भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५६ | भाषार्थसहिता-

पुरीषेमैथुनेहोमे प्रस्त्रावेदंतधावने ॥ ३१९ ॥
स्नानभोजनजाप्येषु सदामौनंसमाचरेत् ।
यस्तुसंवत्सरपूर्णं भुङ्क्ते मौनेनसर्वदा ॥ ३२० ॥
युगकोटिसहस्रेषु स्वर्गलोकेमहीयते ।
स्नानंदानंजपं होमं भोजनंदेवतार्चनम् ॥ ३२१ ॥
व्यूढपादोनकुर्वीत स्वाध्यायःपितृतर्पणम् ।
सर्वस्वमपियोदद्यात् पातयित्वाद्बिजोत्तमम् ॥ ३२२ ॥
नाशयित्वातुतत्सर्वं भ्रूणहत्याफलंभवेत् ।
ग्रहणोद्वाहसक्रांतौ स्त्रीणांचप्रसवेतथा ॥ ३२३ ॥
दानंनैमित्तिकंज्ञेयं रात्रावपिप्रशस्यते ।
क्षौमंजंवाथकार्पासं पट्टसूत्रमथापिवा ॥ ३२४ ॥
यज्ञोपवीतंदद्या-द्वस्त्रदानफलंलभेत् ।
कांस्यस्यभोजनंदद्याद् घृतपूर्णंसुशोभनम् ॥ ३२५ ॥


धावन करते समय तथा ॥३१९॥ स्नान, भोजन, और जप करते समय में मौन धारण करे । जो मनुष्य एक वर्ष भर सदा मौन होकर भोजन करता है ॥३२०॥ वह एक हजार किरोड़ युग तक स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है । स्नान दान, जप, होम, भोजन, और देवता का पूजन ॥३२१॥ वेद का पढ़ना और पितरों का तर्पण इन आठ कामों को पांव पसार कर न करे । जो मनुष्य गिराकर अर्थात् ब्राह्मण मार कर अपने सर्व धनादि को भी दान देता है ॥३२२॥ तो भी वह उस सब को नष्ट कराकर भ्रूण (गर्भ) हत्या के फल को प्राप्त होता है । ग्रहण, विवाह, संक्रान्ति, और स्त्रियों का प्रसव—इन मौकों पर दिया दान नैमित्तिक जानो वह दान रात्रि में भी ॥३२३॥ करना योग्य कहा है—रेशम—सूत—पाठ का सूत्र इन के ॥ ३२४ ॥ यज्ञोपवीत को जो देता है वह वस्त्र दान के फलको प्राप्तहोता है—जो घी से भरे कांसे के पात्र को देता है ॥३२५॥