अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ | भाषार्थसहिता ॥
त्रिराचम्यततः प्राणां-स्तिष्ठेन्मौनीसमाहितः । १७॥
अब्दैवतैःपवित्रैस्तु कृत्वाऽऽत्मपरिमार्जनम् ।
सावित्रींचजपंस्तिष्ठे-दासूर्योदयनात्पुरा ॥१८॥
अग्निकार्यंततःकुर्यात्-प्रातरेवव्रतंचरेत् ।
गुरवेतुततःकुर्यात् पादयोरभिवादनम् ॥१९॥
समित्कुशांश्चोदकुम्भ- माहृत्यगुरवेव्रती ।
प्राञ्जलिःसम्यगासीन उपस्थाययतःसदा ॥२०॥
यंयंग्रन्थमधीयीत तस्यतस्यव्रतंचरेत् ।
सावित्र्युपक्रमात्सर्वं-मावेदग्रहगोत्तरम् ॥२१॥
द्विजातिषुचरेद्भैक्ष्यं भिक्षाकालसमागते ।
निवेद्यगुरवेऽश्नीयात्संमतोगुरुणाव्रती ॥ २२ ॥
सायंसन्ध्यामुपासीनो गायत्र्यष्टशतंजपेत् ।
द्विकालभोजनार्थंच तथैवपुनराहरेत् ॥ २३ ॥
आचमन तथा तीन बार प्राणायाम कर के सावधान होकर मौन होके खड़ा रहे ॥ १७ ॥ जल देवता (आपोहिष्ठा०) इत्यादि तथा पवित्र मन्त्रों से देह का मार्जन कर के सूर्योदय पर्यन्त खड़े होके गायत्री का जप करे ॥ १८ ॥ उस के बाद अग्निहोत्र करे और प्रातःकाल के समय ही व्रत (महानाम्न्यादि) करे तत्पश्चात् गुरु के पगों में अभिवादन करे ॥ १९ ॥ फिर वह शिष्य समिधा कुश-और जल का घट गुरु के लिये लाकर हाथ जोड़ और भले प्रकार सदा गुरु के समीप बैठ कर ॥ २० ॥ जिस २ ग्रन्थ को पढ़े उस २ का व्रत करे और गायत्री के उपदेश से लेकर सब वेद के पठन पर्यन्त ॥ २१ ॥ भिक्षा के समय ब्राह्मणादि तीनों द्विजों के घरों से भिक्षा मांगकर लावे उस भिक्षा को गुरु जी को निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर ब्रह्मचारी नियमबद्ध हुआ भोजन करे ॥ २२ ॥ सायंकाल की सन्ध्या में बैठा हुआ एक सौ आठबार गायत्री जपे और सायंकालको भोजन चाहे तो उसी प्रकार भिक्षा मांगलावे ॥२३॥