अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ भाषार्थसहिता ॥
भुक्त्वादुरात्मनस्तस्य द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् । एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वासंचयनेत्र्यहम् ॥ ३०८ ॥ उपोष्यविधिवद्विप्रः कूष्मांडीर्जुहुयाद्घृतम् यन्नवेदध्वनिस्नातं नचगोभिरलंकृतम् ॥३०९॥ यन्नबालैःपरिवृतं श्मशानमिवतद्गृहम् । हास्येपिबहवोयत्र विनाधर्मंवदन्तिहि ॥३१०॥ विनापिधर्मशास्त्रेण सधर्मोपावनःस्मृतः । हीनवर्णेचयःकुर्यात् अज्ञानादभिवादनम् ॥ ३११ ॥ तत्रस्नानंप्रकुर्वीत घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति । समुत्पन्नेयदास्नाने भुङ्क्ते वापिपिबेद्यदि ॥३१२॥ गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपेत्स्नात्वासमाहितः । अंगुल्यादन्तकाष्टंच प्रत्यक्षंलवणंतथा ॥ ३१३ ॥
उस दुष्टचित्त वाले के अन्न को खाकर द्विज चांद्रायण व्रत करे । सूतक के ग्यारह वें दिन भोजन करके एक रात दिन और अस्थि संचयन के दिन भोजन करेतो तीन दिन तक ॥३०८॥ विधि से उपवास करके बैठे और घी से हवन करे । जो घर वेद के उच्चारण से पवित्र नहीं-और जो गौओं से शोभायमान नहीं है ॥ ३०९ ॥ और जो बालकों से भराहुआ नहीं है वह घर मरघट भूमि के तुल्य है । हंसी में भी जहां बहुत मनुष्य अधर्म से भिन्न जो कुछ कर्त्तव्य कहते हों ३१० ॥ और चाहे वह उन बहुत मनुष्यों का कथन धर्म शास्त्र के विरुद्ध भी होती वह उनका कथन परम धर्म कहा है- जो अपने से नीचे वर्ण को अज्ञान से अभिवादन करता है ॥ ३११ ॥ वह मनुष्य स्नान कर के घी को चाटे तो शुद्ध होता है-जो स्नान के योग्य मनुष्य विना स्नान किये भोजन करले अथवा जलपान करले तो ॥३१२॥ स्नान करके सावधानता से आठ हजार गायत्री जपै । अंगुली सहित दातौन प्रत्यक्ष (केवल) लवण का भक्षण ॥ ३१३ ॥