भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५२ भाषार्थसहिता ॥

शकृद्द्विगुणगोमूत्रं सर्पिर्दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ २९५ ॥ क्षीरमष्टगुणं देयं पंचगव्यंतथादधि । पंचगव्यंपिवेच्छूद्रो ब्राह्मणस्तुसुरांपिवेत् ॥ २९६ ॥ उभौतौतुल्यदोषौचवसतोनरकेचिरम् । अजागावोमहिष्यश्च अमेध्यंभक्षयन्तियाः ॥ २९७ ॥ दुग्धंहव्येचकव्येच गोमयंनविलेपनेत् । ऊनस्तनीमधीकांवा याचस्वस्तनपायिनी ॥ २९८ ॥ तासांदुग्धंनहोतव्यं हुतंचैवाहुतं भवेत् । ब्राह्मौदनेचसोमेच सीमन्तोन्नयनेतथा ॥ २९९ ॥ जातश्राद्धेनवश्राद्धे भुक्त्वाषान्द्रायणंचरेत् । राजान्नंहरतेतेजः शूद्रान्नंब्रह्मवर्चसम् ॥ ३०० ॥ स्वसुतान्नंचयोभुङ्क्ते सभुङ्क्तेपृथिवीमलम् । स्वसुताअप्रजाताच नाश्नीयात्तद्गृहेपिता ॥ ३०१ ॥

ते हैं। गोबर से दूना गोमूत्र चौगुना घी-॥२९५॥ आठ गुना दूध और आठ गुना दही डाले यह पंचगव्य कहाता है। यदि शूद्र उक्त पंचगव्य को पीवे और ब्राह्मण मदिरा को पीवे ॥ २९६ ॥ तो वे दोनों तुल्य दोष के भागी हैं और चिरकाल तक नरक में वसते हैं। जो बकरी गौ और भैंस विष्ठादि अशुद्ध वस्तु को खाती हों ॥२९७॥ तो हव्य और कव्य में उन का दूध न ले और उन के गोबर से लीपे भी नहीं। जिस के थन छोटे हों अथवा ४ से अधिक हों- जो रोगिन हो और जो अपने थन को स्वयं पीती हो ॥२९८॥ ऐसी गौ आदि के दुग्ध से होम न करे क्योंकि वह किया हुआ होम बिन किए के समान हो जाता है। ब्राह्मौदन (अग्न्याधानादि के समय चावल बनते हैं) सोम यज्ञ - सीमंत, इन में ॥२९९॥ और जातकर्म के श्राद्ध और नवक श्राद्ध में भोजन करके चांद्रायण व्रत करे। राजा का अन्न तेज को और शूद्र का ब्रह्म तेज को हरता है ॥३००॥ अपनी लड़की के अन्न को जो खाता है वह जानो पृथिवी के मल को खाता है और जिस लड़की के संतान न हुई हो उसके घर में भी पिता न खाये ॥३०१॥