अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअत्रिस्मृतिः ॥ ५३
भुङ्क्तेत्वस्यामाययान्नं पूयसंनरकंब्रजेत् । अधीत्यचतुरोवेदान्सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् ॥ ३०२ ॥ नरेन्द्रभवनेभुक्त्वा विष्ठायांजायतेकृमिः । नवश्राद्धेत्रिपक्षेच षण्मासेमासिकेऽब्दिक ॥३०३॥ पतन्तिपितरस्तस्य योभुङ्क्तेनापदिद्विजः । चान्द्रायणंनवश्राद्धे पराकोमासिकेतथा ॥३०४॥ त्रिपक्षेचातिकृच्छ्रँ स्यात् षण्मासेकृच्छ्रमेवच । आब्दिक पादकृच्छ्रं स्या-देकाहःपुनराब्दिक ॥३०५॥ ब्रह्मचर्यमनाधाय मासश्राद्धेषुपर्व्वसु । द्वादशाहेत्रिपक्षेऽब्दे यस्तुपक्षेद्विजोत्तमः ॥३०६॥ पतन्तिपितरस्तस्य ब्रह्मलोकेगताअपि । पक्षेवायदिवामासे यस्यनाश्नन्तिवैद्विजाः ॥३०७॥
और जो प्रजा हीन लड़की के अन्न को छल से खाता है वह पूयस नामक नरक में जाता है-चार वेदों को पढ़कर सब शास्त्रों के तत्त्व को जानने बाला पुरुष ३०२॥ राजा के घर में भोजन करके विष्टा में कीड़ा होता है। नवक श्राद्ध [मनुष्य के मरने पर ग्यारहवें दिन के श्राद्ध को नव वा नवक श्राद्ध कहते हैं] त्रिपक्ष का, छमाही का मासिक और वार्षिक इन श्राद्धों में ॥३०३॥ आपत्ति के बिना जो ब्राह्मण भोजन करता है उस के पितर नरक में पड़ते हैं। नवक श्राद्ध में चांद्रा-यण, मासिकश्राद्ध में पराक, ॥३०४॥ त्रिपक्ष (१॥ मास) के श्राद्ध में अति कृच्छ्र छेमाही के श्राद्ध में कृच्छ्र पहिले वार्षिक वर्षों में पाद कृच्छ्र, और दूसरे वार्षिक में एक दिन उपवास करै ॥३०५॥ बिना ब्रह्मचर्य से किए मासिक श्राद्ध में पर्व्व (पूर्णामासी आदि) में मृतक के द्वादशाह में—त्रिपक्ष में—और वार्षिक श्राद्ध में जो ब्राह्मण भोजन करता है ॥ ३०६ ॥ ब्रह्मलोक में गये भी उस के पितर नरक में जाते हैं। जिस गृहस्थी के घर में पक्ष अथवा महीने में ब्राह्मण भो-जन न करते हों॥ ३०७ ॥