अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
अत्रिसमृतिः ॥ ४३
बहूनामेकलग्नाना-मेकश्चेदशुचिर्भवेत् । अशौचमेकमात्रस्य नेतरेषांकथंचन ॥ २४१ ॥
एकपंत्युपविष्टानां भोजनेषुपृथक्पृथक् । यद्येकोलभतेनीलीं सर्वेतेऽशुचयःस्मृताः ॥ २४२ ॥
यस्यपट्टेपट्टसूत्रे नीलीरक्तोहिदृश्यते । त्रिरात्रंतस्यदातव्यंशेषाश्चैकोपवासिनः ॥ २४३ ॥
आदित्येऽस्तमितेरात्रा-वस्पृशंस्पृशतेयदि । भगवन्केनशुद्धिःस्या-त्ततोब्रूहितपोधन ! ॥ २४४ ॥
आदित्येऽस्तमितेरात्रौ स्पर्शहीनंदिवाजलम् । तेनैवसर्वशुद्धिःस्यात् शवस्पृष्टंतुवर्जयेत् ॥ २४५ ॥
देशंकालंचवयःशक्तिं पापंचावेक्ष्यतत्वतः । प्रायश्चित्तंप्रकल्प्यंस्याद्यस्यचोक्ताननिष्कृतिः ॥२४६॥
एक फर्से आदि पर बैठे हुए मनुष्यों में से जो एक अशुद्ध होजाय तो वही अशुद्ध होता है अन्य मनुष्य कदाचित् भी अशुद्ध नहीं होते ॥ २४१ ॥ भोजन करने के समय एक पंक्ति में अलग २ बैठे मनुष्यों में जो एक मनुष्य के देह में नील का वस्त्रादि छूजाय तो वे सब अशुद्ध हो जाते हैं ॥ २४२ ॥ और पूर्वोक्त एक पङ्क्ति में बैठे हुओं के बीच में जिस के वस्त्र अथवा पट्ट वस्त्र (दुपट्टा) पर नील का रंग दीख पड़े तो उसे तीन दिन का उपवास और शेष मनुष्यों को एक २ उपवास करना चाहिये ॥ २४३ ॥ हे भगवन् अत्रिजी ! सूर्य के छिप जाने पर रात्रि में यदि स्पर्श करने के अयोग्य वस्तु का स्पर्श क-रले तो किस से शुद्धि हो उस शुद्धि को कहो ॥ २४४ ॥ सूर्य के छिप जाने पर रात्रि में किसी का न छुआ निर्मल जो दिन का जल उसी से सब की शुद्धि होती है किन्तु जिसने मुर्दे का स्पर्श किया हो उसकी शुद्धि जल मात्र से नहीं होती ॥ २४५ ॥ और देश-समय-सामर्थ्य और पाप को भी यथार्थ देखकर उस पाप के प्रायश्चित की कल्पना विद्वान् करले जिस पाप का प्रायश्चित्त शास्त्र में नहीं कहाहो ॥ २४६ ॥
४४ भाषार्थसहिता ॥
देवयात्राविवाहेषु यज्ञप्रकरणेषु च । उत्सवेषुचसर्वेषु स्पृष्टास्पृष्टंनविद्यते ॥२४७॥ आलनालंतथाक्षीरं कन्दुकन्दधिसक्तवः । स्नेहपक्वं च तक्रंच शूद्रस्यापिनदुष्यति ॥२४८॥ आर्द्रमांसंघृतंतैलं स्नेहाश्चफलसम्भवाः । अन्त्यभांडस्थितास्त्वेते निष्क्रान्ताःशुद्धिमाप्नुयुः॥२४९॥ अज्ञानात्पिबतेतोयं ब्राह्मणःशूद्रजातिषु । अहोरात्रोषितःस्नात्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥२५०॥ आहिताग्निस्तुयोविप्रो महापातकवान्भवेत् । अप्सु प्रक्षिप्यपात्राणि पश्चादग्निंविनिर्दिशेत् ॥२५१॥ योगृहीत्वाविवाहाग्निं गृहस्थइतिमन्यते । अन्नंतस्यनभोक्तव्यं वृथापाकोहिसःस्मृतः ॥२५२॥
तीर्थादि पर देवताओं की यात्रा-विवाह-यज्ञ का प्रकरण और संपूर्ण उत्सवों में स्पर्श करने के योग्य और अयोग्य का दोष नहीं होता है ॥२४७॥ आल का नाल ( चने आदि की खटाई ) दूध-कन्दुक (भाड़) दही सत्तू-स्नेह ( घी तेल ) से पका हुआ पदार्थ-और मठा ये वस्तु शूद्र के भी दूषित नहीं हैं किन्तु खा लेने योग्य होते हैं ॥ २४८ ॥ गीला मांस-घृत-तेल-फल से उत्पन्न हुए तैलादि अन्त्यज के पात्र में रक्खे भी हों पर निकाल लेने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥२४९॥ जो ब्राह्मण शूद्र जातियों का जल अज्ञान से पीले तो दिन रात का उपवास और पंचगव्य पीकर शुद्ध होता है ॥ २५० ॥ जो अग्निहोत्री ब्राह्मण महापातकी हो जाय तो होम के पात्रों को जल में फेंककर फिर विधिपूर्वक अग्नि को स्थापित करे ॥२५१॥ जो विवाह की अग्नि को ग्रहण करके अर्थात् स्मार्त्त अग्निहोत्र को लेकर अपने को गृहस्थी मानता है अर्थात् उस अग्नि में पक्षयाग तथा पंचमहायज्ञादि नित्य २ नहीं करता इस से उस का अन्न नहीं खाना जिस से ऋषियों ने उसे वृथापाक कहा है ॥२५२॥
अग्निस्मृतिः ॥ ४५
वृथापाकस्यभुञ्जानः प्रायश्चित्तंचरेद्द्विजः ।
प्राणानप्सुत्रिरायम्य घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ॥२५३॥
वैदिकेलौकिकेवापि हुतोच्छिष्टेजलेक्षितौ ।
वैश्वदेवंप्रकुर्वीत पंचसूनापनुत्तये ॥ २५४ ॥
कनीयान्गुणवांश्चैव ज्येष्ठश्चेन्निर्गुणोभवेत् ।
पूर्वं पाणिंगृहीत्वाच गृह्याग्निंधारयेद्बुधः ॥२५५॥
ज्येष्ठश्चेद्यदिनिर्दोषो गृह्णात्यग्नियवीयसः ।
नित्यंनित्यंभवेत्तस्य ब्रह्महत्यानसंशयः ॥२५६॥
महापातकि संस्पृष्टः स्नानमेवविधीयते ।
संस्पृष्टस्ययदाभुंक्ते स्नानमेवविधीयते ॥२५७॥
पतितैःसहसंसर्गं-मासादुर्द्धंमासमेवच ।
गोमूत्रयावकाहारोमासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ २५८ ॥
वृथापाक के अन्न को जो द्विजखाले वह इस प्रायश्चित्त को करे कि जलके मध्य में तीन बार प्राणायाम करके घृत को खाकर शुद्ध होता है ॥२५३॥
विधिपूर्वक स्थापित किये वा चूल्हे आदि के वा जिस में होम हो चुका हो ऐसे अग्नि में वा जल में अथवा भूमि पर बलि वैश्वदेव को पांच हत्या के दूर करने के निमित्त अवश्य करे ॥२५४॥
यदि जेठा भाई मुर्ख हो और छोटा विद्वान् हो तो ज्ञानी छोटा भाई जेठे से पहिले विवाह करके गृह्य अग्नि को धारणा करे ॥२५५॥
यदि जेठा भाई निर्दोष हो और छोटा भाई अग्निहोत्र को ग्रहण कर ले तो प्रतिदिन उसे ब्रह्महत्या लगती है इस में संशय नहीं है ॥२५६॥
महापातकी ने जिस को छू लिया हो वह, और महापातकी से स्पर्श किये हुए के भोजन को जिस ने किया हो वह इन दोनों की स्नान मात्र से शुद्धि होती है ॥२५७॥
पतित के साथ जिसने पन्द्रह दिन अथवा एक मास तक मेल मिलाप किया हो वह पन्द्रह दिन तक गोमूत्र और जौ को खाकर शुद्ध होता है ॥ २५८ ॥
४६ भाषार्थसहिता ॥
कृच्छ्रार्द्धंपतितस्यैवसकृद्भु क्त्वाद्विजोत्तमः । अविज्ञानाच्चतद् भुक्त्वा कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ २५९ ॥ पतितानांयदाभुक्तं भुक्तं चाण्डालवेश्मनि । मासार्द्धंतु पिवेद्वारि इतिशातातपोऽब्रवीत् ॥ २६० ॥ गोब्राह्मणहतानांच पतितानांतथैवच । अग्निनानचसंस्कारःशंखस्यवचनंयथा ॥ २६१ ॥ यश्चाण्डालीं द्विजोगच्छे-त्कथंचित्काममोहितः । त्रिभिःकृच्छ्रैर्विशुद्ध्येत प्राजापत्यानुपूर्वशः ॥२६२॥ पतिताच्चान्नमादाय भुक्त्वावान्ब्राह्मणोयदि । कृत्वा तस्यसमुत्सर्गमतिकृच्छ्रं विनिर्दिशेत् ॥ २६३ ॥ अन्त्यहस्तात्तुविक्षिप्तं काष्ठंलोष्ठंतृणानिच । नस्पृशेत्तुतथोच्छिष्ट-महोरात्रं समाचरेत् ॥२६४॥ चाण्डालपतितंम्लेच्छंमद्यभाण्डंरजस्वलाम् ।
पतितके अन्न को जानबूझ एक बारखालेतो सांतपन कृच्छ्र व्रत करे तथा अज्ञान से पतित का अन्न खाले तो कृच्छ्रसान्तपनव्रत करे ॥ २५९ ॥ यदि पतितों का भोजन किया हो अथवा चाडालके घर में भोजन किया हो तो पन्द्रह दिन तक जल ही पीकर रहे उपवासकरे यह शातातप ऋषि ने कहा है ॥२६०॥ शंख के वचनानुसार गौ और ब्राह्मणों से मारे गये और पतितों का अग्नि से दाह नहीं करना चाहिये ॥२६१॥यदि कामदेव से मोहित द्विज किसी प्रकार से चांडा- ली के संग गमन करे तो प्राजापत्य व्रत के पश्चात तीन कृच्छ्र व्रत करके शुद्ध होता है ॥२६२॥ पतितके अन्न को लेकर या खाकर ब्राह्मण उस अन्न के त्यागने पर - अतिकृच्छ्रव्रतकरे ॥ २६३ अन्त्यज के हाथ से फेंके हुए काठ-ढेला और तृणों को और अन्त्यज के उच्छिष्ट को स्पर्श करके एक दिन रात का व्रत करे ॥२६४॥यदि भोजन करता हुआ द्विज चांडाल-पतित-म्लेछ-मदिरा का पात्र और रजस्व-
अत्रिस्मृतिः ॥ ४९
द्विजःस्पृष्ट्वानभुञ्जीत भुञ्जानोयदिसंस्पृशेत् ॥२६५॥
अतःपरंतुभुञ्जीत त्यक्त्वाऽन्नंस्नानमाचरेत् ।
ब्राह्मणैःसमनुज्ञातस्त्रिरात्रमुपवासयेत् ॥२६६॥
सघृतंयावकं प्राश्य व्रतशेषंसमापयेत् ।
भुञ्जानः संस्पृशेद्यस्तु वायसंकुकुटंतथा ॥ २६७ ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्या-दथोच्छिष्टस्त्वहेनतु ।
आरूढोनैष्ठिकेधर्मे यस्तुप्रच्यवतेपुनः ॥ २६८ ॥
चान्द्रायणंचरेन्मास-मितिशातातपोऽब्रवीत् ।
पशुवेश्याभिगमने प्राजापत्यंविधीयते ॥ २६९ ॥
गवांगमनेमनुप्रोक्तं व्रतं चान्द्रायणंचरेत् ।
अमानुषीषुगोवर्जं मुदक्यायामयोनिषु ॥ २७०॥
रेतःसिक्त्वाजलेचैव कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ।
उदक्यांसूतिकांवापि अंत्यजांस्पृशतेयदि ॥२७१॥
का छून का स्पर्श करे तो भोजन न करे-अर्थात् उपवास करे ॥ २६५ ॥ स्पर्श
करने के पश्चात् भोजन न करे किन्तु उस अन्न को त्याग कर स्नान करे और
ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर तीन उपवास करे ॥२६६॥ और घीमें मिले जौ को
खाकर बाकी व्रत को पूरा करे-यदि भोजन करता हुआ काक और मुरगे को
छूले ॥२६७॥ तो तीन दिन में शुद्धि होती है यदि उच्छिष्ट हुआ पूर्वोक्तों का स्पर्श
करले तो एक दिन में शुद्ध होता है-जो नैष्ठिक धर्म जन्मभर ब्रह्मचारी रहता हु-
आ गुरु सेवाकी प्रतिज्ञा करके उसको त्यागता है ॥२६८॥ वह एक मासभर
चांद्रायण व्रत करै यह शातातप ऋषिने कहा है । पशु और वेश्या के संग गमन
करने से प्राजापत्य व्रत कहा है ॥२६९॥ गौवों के संग गमन (मैथुन) कर के मनु
के कहे हुए चांद्रायण व्रतको करे-गौसे भिन्न पशु की योनि और रजस्वला और
योनि से भिन्न (भूमि आदि) में ॥२७०॥ और जल में वीर्य को सींच कर सांतपन
कृच्छ्रकरै । चांडाली-सूतिका-और अंत्यज की स्त्री इनका यदि स्पर्शकरै तो ॥२७१॥
४८ भाषार्थंसहिता ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्या-द्विधिरेषपुरातनः ।
संसर्गंयदिगच्छेच्चे-दुदक्यावातथांत्यजैः ॥ २७२ ॥
प्रायश्चित्तीसविज्ञेयः पूर्वंस्नानंसमाचरेत् ।
एकरात्रंचरेन्मूत्रं पुरीषंतुदिनत्रयम् ॥ २७३ ॥
दिनत्रयंतथापानं मैथुनेपंचसप्तवा ।
स्मृत्यन्तरे
अंगीकारेणज्ञातीनां ब्राह्मणानुग्रहेणच ॥ २७४ ॥
पूयन्तेतत्रपापिष्ठा महापातकिनोऽपिये ।
भोजनेतुप्रसक्तानां प्राजापत्यंत्रिधीयते ॥ २७५ ॥
दंतकाष्ठेत्वहोरात्र-मेषशौचविधिःस्मृतः।
रजस्वलायदास्पृष्टा श्वानचांडालवायसैः ॥ २७६ ॥
निराहाराभवेत्तावत् स्नात्वाकालेनशुद्ध्यति ।
तीन दिन में शुद्धि होती है,यह पुरानी विधिहै-रजस्वला और अन्त्यज स्त्री इनके संग जो मेल होजाय ॥२७२॥ तो वह इस प्रायश्चित्त के योग्य है कि पहिले स्नान करै फिर एक दिन गोमूत्र और तीन दिन गोबर को भक्षण करै ॥ २७३ ॥ रजस्वला तथा अंत्यजा स्त्री इनके जलपान और मैथुन करने में पांच अथवा सात दिन पूर्वोक्त प्रायश्चित्त करे-यह अन्यस्मृ-तियों में लिखा है कि कुटुम्बी पुरुषों के स्वीकार करने और ब्राह्मणों के अनुग्रह से ॥ २७४ ॥ जो महापातकी भी पापी हैं वे भी पवित्र हो जाते हैं और निषिद्ध नीच लोगों के भोजन में जो आसक्त हैं वे प्राजापत्यव्रत करें ॥२७५॥ नीच मनुष्यकी दी दातौन करने में जो प्रसक्त हैं वे एक दिनरात प्रायश्चित्त करें यह शौच की विधि कही=जिस रजस्वला स्त्री को कुत्ता चांडाल काक ये स्पर्श करलें ॥२७६॥ वह रजकी शुद्धितक निराहार रहे और शुद्ध होनेके समय (चौथेदिन) स्नान करके शुद्ध हो जाती है-यदि रजस्वला स्त्री को ऊंट-
अत्रिसमृतिः ॥ ४२
रजस्वलायदास्पृष्टा उष्ट्रजंबुकशंबरैः ॥ २७७ ॥
पञ्चरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्पृष्टारजस्वलान्यो न्यंब्राह्मणयाब्राह्मणीचया २७८
एकरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मण्याक्षत्रियाचया ॥२७६॥
त्रिरात्रेणविशुद्धिःस्याद् व्यासस्यवचनंयथा ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मण्याशूद्रसंभवा ॥ २८० ॥
षट्रात्रेणविशुद्धिःस्याद् ब्राह्मणीकामकारतः ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यंब्राह्मण्यावैश्यसंभवा ॥ २८१ ॥
चतूरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
अकामतश्चरेदूर्ध्वं ब्राह्मणीसर्वतःस्पृशेत् ॥ २८२॥
चतुर्णामपिवर्णानां शुद्धिरैषाप्रकीर्तिता ।
उच्छिष्टेनतुसंस्पृष्टो ब्राह्मणो ब्राह्मणेनयः ॥ २८२ ॥
गौण्ड-शंबर (बड़शिंगा) कालै ॥२७७॥ तो पांच दिन तक निराहार रहे और फिर पंचगव्य से शुद्धि होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने ब्राह्मणी रजस्वला का स्पर्श कर लिया हो ॥२७८॥ तो एक दिन निराहार रह कर पंचगव्य से शुद्धि होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने क्षत्रिया रजस्वला का स्पर्श कर लिया होय ॥ २७९॥ तो व्यास के वचन के अनुसार क्षत्रिया तीन दिन में शुद्ध होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला शूद्राणी रजस्वला का स्पर्श करले॥२८०॥ तो शूद्र स्त्री छः दिन में शुद्ध होती है और पूर्वोक्त रजस्वला ब्राह्मणी अपनी इच्छा के अनुसार कुछ व्रत आदि कर के शुद्ध हो जाती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने वैश्य जातिकी रजस्वला का स्पर्श कर लिया होय ॥२८१॥ तो वैश्य स्त्री चार दिन निराहार रह कर पंचगव्य से शुद्ध होती है औरों की ॥ इच्छा के अनुसार ब्राह्मणी प्रायश्चित्त करे और फिर सब का स्पर्श करे ॥२८२॥ चारों वर्णों की यह शुद्धि कही है-यदि उच्छिष्ट ब्राह्मण ने उच्छिष्ट ब्राह्मण का स्पर्शकर लिया हो तो ॥ २८२ ॥
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५७ | भाषार्थसहिता ॥
भोजनेमूत्रचारेश्च शंखस्यवचनंयथा ।
स्नानंब्राह्मणसंस्पर्शे जपहोमौतुक्षत्रिये ॥ २८३ ॥
वैश्येनक्तंचकुर्वीत शूद्रेचैवोपपोषणम् ।
चर्मकेर जकेवैश्ये धीवरेनटकेतथा ॥ २८४ ॥
एतान्स्पृष्ट्वाद्विजोमोहा·दाचमेत्प्रयतोपिसन् ।
एतैःस्पृष्टोद्विजोनित्य·मेकरात्रंपयःपिबेत् ॥ २८५ ॥
उच्छिष्टैस्तैस्त्रिरात्रंस्याद् घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ।
यस्तुछायांश्र्वपाकस्य ब्राह्मणस्त्वधिगच्छति ॥ २८६ ॥
तत्रस्नानंप्रकुर्वीत घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ।
अभिशस्तोद्विजोऽरण्ये ब्रह्महत्याव्रतंचरेत् ॥ २८७ ॥
मासोपवासंकुर्वीत चान्द्रायणमथापिवा ।
वृथामिथ्योपयोगेन भ्रूणहत्याव्रतंचरेत् ॥ २८८ ॥
अभक्षोद्वादशाहेन पराकेणैवशुद्ध्यति ।
भोजन के उच्छिष्ट में अथवा मूत्र के त्याग के उच्छिष्ट में शंखऋषि के वचनानुसार ब्राह्मण के स्पर्श में स्नान और क्षत्रिय के स्पर्श में जप होम कहे हैं ॥ २८३ ॥ और वैश्य के स्पर्श में रात भर व्रत करे और शूद्र के स्पर्श में एक उपवास करे-और चमार धोबी-वैश्य (वैश्या का पुत्र) धींबर- और नट ॥२८४॥ इन का अज्ञान से ब्राह्मण स्पर्श करके सावधान होकर आचमन करे यदि ये ब्राह्मण का स्पर्श करलें तो एक दिन दुग्धपान करे ॥२८५॥ और यदि पूर्वोक्त चमार आदि उच्छिष्ट हुए ब्राह्मण का स्पर्श करलें तो ब्राह्मण तीन दिन का व्रत करके घृत को खाकर शुद्ध होता है-यदि ब्राह्मण श्वपाक की छाया में चले बैठे वा खड़ा रहे २८६ ॥ तो स्नान करे और घृत खाकर शुद्ध होता है । जो ब्राह्मण अभिशस्त (कलंकित) हो वह वन में जाकर ब्रह्म-हत्या का व्रत करै कि ॥२८७ ॥ एक मास तक उपवास करे अथवा चान्द्रायण करे । यदि वृथा हीं (झूठा) हिंसा का दोष लगा हो तो भ्रूणहत्या का व्रत करै कि ॥२८८॥ बारह दिन जलका ही भक्षण करके पराक व्रत से शुद्ध
अत्रिस्मृतिः ॥ ५२
शठंचब्राह्मणंहत्वा शूद्रहत्याव्रतंचरेत् ॥ २८९ ॥ निर्गुणं चगुणीहत्वा पराकंव्रतमाचरेत् । उपपातकसंयुक्तो मानवोम्रियतेयदि ॥ २९० ॥ तस्यसंस्कारकर्ताच प्राजापत्यद्वयंचरेत् । प्रभुञ्जानोतिसस्नेहं कदाचित्स्पृश्यतेद्विजः ॥ २९१ ॥ त्रिरात्रमाचरेन्नक्तं निःस्नेहमथवाचरेत् । विडालवायसोच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्यच ॥२९२॥ केशकीटावपन्नंच पिबेद्ब्राह्मींसुवर्चसम् । उष्ट्रयानंसमारुह्य खरयानंचकामतः ॥ २९३ ॥ स्नात्वाविप्रोजितप्राणः प्राणायामेनशुद्ध्यति सव्याहृतींसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ॥ २९४ ॥ त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ।
होता है । शठ ब्राह्मण को मार कर शूद्र की हत्या का व्रत करै ॥ १८९ ॥ विद्वान् ब्राह्मण मूर्ख को मार डाले तो पराक व्रत करे यदि जिस को उपपातक लगा हो वह मनुष्य मरजाय तो ॥ २९० ॥ उस का मृतक कर्म करने वाला दो प्राजापत्यव्रत करै । अत्यंत स्नेह सहित पदार्थ को भक्षण करते हुए ब्राह्मण को कदाचित् कोई छूले तो ॥ २९१ ॥ तीन दिन तक नक्त व्रत करै अथवा घृत के बिना सूखा भोजन करै । विलाव काक-कुत्ता-नीला इन के उच्छिष्ट को भक्षण करके ॥२९२॥ और जिस में बाल या कीड़े, पड़े हों उसे खाकर ब्राह्मी ओषधिको पीवे । अपनी इच्छा से ऊंट=गधा इन के यान (सवारी) पर बैठे तो ॥२९३॥ ब्राह्मण स्नान और सूक्ष्म भोजन करके प्राणायाम से शुद्ध होता है । भूआदि सातव्याहृती और (ओम् आपोज्योती०) यह गायत्री शिर इससहित गायत्री को॥२९४॥तीन वार श्वासरोककर जो पढ़े उसे प्राणायाम कह-
५२ भाषार्थसहिता ॥
शकृद्द्विगुणगोमूत्रं सर्पिर्दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ २९५ ॥ क्षीरमष्टगुणं देयं पंचगव्यंतथादधि । पंचगव्यंपिवेच्छूद्रो ब्राह्मणस्तुसुरांपिवेत् ॥ २९६ ॥ उभौतौतुल्यदोषौचवसतोनरकेचिरम् । अजागावोमहिष्यश्च अमेध्यंभक्षयन्तियाः ॥ २९७ ॥ दुग्धंहव्येचकव्येच गोमयंनविलेपनेत् । ऊनस्तनीमधीकांवा याचस्वस्तनपायिनी ॥ २९८ ॥ तासांदुग्धंनहोतव्यं हुतंचैवाहुतं भवेत् । ब्राह्मौदनेचसोमेच सीमन्तोन्नयनेतथा ॥ २९९ ॥ जातश्राद्धेनवश्राद्धे भुक्त्वाषान्द्रायणंचरेत् । राजान्नंहरतेतेजः शूद्रान्नंब्रह्मवर्चसम् ॥ ३०० ॥ स्वसुतान्नंचयोभुङ्क्ते सभुङ्क्तेपृथिवीमलम् । स्वसुताअप्रजाताच नाश्नीयात्तद्गृहेपिता ॥ ३०१ ॥
ते हैं। गोबर से दूना गोमूत्र चौगुना घी-॥२९५॥ आठ गुना दूध और आठ गुना दही डाले यह पंचगव्य कहाता है। यदि शूद्र उक्त पंचगव्य को पीवे और ब्राह्मण मदिरा को पीवे ॥ २९६ ॥ तो वे दोनों तुल्य दोष के भागी हैं और चिरकाल तक नरक में वसते हैं। जो बकरी गौ और भैंस विष्ठादि अशुद्ध वस्तु को खाती हों ॥२९७॥ तो हव्य और कव्य में उन का दूध न ले और उन के गोबर से लीपे भी नहीं। जिस के थन छोटे हों अथवा ४ से अधिक हों- जो रोगिन हो और जो अपने थन को स्वयं पीती हो ॥२९८॥ ऐसी गौ आदि के दुग्ध से होम न करे क्योंकि वह किया हुआ होम बिन किए के समान हो जाता है। ब्राह्मौदन (अग्न्याधानादि के समय चावल बनते हैं) सोम यज्ञ - सीमंत, इन में ॥२९९॥ और जातकर्म के श्राद्ध और नवक श्राद्ध में भोजन करके चांद्रायण व्रत करे। राजा का अन्न तेज को और शूद्र का ब्रह्म तेज को हरता है ॥३००॥ अपनी लड़की के अन्न को जो खाता है वह जानो पृथिवी के मल को खाता है और जिस लड़की के संतान न हुई हो उसके घर में भी पिता न खाये ॥३०१॥
अत्रिस्मृतिः ॥ ५३
भुङ्क्तेत्वस्यामाययान्नं पूयसंनरकंब्रजेत् । अधीत्यचतुरोवेदान्सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् ॥ ३०२ ॥ नरेन्द्रभवनेभुक्त्वा विष्ठायांजायतेकृमिः । नवश्राद्धेत्रिपक्षेच षण्मासेमासिकेऽब्दिक ॥३०३॥ पतन्तिपितरस्तस्य योभुङ्क्तेनापदिद्विजः । चान्द्रायणंनवश्राद्धे पराकोमासिकेतथा ॥३०४॥ त्रिपक्षेचातिकृच्छ्रँ स्यात् षण्मासेकृच्छ्रमेवच । आब्दिक पादकृच्छ्रं स्या-देकाहःपुनराब्दिक ॥३०५॥ ब्रह्मचर्यमनाधाय मासश्राद्धेषुपर्व्वसु । द्वादशाहेत्रिपक्षेऽब्दे यस्तुपक्षेद्विजोत्तमः ॥३०६॥ पतन्तिपितरस्तस्य ब्रह्मलोकेगताअपि । पक्षेवायदिवामासे यस्यनाश्नन्तिवैद्विजाः ॥३०७॥
और जो प्रजा हीन लड़की के अन्न को छल से खाता है वह पूयस नामक नरक में जाता है-चार वेदों को पढ़कर सब शास्त्रों के तत्त्व को जानने बाला पुरुष ३०२॥ राजा के घर में भोजन करके विष्टा में कीड़ा होता है। नवक श्राद्ध [मनुष्य के मरने पर ग्यारहवें दिन के श्राद्ध को नव वा नवक श्राद्ध कहते हैं] त्रिपक्ष का, छमाही का मासिक और वार्षिक इन श्राद्धों में ॥३०३॥ आपत्ति के बिना जो ब्राह्मण भोजन करता है उस के पितर नरक में पड़ते हैं। नवक श्राद्ध में चांद्रा-यण, मासिकश्राद्ध में पराक, ॥३०४॥ त्रिपक्ष (१॥ मास) के श्राद्ध में अति कृच्छ्र छेमाही के श्राद्ध में कृच्छ्र पहिले वार्षिक वर्षों में पाद कृच्छ्र, और दूसरे वार्षिक में एक दिन उपवास करै ॥३०५॥ बिना ब्रह्मचर्य से किए मासिक श्राद्ध में पर्व्व (पूर्णामासी आदि) में मृतक के द्वादशाह में—त्रिपक्ष में—और वार्षिक श्राद्ध में जो ब्राह्मण भोजन करता है ॥ ३०६ ॥ ब्रह्मलोक में गये भी उस के पितर नरक में जाते हैं। जिस गृहस्थी के घर में पक्ष अथवा महीने में ब्राह्मण भो-जन न करते हों॥ ३०७ ॥
एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वासंचयनेत्र्यहम् ॥ ३०८ ॥
५४ भाषार्थसहिता ॥
भुक्त्वादुरात्मनस्तस्य द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् । एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वासंचयनेत्र्यहम् ॥ ३०८ ॥ उपोष्यविधिवद्विप्रः कूष्मांडीर्जुहुयाद्घृतम् यन्नवेदध्वनिस्नातं नचगोभिरलंकृतम् ॥३०९॥ यन्नबालैःपरिवृतं श्मशानमिवतद्गृहम् । हास्येपिबहवोयत्र विनाधर्मंवदन्तिहि ॥३१०॥ विनापिधर्मशास्त्रेण सधर्मोपावनःस्मृतः । हीनवर्णेचयःकुर्यात् अज्ञानादभिवादनम् ॥ ३११ ॥ तत्रस्नानंप्रकुर्वीत घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति । समुत्पन्नेयदास्नाने भुङ्क्ते वापिपिबेद्यदि ॥३१२॥ गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपेत्स्नात्वासमाहितः । अंगुल्यादन्तकाष्टंच प्रत्यक्षंलवणंतथा ॥ ३१३ ॥
उस दुष्टचित्त वाले के अन्न को खाकर द्विज चांद्रायण व्रत करे । सूतक के ग्यारह वें दिन भोजन करके एक रात दिन और अस्थि संचयन के दिन भोजन करेतो तीन दिन तक ॥३०८॥ विधि से उपवास करके बैठे और घी से हवन करे । जो घर वेद के उच्चारण से पवित्र नहीं-और जो गौओं से शोभायमान नहीं है ॥ ३०९ ॥ और जो बालकों से भराहुआ नहीं है वह घर मरघट भूमि के तुल्य है । हंसी में भी जहां बहुत मनुष्य अधर्म से भिन्न जो कुछ कर्त्तव्य कहते हों ३१० ॥ और चाहे वह उन बहुत मनुष्यों का कथन धर्म शास्त्र के विरुद्ध भी होती वह उनका कथन परम धर्म कहा है- जो अपने से नीचे वर्ण को अज्ञान से अभिवादन करता है ॥ ३११ ॥ वह मनुष्य स्नान कर के घी को चाटे तो शुद्ध होता है-जो स्नान के योग्य मनुष्य विना स्नान किये भोजन करले अथवा जलपान करले तो ॥३१२॥ स्नान करके सावधानता से आठ हजार गायत्री जपै । अंगुली सहित दातौन प्रत्यक्ष (केवल) लवण का भक्षण ॥ ३१३ ॥
अत्रिसमृतिः ॥ ५३
मृत्तिकाभक्षणंचैव तुल्यंगोमांसभक्षणम् । दिवाकपित्थच्छायायां रात्रौदधिशमीषुच ॥३१४॥ कर्पासदन्तकाष्ठंच विष्णोरपिश्रियंहरेत् । शूर्पवातो नखाग्रांबु स्नानवस्त्रांघटोदकम् ॥ ३१५ ॥ मार्जनीर जकेशांबु देवतायतनोग्द्ववम् । येनावर्लुंठितंतेषु गङ्गांभःप्लुतएवसः ॥ ३१६ ॥ मार्जनीरेणुकेशांबु हन्तिपुण्यंदिवाकृतम् । मृत्तिकाःसप्तनग्राह्या वल्मीकेऊपरस्थले ॥ ३१७ ॥ अंतर्जलेश्मशानांते वृक्षमूलेसुरालये । वृषमैश्चतयोत्खाते श्रेयस्कामैःसदाबुधैः ॥ ३१८ ॥ शुचौदेशेसुसंग्राह्या शर्कराश्मविवर्जिता ।
और मिट्टी का भक्षण करने के समान दूषित है दिन में कैथ की छाया रात में दधि का भक्षण शमी (छोंकर) की छाया ॥३१४॥ और कपास की दातौन ये विष्णु की भी लक्ष्मी को हरते हैं अर्थात् ये विशेष कर चिकित्सा शास्त्रके अनुसार भी अधिक हानिकारक हैं। - सूप की पवन-नखों के अग्रभाग का जल-स्नान का वस्त्र-और घटका जल ॥३१५॥ और मार्जनी (झाडू) की धूल-और केशों का जल यदि ये पूर्वोक्त छःओं देवता के स्थान के हों और इनमें जो लोटे तोवह पुरुषमानो गंगाजीकेजल में लोटा ॥३१६॥ मार्जनी की धूल और केशों का जल ये दोनों दिन भरमें किये पुण्य को नष्टकरते हैं-सात जगह की मिट्टी ग्रहण न करे बमी की भूमों के स्थान की ॥३१७॥ जल के भीतर की-श्मशान की-वृक्ष की जड़ की-देवता के स्थान की-और जो बैलों ने खोदी हो इन सातों को कल्याण चाहने वाला ब्राह्मण शुभ काम के लिये ग्रहण न करे ॥३१८॥ कङ्कर और पत्थर जिस में न हों ऐसी शुद्ध स्थान की मिट्टी ग्रहण करे। शौच फिरते, मैथुन, होम, लघुशङ्का, औ दन्त-
५६ | भाषार्थसहिता-
पुरीषेमैथुनेहोमे प्रस्त्रावेदंतधावने ॥ ३१९ ॥
स्नानभोजनजाप्येषु सदामौनंसमाचरेत् ।
यस्तुसंवत्सरपूर्णं भुङ्क्ते मौनेनसर्वदा ॥ ३२० ॥
युगकोटिसहस्रेषु स्वर्गलोकेमहीयते ।
स्नानंदानंजपं होमं भोजनंदेवतार्चनम् ॥ ३२१ ॥
व्यूढपादोनकुर्वीत स्वाध्यायःपितृतर्पणम् ।
सर्वस्वमपियोदद्यात् पातयित्वाद्बिजोत्तमम् ॥ ३२२ ॥
नाशयित्वातुतत्सर्वं भ्रूणहत्याफलंभवेत् ।
ग्रहणोद्वाहसक्रांतौ स्त्रीणांचप्रसवेतथा ॥ ३२३ ॥
दानंनैमित्तिकंज्ञेयं रात्रावपिप्रशस्यते ।
क्षौमंजंवाथकार्पासं पट्टसूत्रमथापिवा ॥ ३२४ ॥
यज्ञोपवीतंदद्या-द्वस्त्रदानफलंलभेत् ।
कांस्यस्यभोजनंदद्याद् घृतपूर्णंसुशोभनम् ॥ ३२५ ॥
धावन करते समय तथा ॥३१९॥ स्नान, भोजन, और जप करते समय में मौन धारण करे । जो मनुष्य एक वर्ष भर सदा मौन होकर भोजन करता है ॥३२०॥ वह एक हजार किरोड़ युग तक स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है । स्नान दान, जप, होम, भोजन, और देवता का पूजन ॥३२१॥ वेद का पढ़ना और पितरों का तर्पण इन आठ कामों को पांव पसार कर न करे । जो मनुष्य गिराकर अर्थात् ब्राह्मण मार कर अपने सर्व धनादि को भी दान देता है ॥३२२॥ तो भी वह उस सब को नष्ट कराकर भ्रूण (गर्भ) हत्या के फल को प्राप्त होता है । ग्रहण, विवाह, संक्रान्ति, और स्त्रियों का प्रसव—इन मौकों पर दिया दान नैमित्तिक जानो वह दान रात्रि में भी ॥३२३॥ करना योग्य कहा है—रेशम—सूत—पाठ का सूत्र इन के ॥ ३२४ ॥ यज्ञोपवीत को जो देता है वह वस्त्र दान के फलको प्राप्तहोता है—जो घी से भरे कांसे के पात्र को देता है ॥३२५॥
क
अत्रिस्मृतिः ॥ ५१
तथाभक्त्याविधानेन अग्निष्टोमफलंलभेत् । श्राद्धकालेतुयोदद्यात् शोभनेचउपानहौ ॥ ३२६ ॥ सगच्छत्यन्नमार्गेपि अश्वदानफलंलभेत् । तैलपात्रंतुयोदद्यात्संपूर्णं सुसमाहितः ॥ ३२७ ॥ सगच्छतिध्रुवंस्वर्गे नरोनास्त्यत्रसंशयः । दुर्भिक्षेअन्नदाताच सुभिक्षेचहिरण्यदः ॥ ३२८ ॥ पानप्रदस्त्वरण्येतु स्वर्गलोकेमहीयते । यावदर्धप्रसूतागौस्तावत्सापृथिवीस्मृता ॥३२९॥ पृथिवीतेनदत्तास्या-दीदृशींगांददाति यः । तेनाग्नयोहुताःसम्यक् पितरस्तेनतर्पिताः ॥३३०॥ देवाश्चपूजिताःसर्वे योददातिगवान्हिकम् । जन्मप्रभृतियत्पापं-मातृकंपैतृकंतथा ॥ ३३१ ॥ तत्सर्ननश्यतिक्षिप्रं वस्त्रदानान्नसंशयः ।
भक्ति और विधि से देने वाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल को प्राप्त होता है। जो श्राद्ध के समय सुन्दर उपानह दान में देता है ॥३२६॥ वह जिस में अन्न मिले ऐसे मार्ग में गमन करता हुआ अश्व के दान के फल को प्राप्त होता है—जो सावधान होकर भरा हुआ तैल का पात्र देता है । ३२७ ॥ वह मनुष्य निश्चय से स्वर्ग में जाता है इस में सन्देह नहीं है—दुर्भिक्ष में अन्नका दाता सुभिक्ष में सुवर्ण का देने वाला ॥ ३२८ ॥ और वन जंगल में प्याऊ द्वारा जल का दान करने वाला स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है । जब तक गौ अधव्यानी (आधा बच्चा भीतर और आधा बाहर) हो तब तक वह पृथिवी के तुल्य है ॥ ३२९ ॥ जिसने ऐसी गौ दी उसने मानो पृथिवी का दान किया। उसने जानो अग्निहोत्र किया और उसीने पितर तृप्त किये॥३३०॥ तथा उसीने संपूर्ण देवता पूजे कि जो गौ को प्रति दिन खाने को देता है। जन्म से लेकर जो पाप किया तथा माता या पिता का जो अपराध किया हो ॥३३१॥ वह संपूर्ण वस्त्र के देने से उसी समय नष्ट हो जाता है । शङ्खआदि सहित का
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५८ भाषार्थसहिता ॥
कृष्णाजिनंतुयोदद्या-त्सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ ३३२ ॥
उद्धरेन्नरकस्थाना-त्कुलान्येकोत्तरंशतम् ।
आदित्योवरुणोविष्णुर्ब्रह्मासोमोहुताशनः ॥ ३३३ ॥
शूलपाणिस्तुभगवान् अभिनन्दतिभूमिदम् ।
वालुकानांकृताराशि-र्यावत्सप्तर्षिमण्डलम् ॥ ३३५ ॥
गतेवर्षशतेचैव पलमेकंविशीर्यति ।
क्षयंचदृश्यतेतस्य कन्यादानेनचैवहि ॥३३६॥
आतुरेप्राणदाताच त्रीणिदानफलानिच ।
सर्वेषामेवदानानां विद्यादानंततोधिकम् ॥ ३३७ ॥
पुत्रादिस्वजनेदद्या-द्विप्रायचनकैतवे ।
सकामःस्वर्गमाप्नोति निष्कामोमोक्षमाप्नुयात् ॥३३८॥
ब्राह्मणेवेदविदुषि सर्वशास्त्रविशारदे ।
मातृपितृपरेचैव ऋतुकालाभिगामिनि ॥ ३३९ ॥
ली मृगछाला को जो देता है ॥ ३३२ ॥ वह नरक में पड़े एक सौ एक कुलों का उद्धार करता है । सूर्य—वरुण—विष्णु—ब्रह्मा—चन्द्रमा—अग्नि ॥ ३३३ ॥ और भगवान् शिव जी भूमि के देने वाले की प्रशंसा करते हैं । सात ऋषियों के मंडल पर्यन्त किया जो बालू (रेत) का ढेर है॥३३५॥ वह भी वर्ष पीछे एक पल २ भी कमती होने से नष्ट हो जाता है परन्तु कन्या के दान में जो धर्म होता है वह नष्ट नहीं होता ॥३३६॥ आतुर (दुःखी) को प्राण का दान जो देता है उसको दान के तीन फल (धर्म अर्थ काम) होते हैं । सब दानों के बीच में सब से अधिक विद्या का दान है ॥३३७॥ पुत्र आदि स्वजन को-और सुपात्र ब्राह्मण को विद्या दे और कपटी को न दे-कुछ कामना रखने वाला-स्वर्ग को तथा किसी द्रव्य आदि की इच्छा न करने वाला मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ३३८ ॥ जो ब्राह्मण वेद को जानता हो, शास्त्रों में जो चतुर हो माता पिता का भक्त हो—और जो ऋतु के समय में ही स्त्री से संग करता हो ॥ ३३९ ॥
अत्रिस्मृतिः ॥
शीलचारित्रसंपूर्णे प्रातःस्नानपरायणे ।
तस्यैवदीयतेदानं यदीच्छेच्छ्रेयआत्मनः ॥ ३४० ॥
संपूज्यविदुषोविप्रान् अन्येभ्योपिप्रदीयते ।
तत्कार्यंनैवकर्तव्यं नदृष्टंनश्रुतंमया ॥ ३४१ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि श्राद्धकर्मणियेद्विजाः ।
पितृणामक्षयंदानं दत्तंयेषांतुनिष्फलम् ॥ ३४२ ॥
नहीनांगोनरोगीच श्रुतिस्मृतिविवर्जितः ।
नित्यंचानृतवादीच वणिक्श्राद्धेनभोजयेत् ॥३४३॥
हिंसारतंचकपटमुपगुह्याश्रुतंचयः ।
किंकरंकपिलंक्राणं श्वित्रिणंरोगिणंतथा ॥ ३४४ ॥
दुश्चर्माणंशीर्णकेशं पाण्डुरोगंजटाधरम् ।
भारवाहितरौद्रंच द्विभार्यंवृषलीपतिम् ॥ ३४५ ॥
शील तथा उत्तम आचरण में लगा हो और प्रातःकाल स्नान में जो तत्पर हो ऐसे सुपात्र ब्राह्मण को अपना कल्याण चाहने वाला दाता दान दे ॥३४०॥ विद्वान् ब्राह्मण का प्रथम पूजन करके अन्य (मूर्ख) ब्राह्मणों को दान देवे । और उस कार्य को नहीं करना जिस को स्वयं न देखा और न सुना हो ॥३४१॥ इस से आगे यह कहते हैं कि श्राद्ध कर्म में कैसे ब्राह्मण हों कि पितरों के निमित्त जिन को दिया दान अक्षय फल दायक होता और जिन को दिया निष्फल होता है ॥ ३४२ ॥ लूना लंगड़ा आदि (रोगी) श्रुति स्मृति को न पढ़ा न जानता हो—जो नित्य झूठ बोलता हो जो व्यापारी हो इन ब्राह्मणों को श्राद्ध में न जिमावे ॥ ३४३ ॥ हिंसा में तत्पर—कपटी—और जो अपने वेद को छिपा कर किंकर बन जाय—पीला—काणा—श्वेतकुष्ठ वा अन्य रोग जिसे घेरे हो ॥ ३४४ ॥ जिस के देह की त्वचा बिगड़ी फटी हो—जिस के केश गिर पड़े हों—पाण्डुरोगी—जटाधारी—भार (बोझ) का ढोने वाला—भयानक—जिस के दो स्त्री हों—शूद्र स्त्री से जिस ने विवाह किया हो ॥ ३४५ ॥
६० भाषार्थसहिता-
भेदकारीभवेच्चैव बहुपीडाकरोपिवा । हीनातिरिक्तगात्रोवा तमप्यपनयेत्तथा ॥ ३४६ ॥
बहुभोक्तादीनमुखो मत्सरीक्रूरबुद्धिमान् । एतेषांनैवदातव्यः कदाचित्त्तुप्रतिग्रहः ॥ ३४७ ॥
अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपंक्तिदूषणैः । अदुष्यंतंयमःप्राह पंक्तिपावनएषसः ॥ ३४८ ॥
श्रुतिःस्मृतिश्चविप्राणां नयनेद्वेप्रकीर्तिते । काणःस्यादेकहीनोपि द्वाभ्यामन्धःप्रकीर्तितः ॥३४९॥
नश्रुतिर्नस्मृतिर्यस्य नशीलंनकुलंयतः । तस्यश्राद्धंनदातव्यं त्वन्धकस्यात्रिरब्रवीत् ॥३५०॥
तस्माद्वेदेनशास्त्रेण ब्राह्मणंब्राह्मणस्यतु । नचैकेनैववेदेन भगवानत्रिरब्रवीत् ॥ ३५१ ॥
भेद का कर्त्ता (मन फटाने वाला) बहुतों को पीड़ा करने वाला जिस के अङ्ग हीन (कम) अथवा अधिक हों-इन को श्राद्ध में से दूरकर दे ॥ ३४६॥ बहुत खाने वाला-जिसके मुखपर दीनताझलकती हो-जो दूसरेके गुणोंमें दोषोंको देखता हो-कठोर जिस की बुद्धि हो-ऐसे को कदाचित भी दान नहीं देवे ॥ ३४७ ॥ जो ब्राह्मण वेद को पढ़ा हो तथा जानता हो और चाहे वह शरीर में जो दोष कहे हैं उन वाला भी हो-तो भी उस को यम ने शुद्ध कहा है क्योंकि वह पङ्क्ति को पवित्र करने वाला है ॥ ३४८ ॥ वेद और स्मृति ये दोनों ब्राह्मणों के नेत्र कहे हैं-इन के मध्य में एक को जो नहीं जानता वह काणा और जो दोनों को न जानता हो वह अंधा शास्त्र में कहा है ॥ ३४९ ॥ जो न वेद को और न स्मृति को जानता हो-न शील वान्हो-न कुलीन हो उस अंधे को श्राद्ध में निमन्त्रण नहीं देना यह अत्रि ऋषि ने कहा है ॥ ३५० ॥ जिस से ब्राह्मण का ब्राह्मणपन वेद और शास्त्र से ही है किन्तु केवल वेद से नहीं है यह भगवान् अत्रि ने कहा है ॥ ३५१ ॥
अत्रिसमृतिः ॥ ६१
योगस्थैर्लोचनैर्युक्तः पादाग्रंचप्रपश्यति । लौकिकज्ञश्चशास्त्रोक्तं पश्येच्चैषोधरोत्तरम् ॥३५२॥ वेदैश्चऋषिभिर्गीतं दृष्टिमान्शास्त्रवेदवित् । व्रतिनंचकुलीनंच श्रुतिस्मृतिरतंसदा ॥३५३ ॥ तादृशंभोजयेच्छ्राद्धे पितॄणामक्षयंभवेत् । यावतो ग्रसतेग्रासान् पितॄणांदीप्ततेजसाम् ॥३५४॥ पितापितामहश्चैव तथैवप्रपितामहः । नरकस्थाविमुच्यंते ध्रुवंयांतित्रिविष्टपम् ॥ ३५५ ॥ तस्माद्विप्रंपरीक्षेत श्राद्धकालेप्रयत्नतः । ननिर्वपति यःश्राद्धंप्रमीतपितृकोद्विजः ॥३५६ ॥ इन्दोःक्षयेमासिमासि प्रायश्चित्तीभवेत्तुसः । सूर्येकन्यागतेकुर्या-च्छ्राद्धंयोनगृहाश्रमी ॥३५७ ॥
योग शास्त्र में कहे अनुसार जिस के नेत्र हों-और अपने चरणों के अग्रभाग को ही जो देखता है अर्थात् कहीं भी कुदृष्टि न करता हो लौकिक व्यवहार जानता हो और शास्त्र में कहे ऊंच नीच को जो देखता हो ॥३५२॥ और ज्ञानवान् हो-शास्त्र और वेद का ज्ञाता हो-व्रत करने वाला हो-कुलीन हो-वेद और स्मृतियों के पठन और पाठम में जो तत्पर हो ॥३५३॥ ऐसे ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे तो पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। प्रदीप्त तेज वाले पितरों सम्बन्धी जितने ग्रासों को पूर्वोक्त ब्राह्मण खाता है उतने ही शीघ्र २ ॥ ३५४ ॥ पिता-पितामह-और प्रपितामह ये सब नरक में पड़े हुए भी मुक्त हो जाते हैं और निश्चय कर स्वर्ग को प्राप्त हो जाते हैं ॥३५५॥ तिस से श्राद्ध के समय बड़े यत्न से ब्राह्मण की परीक्षा करै । जिस द्विज का पिता मरगया हो यदि वह ॥३५६॥ महीने २ में अमावस के दिन श्राद्ध नहीं करता तो प्रायश्चित्त के योग्य होता है । कन्या के सूर्य कन्यागत कहाते उसी का बिगड़ा शब्द ( कनागत ) होगया है उस काल में जो गृहस्थी श्राद्ध न करै ॥ ३५७ ॥
६२ | भाषार्थसहिता ॥
धनंपुत्रान्कुलंतस्य पितृनिश्वासपीडया ।
कन्यागतेसवितरि पितरोयान्तिसत्सुतान् ॥ ३५८ ॥
शून्याप्रेतपुरीसत्रां यावद्वृश्चिकदर्शनम् ।
ततोवृश्चिकसंप्राप्ते निराशाःपितरोगताः ॥३५९ ॥
पुनःस्वभवनंयान्ति शापंदत्वासुदारुणम् ।
पुत्रंवाभ्रातरंवापि दौहित्रंपौत्रकंतथा ॥ ३६० ॥
पितृकार्येप्रसक्ताये तेयान्तिपरमांगतिम् ।
यथानिर्मंथनादग्निः सर्वकाष्ठेषुतिष्ठति ॥ ३६१ ॥
तथासंदृश्यतेधर्मः श्राद्धदानान्नसंशयः ।
यःप्राप्नोतितदासर्वं कन्यागतेचगंगया ॥ ३६२ ॥
सर्वशास्त्रार्थगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् ।
सर्वयज्ञफलंविद्याच्छ्राद्धदानान्नसंशयः ॥ ३६३ ॥
महापातकसंयुक्तो योयुक्तश्चोपपातकैः ॥
तो पितरों की लंबीश्वास द्वारा उस का धन पुत्र और कुल नष्ट होता है । कन्या राशि पर जब सूर्य आते हैं तब पितर अपने उत्तम पुत्रों के समीप आते हैं ॥ ३५८ ॥ जब तक वृश्चिक की संक्रांति नहीं लगती तब तक यमराज की पुरी शून्य रहती है फिर वृश्चिक संक्रांति के आते ही निराश होकर पितर लौट जाते हैं ॥ ३५९ ॥ फिर वे यहां भयानक शाप देकर अपने लोक को चले जाते हैं पुत्र-भाई-लड़की का लड़का-और पोता ॥ ३६० ॥ जो ये सब पितरों के श्राद्ध में तत्पर हों तो वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं-जैसे मथने से सब काठों में अग्नि की स्थिति दीखती है ॥३६१॥ वैसे ही श्राद्ध के देने से धर्म का विस्तार प्रत्यक्ष दीखता है' इस में संशय नहीं है। और जो कनागतों में गंगा पर श्राद्ध करता है उसे सब फल प्राप्त होता है ॥ ३६२ ॥ सब शास्त्रों के अर्थों को जानना-सब तीर्थों में स्नान-और सब यज्ञों का