अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविष्णुस्मृतिः ॥ १८
ब्राह्मणक्षत्रवैश्यांश्च चरन्नित्यममत्सरः ॥ १०७ ॥
कुर्वंस्तुशूद्रःशुश्रूषां लोकान्जयतिधर्मतः ।
पंचयज्ञविधानंतु शूद्रस्यापि विधीयते ॥ १०८ ॥
तस्यप्रोक्तोनमस्कारः कुर्वन्नित्यंनहीयते ।
शूद्रोपिद्विविधोज्ञेयः श्राद्धीचैवेतरस्तथा ॥ १०९ ॥
श्राद्धीभोज्यस्तयोरुक्तो ह्यभोज्यस्त्वतरोमतः ।
प्राणानर्थांस्तथादारा-न्ब्राह्मणार्थंनिवेदयेत् ॥ ११० ॥
सशूद्रजातिर्भोज्यः स्या-दभोज्यःशेषउच्यते ।
कुर्याच्छूद्रस्तुशुश्रूषां ब्रह्मक्षत्रविशांक्रमात् ॥ १११ ॥
कुर्यादुत्तरयोर्वैश्यः क्षत्रियोब्राह्मणस्यतु ।
आश्रमास्तुत्रयःप्रोक्ता वैश्यराजन्ययोस्तथा ॥ ११२ ॥
पारिव्राज्याश्रमप्राप्ति-र्ब्राह्मणस्यैवचोदिता ।
नित्य सेवा करे ॥१०७॥ क्योंकि इन की शुश्रूषा को धर्म से करता हुआ शूद्र लोक ( स्वर्गादि ) को जीतता ( प्राप्त होता ) है और पंचयज्ञ का करना शूद्र को भी कहा है ॥ १०८ ॥ उस शूद्र को देवता के नामान्त में नमः लगा कर नाम मन्त्रों से पञ्च यज्ञ करने चाहिये जैसे ( अग्नयेनमः ) इत्यादि इस प्रकार नित्य २ करता हुआ शूद्र पतित नहीं होता—शूद्र भी दो प्रकार का है एक श्राद्ध का अधिकारी और दूसरा अनधिकारी ॥ १०९ ॥ उन दोनों में से श्राद्धके अधिकारी का भोजन करना चाहिये--और अनधिकारी का नहीं जो शूद्र अपने प्राण-धन, स्त्री इत्यादि सब ब्राह्मण को समर्पण करदे ॥ ११० ॥ वह शूद्र भोजन करने योग्य है और शेष शूद्र का अन्न अभोज्य है । और शूद्र क्रम से ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य--इन की सेवा करे ॥१११॥ वैश्य ब्राह्मण क्षत्रिय की सेवा करे और क्षत्रिय, ब्राह्मण की ही सेवा करे । वैश्य और क्षत्रिय इन के तीन आश्रम कहे हैं । अर्थात् ब्रह्मचर्य-गृहस्थ, वानप्रस्थ ॥ ११२ ॥ और संन्यास