अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविष्णुस्मृतिः ॥
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वेदस्वीकरणेहृष्टो गुर्वधीनो गुरुहिंतः ।
निष्ठांतञ्चैवयोगच्छेन्नैष्ठिकस्सउदाहृतः ॥ २४ ॥
अनेनविधिनासम्यक्कृत्वावेदमधीत्यच ।
गृहस्थधर्ममाकांक्षन्गुरुगेहादुपागतः ॥ २५ ॥
अनेनैवविधानेन कुर्याद्दारपरिग्रहम् ।
कुलेमहतिसंभूतां सवर्णांलक्षणांन्विताम् ॥ २६ ॥
परिणीयतुषण्मासान्वत्सरंवानसंविशेत् ।
औदुंबरायणोनाम ब्रह्मचारीगृहेगृहे ॥ २७ ॥
ऋतुकालेतुसंप्राप्ते पुत्रार्थीसंविशेत्तदा ।
जातेपुत्रेत्तथाकुर्यादग्न्याधेयंगृहेवसन् ॥ २८ ॥
पुत्रेजातेऽनृनौगच्छन्संप्रदुष्येत्सदागृही ।
चतुर्थेब्रह्मचारीचगृहेतिष्ठेन्नविस्मृतः ॥ २९ ॥
इति वैष्णवधर्मशास्त्र प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
भा०- जो ब्रह्मचारी वेद पढने में प्रमत्त, गुरु के आधीन तथा गुरु का हितकारी होकर मरण पर्यंत गुरु की सेवा में ही रहे उसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते हैं ॥ २४ ॥ इस विधि से ब्रह्मचर्य धर्म को कर और वेद को पढ़के गृहस्थ धर्म की इच्छा करता हुआ गुरु के घर से आया ॥२५॥ बड़े प्रतिष्ठित कुल में पैदा हुई शुभ चिह्नोंवाली अपने वर्ण की स्त्री के साथ शास्त्रोक्त विधिसे विवाह करे ॥२६॥ विवाह करके जो छःमहीने अथवा एक वर्ष पर्यंत स्त्री से संग नहीं करता ब्रह्मचारी रहता है घर में रहते हुए भी उस ब्रह्मचारी को औदुबरायण कहते हैं ॥ २७ ॥ जब स्त्री को रजोधर्शन हो तब पुत्र की इच्छा से स्त्री का संग करे पुत्र के होने पर घर में रहता हुआ ही विधि पूर्वक अग्नि स्थापन करे ॥ २८ ॥ पुत्र के होने पर ऋतुकाल के बिना स्त्री संग करने से गृहस्थी सदा दोषी होता है और चौथे पुत्र के होने पर गृहस्थी पुरुष ब्रह्मचारी रहता हुआ भी भूल कर घर में न ठहरे किन्तु वन में जाकर तपकरे॥२९॥
इति विष्णुस्मृतौ प्रथमोऽध्यायः ॥