भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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विष्णुस्मृतिः ॥

जातकर्मतथाकुर्यात्-पुत्रेजातेयथोदितम् ।
बहिर्निष्क्रमणंचैव तस्यकुर्याच्छिशोःशुभम् ॥११॥
षष्ठेमासिचसंप्राप्ते अन्नप्राशनमाचरेत् ।
ततोऽब्देचेक्सम्प्राप्ते केशकर्मसमाचरेत् ॥१२॥
गर्भाष्टमेतथाकर्म ब्राह्मणस्योपनयनम् ।
द्विजत्वेत्वथसम्प्राप्ते सावित्र्यामधिकारभाक् ॥१३॥
गर्भादेकादशेशैके कुर्यात्क्षत्रियवैश्ययोः ।
कारयेद्द्विजकर्माणि ब्राह्मणेनयथाक्रमम् ॥१४॥
शूद्रश्चतुर्थोवर्णस्तु सर्वसंस्कारवर्जितः ।
उक्तस्तस्यानुसंस्कारो द्विजेष्वात्मनिवेदनम् ॥१५॥
योयस्यविहितोदण्डो मेखलाजिनधारणम् ।
सूत्रंवस्त्रंचगृह्णीया-द्ब्रह्मचर्येणयन्त्रितः ॥१६॥
ब्राह्मेमुहूर्तेउत्थाय चोपस्पृश्यपयस्तथा ।


भा०- पुत्र के पैदा होते ही शास्त्र के अनुसार जातकर्म करे और उस बालक का मंगल महिने बहिर्निष्क्रमण (घर से बाहर ले जाना) करे अर्थात् चौथे महिने में मन्त्रपूर्वक सूर्यनारायण का दर्शन करावे ॥११॥ जब छः महीने का बालक हो तब उस का अन्न प्राशन संस्कार करे और जब तीन वर्ष का हो तब केशकर्म (मुण्डन) करे ॥१२॥ गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का यज्ञोपवीत करे क्योंकि द्विज होने पर ही गायत्री का अधिकारी होता है ॥१३॥ गर्भ से ग्यारवें वर्ष क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष वैश्य का यज्ञोपवीत ब्राह्मण से करवावे ॥१४॥ और चौथा जो शूद्र वर्ण है वह सब संस्कारों से हीन है उस का संस्कार यही कहा है कि उक्त तीनों वर्णों को अपने आत्मा को निवेदन (अधीन) कर दे ॥१५॥ ब्रह्मचर्य (यज्ञोपवीत के समय) में जिस वर्ण का जो २ दण्ड मेखला, मृगछाला-सूत्र-वस्त्र गृह्यसूत्रकारों ने कहा है उस २ को वह २ ब्राह्मणादि धारण करे ॥१६॥ ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान-करके तीन

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