन्नवर्तेत धर्मेवादेहपातनात् ॥८॥
यज्ञाध्ययनदानानि कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ।
पितृकार्यपरश्चैव नरसिंहार्चनापरः ॥९॥
एतद्वैश्यस्यधर्मोयं स्वधर्ममनुतिष्ठति ।
( मेल ) विग्रह ( फूट ) इन के भी तत्त्व को राजा जाने देवता और ब्राह्मणों में भक्ति रक्खे और पितरों के कार्य ( श्राद्ध आदि ) में भी तत्पर रहै ॥ ४ ॥
धर्म से यज्ञ करना और अधर्म को त्यागना इस प्रकार आचरण करता हुआ क्षत्रिय भी उत्तम गति को प्राप्त होता है ॥५॥
वैश्य के धर्म–गौओं की रक्षा खेती–व्यापार (लेन देन) इन कामों को वैश्य विधि से करे । यथाशक्ति दान देना और ब्राह्मणों को भोजन कराना ॥ ६ ॥
अविद्यारूप दम्भ तथा मोह का त्यागी और वाणी से सत्य बोले ईर्ष्या को न करे अपनी स्त्री में रत रहे और पराई स्त्री का सदा परित्याग करे ॥ ७ ॥
धन से ब्राह्मणों को और यज्ञ के समय ऋत्विजों को जिमा ( तृप्त ) करके मरण पर्यन्त धर्म के कार्यों में अपनी हुकूमत किसी को न दिखलावे ॥ ८ ॥
प्रतिदिन आलस्य को छोड़ कर यज्ञ, वेदाध्ययन, तथा दान करे । पितरों के कार्य ( श्राद्ध आदि ) और नरसिंह भगवान् के पूजन में तत्पर रहे ॥ ९ ॥
यह वैश्य का धर्म है इस को जो करता है और इस के अनुसार चलता है वह स्वर्ग में जाता है इस में संशय
भाषार्थसहिता ॥
एतदाचरतेयोहि सस्वर्गीनात्रसंशयः ॥१०॥
वर्णत्रयस्यशुश्रूषां कुर्याच्छूद्रःप्रयत्नतः ।
दासवद्ब्राह्मणानाञ्च विशेषेणसमाचरेत् ॥११॥
अयाचितप्रदाताच कष्टंवृत्त्यर्थमाचरेत् ।
पाकयज्ञविधानेन यजेद्देवमतन्द्रितः ॥१२॥
शूद्राणामधिकंकुर्यादर्च्चनंन्यायवर्त्तिनाम् ।
धारणंजीर्णवस्त्रस्य विप्रस्योच्छिष्टभोजनम् ॥ १३ ॥
स्वदारेषुरतिश्चैव परदारविवर्जनम् ।
इत्थंकुर्यात्सदाशूद्रो मनोवाक्कायकर्मभिः ।
स्थानमैन्द्रमवाप्नोति नष्टपापःसुपुण्यकृत् ॥ १४ ॥
वर्णेषुधर्म्माविविधामयोक्ता यथातथाब्रह्ममुखेरिताः पुरा ।
शृणुध्वमत्राश्रमधर्म्ममाद्यं मयोच्यमानंक्रमशोमुनीन्द्राः॥१५॥
इति हारीते धर्म्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
नहीं ॥ १० ॥ शूद्र के धर्म-तीनों वर्णों की सेवा को शूद्र यत्न से करे और ब्राह्मणों की तो दास बन कर सेवा करे ॥ ११ ॥ बिना मांगे दे और अपने निर्वाहके लिये कष्ट सहे और आलस्य को छोड़ कर पाक यज्ञ से देवताओं का पूजन करे ॥१२॥और न्याय में तत्पर जो शूद्र उनकाभी पूजन अधिकता से करे। पुराने वस्त्रका धारण करे और ब्राह्मण के खाने से शेष बचे भोजन शूद्र करे॥१३॥ अपनी स्त्रियों मेंरमे और पराई स्त्रियोंको बर्जे—मन, वाणी, देह के कर्म से शूद्र इसी प्रकार सदा करे ॥१४॥ नष्ट हुआहै पाप जिसका ऐसा उत्तम पुण्यात्मा शूद्र इंद्र के स्थान को प्राप्त होता है ये ब्रह्मा जी के मुखसे निकले हुए वर्णों के यथार्थ धर्म हमने कहे ॥ १५॥ हे श्रेष्ठ मुनियो अब हमारे कहे आश्रमों के सनातन धर्म को क्रम से सुनो ॥१६॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे २ अध्यायः भाषासमाप्ता ॥
हारीतस्मृतिः ॥
उपनीतोमाणवको वसेद्गुरुकुलेषुच ।
गुरोःकुलेप्रियंकुर्यात्कर्म्मणामनसागिरा ॥१॥
ब्रह्मचर्य्यमधःशय्या तथावह्नेरुपासना ।
उदकुंभान्गुरोर्दद्याद् गोग्रासञ्चेन्धनानिच ॥२॥
कुर्यादध्ययनञ्चैव ब्रह्मचारीयथाविधि ।
विधिंत्यक्त्वाप्रकुर्वाणो नस्वाध्यायफलंलभेत् ॥३॥
यःकश्चित्कुरुतेधर्म्मं विधिंहित्वादुरात्मवान् ।
नतत्फलमवाप्नोति कुर्वाणोऽपिविधिच्युतः ॥४॥
तस्माद्वेदव्रतानीह चरेत्स्वाध्यायसिद्धये ।
शोचाचारमशेषन्तु शिक्षयेद्गुरुसन्निधौ ॥५॥
अजिनंदण्डकाष्ठंच मेखलाञ्चोपवीतकम् ।
धारयेदप्रमत्तश्च ब्रह्मचारीसमाहितः ॥६॥
सायंप्रातश्चरेद्भैक्षं भोज्यार्थं संयतेन्द्रियः ।
आचम्यप्रयतो नित्यं नकुर्याद्दन्तधावनम् ॥७॥
यज्ञोपवीत के पीछे बालक गुरु के कुलों में बसे और कर्म, मन, वाणी, से गुरु के कुल में प्रीति रक्खे ॥ १ ॥ ब्रह्मचर्य्य से रहे पृथ्वीपर सोवे समिदाधान करे और गुरु के लिये जलका घट ईंधन और गौओं को चारा दे ॥ २ ॥ और ब्रह्मचारी शास्त्रोक्त विधि से वेद वेदाङ्ग का अध्ययन करे क्योंकि विधिसे हीन रीति से पढ़ता हुआ पढ़ने के फलको प्राप्त नहीं होता ॥३॥ जोकोई दुरात्मा विधिको छोड़कर धर्म करता है, विधिपतित वह ब्रह्मचारी आदि पुरुष उस कर्म के फल को प्राप्त नहीं होता ॥ ४ ॥ इससे अपने स्वाध्याय की सिद्धि के अर्थ गुरुकुल में वेद के व्रतों को करे और गुरु के समीप सम्पूर्ण शौच आचरण सीखे ॥५॥ मृगछाला-दंड-मेखला कंचनी यज्ञोपवीत- इनको सावधान और अप्रमत्त होकर धारण करे ॥ ६ ॥ इन्द्रियों को जीतकर भोजनके अर्थ सायं प्रातः काल भिक्षा मांगकर नित्य सावधानी से आचमन करके खाये । तथा दंतधावन न करे ॥ ७ ॥
१० भाषार्थसहिता ॥
छत्रंचोपानहंचैव गन्धमाल्यादिवर्जयेत् ।
नृत्यगीतमथालापं मैथुनंचविवर्जयेत् ॥८॥
हस्त्यश्वारोहणंचैव सन्त्यजेत्संयतेन्द्रियः ।
सन्ध्योपास्तिंप्रकुर्वीत ब्रह्मचारीव्रतेस्थितः ॥९॥
अभिवाद्यगुरोःपादौ संध्याकर्मावसानतः ।
तथायोगंप्रकुर्वीत मातापित्रोश्चभक्तितः ॥१०॥
एतेषुत्रिषुनष्टेषु नष्टाःस्युःसर्वदेवताः ।
एतेषांशासनेतिष्ठेद् ब्रह्मचारीविमत्सरः ॥११॥
अधीत्यचगुरोर्वेदान् वेदौवावेदमथवा ।
गुरवेदक्षिणांदद्यात्संयमीग्राममावसेत् ॥१२॥
यस्यैतानिसुगुप्तानि जिह्वोपस्थोदरंकरः ।
संन्याससमयंकृत्वा ब्राह्मणोब्रह्मचर्य्यया ॥१३॥
तस्मिन्नेवनयेत्कालमाचार्य्येयावदायुषम् ।
तदभावेचतत्पुत्रे तच्छिष्येवाथवाकुले ॥१४॥
छाता जूता गंध (इतर फुलेलआदि) माला नाचना गाना बहुत बोलना मैथुन इनको सर्वथा त्याग देवे हाथी घोड़े पर न चढ़े और इन्द्रियों को वशमें करके नियम में स्थित ब्रह्मचारी संध्योपासन किया करे॥८॥
संध्या कर्म को समाप्त कर गुरु के चरणों को अभिवादन करके भक्ति से माता और पिता की भी सेवा करे ॥१०॥
जो ब्रह्मचारी गुरुआदि तीनों की सेवा शुश्रूषा को सर्वथा भुला देतो उस पर सब देवता नष्ट (अप्रसन्न) होजाते हैं इससे ईर्ष्या को छोड़कर ब्रह्मचारी इनकी शिक्षा (उपदेश में) स्थित रहे ॥११॥
गुरुसे सब (४ वेद) अथवा दो वेद अथवा एक वेद को पढ़कर जितेंद्व्रिय ब्रह्मचारी गुरुको दक्षिणा दे के समावर्त्तन करके ग्राममें बसे॥१२॥
जिह्वा-उपस्थ इन्द्रिय-उदर(पेट)-हाथ-जिसके ये भलेप्रकार वश में होगये हैं। वह ब्राह्मण ब्रह्मचर्य्य से ही संन्यास लेने का समय नियत कर लेवे ॥१३॥
और वह नैष्ठिकब्रह्मचारी रहनापसन्दकरेतोउसी आचार्य्य के यहां मरणा पर्य्यन्त विरक्त होकर गुरुसेवा करे यदि आचार्य का स्वर्गवास होजाय तो गुरु शिष्यके समीप, गुरु के कुलमें तपकरता हुआ जन्म को बितावे ॥ १४ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ ११
नविवाहो न संन्यासो नैष्ठिकस्य विधीयते । इमं यो विधिमास्थाय त्यजेद्देहमतन्द्रितः । नेह भूयोऽपिजायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥१५॥ यो ब्रह्मचारी विधिना समाहितश्चरेत्पृथिव्यां गुरुसेवने रतः । संप्राप्य विद्यामतिदुर्लभां शिवां फलञ्च तस्या सुलभं तु विन्दति ॥१६॥ इति हारीते धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ गृहीतवेदाध्ययनः श्रुतशास्त्रार्थतत्ववित् । असमानर्षिगोत्रां हि कन्यामभ्रातृकां शुभाम् ॥ १॥ सर्वावयवसम्पूर्णां सुवृत्तामुद्वहेन्नरः । ब्राह्मेण विधिना कुर्यात्प्रशस्तेन द्विजोत्तमः ॥ २ ॥ तथाऽन्ये बहवः प्रोक्ता विवाहा वर्णधर्मतः । उपासनं च विधिवदाहृत्य द्विजपुंगवः ॥ ३ ॥ सायंप्रातश्च जुहुयात् सर्वकालमनन्द्रितः ।
इस नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये विवाह और संन्यास नहीं कहे हैं। जो आलस्य को छोड़कर इस विधि से देह को त्याग दे ॥१५॥ वह दृढ़व्रत ब्रह्मचारी इस भूलोक में फिर पैदा नहीं होता—विधि और सावधानी से गुरु की सेवा में लवलीन जो ब्रह्मचारी पृथ्वी पर विचरता है ॥१६॥ वह अत्यन्त दुर्लभ और कल्याण रूप विद्या को पाकर उसके सुलभ फल (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥१७॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे ३ अध्याय भाषासमाप्ता ॥
वेद को जो पढ़ चुका है, और वेदशास्त्र के तात्पर्य को ठीक २ जानता है ऐसा ब्रह्मचारी समावर्त्तन संस्कार करके जिसके प्रवर और गोत्र अपने से भिन्न हों और कोई भाई जिस का हो ऐसी ॥१॥ देह के सब अंग जिस के पूरे २ हों और सुंदर जिसका आचरण हो ऐसी कन्या से विवाह करे। और ब्राह्म या आठ विवाहों में उत्तम ब्राह्मविवाह विधि से विवाह करै ॥ २ ॥ ब्राह्म से भिन्न विवाह अन्य क्षत्रियादि वर्णों के लिये कहे हैं ॥ ३ ॥ आलस को छोड़ सायं प्रातःकाल नित्य २ होम करे और नित्य दन्तधावन करके स्नान
१२ भाषार्थसहिता ॥
स्नानंकार्यंततो नित्यं दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ४ ॥
उषःकाले समुत्थाय कृतशौचोयथाविधि ।
मुखेपर्युषिते नित्यं भवत्यप्रयतो नरः ॥ ५ ॥
तस्माच्छुष्कमथार्द्रंवा भक्षयेद्दन्तकाष्ठकम् ।
करंजंखादिरंवापि कदंबंकुरवंतथा ॥ ६ ॥
सप्तपर्णंपृश्निपर्णी जंबूनिंबंतथैवच ।
अपामार्गंचबिल्वंचाकं चोदुम्बरमेवच ॥ ७ ॥
एतेप्रशस्ताःकथिता दंतधावनकर्म्मणि ।
दंतकाष्ठस्यभक्षश्च समासेनप्रकीर्तितः ॥ ८ ॥
सर्वैकंटकिनःपुण्याः क्षीरिणश्चयशस्विनः ।
अष्टांगुलेनमानेन दन्तकाष्ठमिहोच्यते ॥ ९ ॥
प्रादेशमात्रमथवा तेनदन्तान्विशोधयेत् ।
प्रतिपत्पर्वषष्ठीषु नवम्यांचैवसप्तमीः ॥ १० ॥
दन्तानांकाष्ठसंयोगो दहत्यासप्तमंकुलम् ॥
करे ॥ ४ ॥ अरुणोदय में उठके विधिपूर्वक शुद्धि मुखादिकी करे क्योंकि मुख के पर्युषित (बासी) होने से मनुष्य का मन मलिन अपवित्र होता है॥५॥ उन मे सूखी वा गीली दातौन अवश्य करे वह दातौन करंज, खैर, कदंब, मौलसिरी की हो ॥ ६ ॥ सप्तपर्ण, पृश्निपर्णी, जामन नीम औंधा बेल, आक गूलर-॥ ७ ॥ इतने वृक्ष दातौन के लिये उत्तम कहे हैं और दातौन करने का विचार भी संक्षेप से कह दिया है ॥ ८ ॥ कांटे वाले सब वृक्ष पवित्र और दूध वाले सब वृक्ष यश के हेतु हैं। आठ अंगुल लंबी दातौन होनी चाहिये अथवा प्रादेशमात्र ( बित्ताभर ) लम्बी हो उन से दांतों को शुद्ध करे । हेमहर्षि लोगो ! पड़वा, पर्व (अमावस आदि) छठ और नवमी तिथि को ॥ १० ॥ दातौन करने से सात पीढ़ी तक के पुरुषों को दग्ध करता है।
हारीतस्मृतिः ॥ १३
अभावे दन्तकाष्ठानां प्रतिषिद्धदिनेषु च ॥ ११ ॥
अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिं समाचरेत् ।
स्नात्वा मन्त्रवदाचम्य पुनराचमनं चरेत् ॥ १२ ॥
मन्त्रवत्प्रोक्ष्य चात्मानं प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिम् ।
आदित्येन सह प्रातर्मन्देहानां म राक्षसाः ॥ १३ ॥
युध्यन्ति वरदानेन ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
उदकाञ्जलिनिक्षेपा गायत्र्या चाभिमन्त्रिताः ॥ १४ ॥
निघ्नन्ति राक्षसान् सर्वान्मन्देहाख्यान् द्विजैरीताः ।
ततः प्रयाति सविता ब्राह्मणैरभिरक्षितः ॥ १५ ॥
मारीच्याद्यैर्महाभागैः सनकाद्यैश्च योगिभिः ।
तस्मान्न लङ्घयेत् सन्ध्यां सायं प्रातः समाहितः ॥ १६ ॥
उल्लङ्घयति यो मोहात् स याति नरकं ध्रुवम् ।
सायं मन्त्रवदाचम्य प्रोक्ष्य सूर्यस्य चाञ्जलिम् ॥ १७ ॥
दातून के न मिलने पर तथा प्रतिपदादि निषिद्ध दिनों में ॥ ११ ॥
पानी के बारह कुल्ले करके तथा मज्जन द्वारा मुख की शुद्धि करे। मन्त्रों से आचमन करके स्नान करे और स्नान के पीछे फिर आचमन करे ॥ १२ ॥
(आपोहिष्ठादि०) मन्त्रों से देह पर मार्जन करके सूर्य को जल की अंजली देवे। सूर्यनारायण के संग प्रातःकाल में मंदेह नाम वाले राक्षस ॥ १३ ॥ अव्यक्त ब्रह्म से प्रकट हुये ब्रह्मा जी के वरदान से युद्ध करते हैं। गायत्री मन्त्र पढ़ कर सूर्यनारायण के सम्मुख द्विजों से फेंकी जल की अंजली ॥ १४ ॥ उन सब मंदेह नामक राक्षसों को नष्ट करती हैं। इस कारण ब्राह्मणों से ॥ १५ ॥ तथा बड़े भाग्यशाली मरीचि आदि ऋषियों से तथा सनकादिक योगियों से भी रक्षित हुये सूर्यनारायण आकाश में निर्विघ्न गमन करते हैं। इस से सावधान हुआ द्विज सायं प्रातःकाल की संध्या का उल्लंघन त्याग न करे ॥ १६ ॥ जो पुरुष अज्ञान से संध्या को छोड़ता है वह निश्चय कर नरक में जाता है। सायंकाल को मन्त्रों से आचमन और शरीर पर मार्जन कर के सूर्य को अंजली ॥ १७ ॥
| १४ | भाषार्थसंहिता ॥ |
|---|
दत्वाप्रदक्षिणं कुर्याज्जलंसंस्पृष्टाविशुद्ध्यति ।
पूर्वां संध्यां सनक्षत्रा-मुपासीतयथाविधि ॥ १८ ॥
गायत्रीमभ्यसेत्तावद् यावदादित्यदर्शनम् ।
उपास्य पश्चिमां संध्यां सादित्यांचयथाविधि ॥ १९ ॥
गायत्रीमभ्यसेत्तावद्यावत्ताराणिपश्यति ।
ततश्चावसथंप्राप्य कृत्वाहौमंरवंयंबुधः ॥ २० ॥
सञ्चिन्तयपोषव्यवर्गस्य भरणार्थंविचक्षणः ।
ततःशिष्यहितार्थाय स्वाध्यायंकिञ्चिदाचरेत् ॥२१॥
ईश्वरंचैवकार्यार्थ मभिगच्छेद्विजोत्तमः ।
कुशपुष्पेन्धनादीनि गत्वादूरंसमाहरेत् ॥२२॥
ततोमाध्यान्हिकंकुर्याच्छुचौदेशेमनोरमे ।
विधिंतस्यप्रवक्ष्यामि समासात्पापनाशनम् ॥२३॥
स्नात्वायॆनविधानेन मुच्यतेसर्वकिल्विषात् ।
देकर प्रदक्षिणा करै फिर जल का स्पर्श कर के शुद्ध होता है। प्रातःकाल की सन्ध्या का उस समय विधि से आरम्भ करे जब आकाश में नक्षत्र दीखते हों ॥१८॥ फिर सूर्य का दर्शन होने समय तक खड़े हो के गायत्री का जपकरै। सायं-काल की संध्या को सूर्य के अस्त से पूर्व ही विधि से आरम्भ करके ॥१९॥ तारा गण दीखने समय तक बैठ के गायत्री का जप करे—फिर गृह्याग्नि के पास जाकर शास्त्रोक्त विधि से ज्ञानवान् द्विज स्वयं होम करै ॥ २० ॥ विचारशील पुरुष पुत्र भृत्य आदि के खान पान के अर्थ चिन्ता करके फिर शिष्य के हित के लिये कुछ वेद पाठ करे ॥२१॥ और ब्राह्मण संसारी कार्य के लिये ईश्वर नाम राजा के यहां जाय । तथा दूर जाकर कुशा, फल, इन्धन समिधा आदि को लाया करे ॥ २२ ॥ फिर शुद्ध एकान्त देश में जाकर मध्याह्न दोपहर का सन्ध्यादि कर्म करे । उसके पाप नाशक विधान को संक्षेप से कहिं गे ॥ २३ ॥ जिस विधि से स्नान करके सब पापों से छूटता है-स्नान के लिये
हारीतस्मृतिः ॥ १५
स्नानार्थं मृदमानीय शुद्धाक्षततिलैःसह ॥२४॥
सुमनाश्चततोगच्छेन्नदींशुद्धजलाधिकाम् ।
नद्यान्तुविद्यमानायां नस्नायादन्यवारिणि ॥२५॥
नस्नायादल्पतोयेषु विद्यमानेबहूदके ।
सरिद्वरंनदीस्नानं प्रतिस्रोतस्थितश्चरेत् ॥२६॥
तडागादिषुतोयेषु स्नायाच्चतदभावतः ।
शुचिंदेशंसमभ्युक्ष्य स्थापयेत्सकलांबरम् ॥२७॥
मृत्तोयेनस्वकंदेहं लिम्पेत्प्रक्षालययत्नतः ।
स्नानादिकंचसंप्राप्य कुर्यादाचमनंबुधः ॥२८॥
सोऽन्तर्जलं प्रविश्याथ वाग्यतो नियमेनहि ।
हरिं संस्मृत्यमनसामज्जयेच्चोरुमज्जले ॥२९॥
ततस्तोरंसमासाद्य आचम्यापःसमन्त्रतः ।
प्रोक्षयेद्दारुणैर्मन्त्रैः पावमानीभिरेवच ॥३०॥
कुशाग्रकृततोयेन प्रोक्ष्यात्मानंप्रयत्नतः ।
शुद्ध अक्षत और तिलों सहित मट्टी को लाकर ॥२४॥ उदार चित्त होके शुद्ध अधिक, जल वाली नदी पर जावे। नदी के होते अन्य जल में स्नान न करे ॥२५॥ और अधिक जल वाले जलाशय के होते अल्प जल वाले में स्नान न करे। उत्तम नदी में स्रोत (प्रवाह) के सम्मुख खड़ा होकर स्नान करे ॥२६॥ और नदी के अभाव में तालाब आदि के जल में पूर्व वा उत्तराभिमुख खड़ा होके स्नान करे शुद्ध स्थान को जल से छिड़क कर सब वस्त्र रख दे ॥२७॥ पहिले शरीर पर जल छोड़ के सब देह में मुख से लेकर जल में घोर के मट्टी लगावे फिर स्नान करके आचमन करे। २८ ॥ फिर वह पुरुष जल के भीतर घुस के मौन होकर नियम से हरि भगवान् का स्मरण करके जंघा तक जल में गोता लगावे ॥२९॥ फिर किनारे पर आकर मन्त्रों पूर्वक जल का आचमन करके वरुण देवता के मन्त्रों तथा पावमानी सूक्त से शरीर का मार्जन कुश ले के करे ॥३०॥ कुश के अग्र भाग के जल से यत्न से देह का मार्जन करके (स्योना
१६ | भाषार्थसहिता ॥
स्योनापृथिवीतिमृद्गात्रे इदंविष्णुरितिद्विजाः ॥ ३१ ॥
ततोनारायणंदेवं संस्मरेत्प्रतिमज्जनम् ।
निमज्ज्यांतर्जलेसम्यक् क्रियतेचाघमर्षणम् ॥ ३२ ॥
स्नात्वाक्षततिलैस्तद्वद्देवर्षिपितृभिःसह ।
तर्पयित्वाजलंतरमान्निष्पीड्यचसमाहितः ॥ ३३ ॥
जलतीरंसमासाद्य तत्रशुक्लेनवाससी ।
परिधायोत्तरीयं च कुर्यात्केशान्नधूनयेत् ॥ ३४ ॥
नरक्तमुल्वणंवासो ननीलंचप्रशस्यते ।
मलाक्तंगंधहीनंच वर्जयेदंबरंबुधः ॥ ३५ ॥
ततःप्रक्षालयेत्पादौ मृत्तोयेनविचक्षणः ।
दक्षिणंतुकुरंकृत्वा गोकर्णाकृतिवत्पुनः ॥ ३६ ॥
त्रिःपिबेदीक्षितंतोयमास्यं द्विःपरिमार्जयेत् ।
पादौशिरस्ततोऽभ्युक्ष्य त्रिभिरास्यमुपस्पृशेत् ॥३७॥
अंगुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुषीसमुपस्पृशेत् ।
तथैवपंचभिर्मूर्ध्नि स्पृशेदेवंसमाहितः ॥ ३८ ॥
पृथिवी० ) इस मंत्र से अथवा (इदंविष्णु ०) इस मंत्र से देह में गट्टी लगावे ॥३१॥ हर एक गोता लगाने में नारायण देव कास्मरण करे और जल के भीतरगो-ता लगाये हुए अघमर्षण मंत्र ( ऋतंचसत्यंचा० ) को जपै ॥ ३२ ॥ स्नान करके और वस्त्र को निचोड़ कर ॥३३॥ जल के किनारे पर आके सफेद वस्त्र (धोती) को पहन कर अंगोछा कन्धे पर डाल के केशों को न कंपावे ॥ ३४ ॥ अधिक लाल, नील वस्त्र श्रेष्ठ नहीं कहा है तथा मैले और गंधहीन वस्त्र को वर्जेद ३५ फिर विचारशील पुरुष मट्टी और जल से पग धोके दहिने हाथ को गौके कान के समान करके ॥३६॥ देखे हुए जल से तीन बार आचमन करे फिर दोबार मुख का मार्जन करे फिर पग और शिर पर जल का मार्जन कर बीच की तीन अंगुलियों से मुख का स्पर्श करे ॥ ३७ ॥ अंगूठा और अनामिका से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे इसी प्रकार सावधान होकर पांचों अंगुलियों से मस्तक का स्पर्श करे ॥ ३८ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ १७
अनेनविधिनाचम्य ब्राह्मणःशुद्धमानसः । कुर्वीतदर्भपाणिस्तूदङ्मुखःप्राङ्मुखोऽपिवा ॥३६॥ प्राणायामत्रयंधीमान्यथान्यायमतंद्रितः । जपयज्ञंततःकुर्याद् गायत्रींवेदमातरम् ॥ ४० ॥ त्रिविधोजपयज्ञःस्यात्तस्यतत्वंनिबोधत । वाचिकश्चउपांशुश्च मानसश्चत्रिधाकृतिः ॥ ४१ ॥ त्रयाणामपियज्ञानां श्रेष्ठःस्यादुत्तरोत्तरः । यदुच्चनीचोच्चरितैः शब्दैःस्पष्टपदाक्षरैः ॥४२॥ मंत्रमुच्चारयन्वाचा जपयज्ञस्तु वाचिकः । शनैरुच्चारयन्मंत्रं किंचिदोष्ठौप्रचालयेत् ॥४३॥ किंचिच्छ्रवणयोग्यःस्यात् सउपांशुर्जपःस्मृतः । धियांपदाक्षरश्रेण्या अवर्णमपदाक्षरम् ॥४४॥ शब्दार्थचिन्तनाभ्यांतु तदुक्तं मानसंस्मृतम् ।
शुद्ध मन वाला ब्राह्मण इस विधि से आचमन करके कुशा हाथ में लेकर उत्तर वा पूर्व को मुख करके ॥३९॥ आलस्य को छोड़ के विधि पूर्वक तीन प्राणायाम करे फिर वेद माता गायत्री का जपयज्ञ करे ॥४०॥ तीन प्रकार का जपयज्ञ होता है उस के स्वरूप को तुम सुनो ! वाणी से साफ २ बोले उपांशु-धीमी वाणी से बोले और मन से ये तीन उस के भेद हैं ॥४१॥ इन तीनों यज्ञों में पिछला २ श्रेष्ठ है। जो उदात्त अनुदात्त स्वरित स्वरों सहित स्पष्ट पद और अक्षरों सहित ॥४२॥ वाणी से मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते हुए जप किया जाता है वह वाचिक जप यज्ञ कहाता है और कुछ २ होठों को चला कर अति समीप के मनुष्य को सुनने योग्य धीरे २ मंत्र का उच्चारण कर के ॥४३॥ जो जप किया जाय उसे उपांशु जप कहते हैं—और जिस में वर्ण (पदों के अक्षर) प्रतीत न हों केवल बुद्धि से ही पदों के अक्षरों के सिलसिले से ॥४४॥ शब्द अर्थ का विचार जिस में हो उस जप यज्ञ को मानस कहते हैं। जप यज्ञ से स्तुति किया
३