भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिसमृतिः ॥ ५३

मृत्तिकाभक्षणंचैव तुल्यंगोमांसभक्षणम् । दिवाकपित्थच्छायायां रात्रौदधिशमीषुच ॥३१४॥ कर्पासदन्तकाष्ठंच विष्णोरपिश्रियंहरेत् । शूर्पवातो नखाग्रांबु स्नानवस्त्रांघटोदकम् ॥ ३१५ ॥ मार्जनीर जकेशांबु देवतायतनोग्द्ववम् । येनावर्लुंठितंतेषु गङ्गांभःप्लुतएवसः ॥ ३१६ ॥ मार्जनीरेणुकेशांबु हन्तिपुण्यंदिवाकृतम् । मृत्तिकाःसप्तनग्राह्या वल्मीकेऊपरस्थले ॥ ३१७ ॥ अंतर्जलेश्मशानांते वृक्षमूलेसुरालये । वृषमैश्चतयोत्खाते श्रेयस्कामैःसदाबुधैः ॥ ३१८ ॥ शुचौदेशेसुसंग्राह्या शर्कराश्मविवर्जिता ।


और मिट्टी का भक्षण करने के समान दूषित है दिन में कैथ की छाया रात में दधि का भक्षण शमी (छोंकर) की छाया ॥३१४॥ और कपास की दातौन ये विष्णु की भी लक्ष्मी को हरते हैं अर्थात् ये विशेष कर चिकित्सा शास्त्रके अनुसार भी अधिक हानिकारक हैं। - सूप की पवन-नखों के अग्रभाग का जल-स्नान का वस्त्र-और घटका जल ॥३१५॥ और मार्जनी (झाडू) की धूल-और केशों का जल यदि ये पूर्वोक्त छःओं देवता के स्थान के हों और इनमें जो लोटे तोवह पुरुषमानो गंगाजीकेजल में लोटा ॥३१६॥ मार्जनी की धूल और केशों का जल ये दोनों दिन भरमें किये पुण्य को नष्टकरते हैं-सात जगह की मिट्टी ग्रहण न करे बमी की भूमों के स्थान की ॥३१७॥ जल के भीतर की-श्मशान की-वृक्ष की जड़ की-देवता के स्थान की-और जो बैलों ने खोदी हो इन सातों को कल्याण चाहने वाला ब्राह्मण शुभ काम के लिये ग्रहण न करे ॥३१८॥ कङ्कर और पत्थर जिस में न हों ऐसी शुद्ध स्थान की मिट्टी ग्रहण करे। शौच फिरते, मैथुन, होम, लघुशङ्का, औ दन्त-