भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिस्मृतिः ॥ ५१

तथाभक्त्याविधानेन अग्निष्टोमफलंलभेत् । श्राद्धकालेतुयोदद्यात् शोभनेचउपानहौ ॥ ३२६ ॥ सगच्छत्यन्नमार्गेपि अश्वदानफलंलभेत् । तैलपात्रंतुयोदद्यात्संपूर्णं सुसमाहितः ॥ ३२७ ॥ सगच्छतिध्रुवंस्वर्गे नरोनास्त्यत्रसंशयः । दुर्भिक्षेअन्नदाताच सुभिक्षेचहिरण्यदः ॥ ३२८ ॥ पानप्रदस्त्वरण्येतु स्वर्गलोकेमहीयते । यावदर्धप्रसूतागौस्तावत्सापृथिवीस्मृता ॥३२९॥ पृथिवीतेनदत्तास्या-दीदृशींगांददाति यः । तेनाग्नयोहुताःसम्यक् पितरस्तेनतर्पिताः ॥३३०॥ देवाश्चपूजिताःसर्वे योददातिगवान्हिकम् । जन्मप्रभृतियत्पापं-मातृकंपैतृकंतथा ॥ ३३१ ॥ तत्सर्ननश्यतिक्षिप्रं वस्त्रदानान्नसंशयः ।


भक्ति और विधि से देने वाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल को प्राप्त होता है। जो श्राद्ध के समय सुन्दर उपानह दान में देता है ॥३२६॥ वह जिस में अन्न मिले ऐसे मार्ग में गमन करता हुआ अश्व के दान के फल को प्राप्त होता है—जो सावधान होकर भरा हुआ तैल का पात्र देता है । ३२७ ॥ वह मनुष्य निश्चय से स्वर्ग में जाता है इस में सन्देह नहीं है—दुर्भिक्ष में अन्नका दाता सुभिक्ष में सुवर्ण का देने वाला ॥ ३२८ ॥ और वन जंगल में प्याऊ द्वारा जल का दान करने वाला स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है । जब तक गौ अधव्यानी (आधा बच्चा भीतर और आधा बाहर) हो तब तक वह पृथिवी के तुल्य है ॥ ३२९ ॥ जिसने ऐसी गौ दी उसने मानो पृथिवी का दान किया। उसने जानो अग्निहोत्र किया और उसीने पितर तृप्त किये॥३३०॥ तथा उसीने संपूर्ण देवता पूजे कि जो गौ को प्रति दिन खाने को देता है। जन्म से लेकर जो पाप किया तथा माता या पिता का जो अपराध किया हो ॥३३१॥ वह संपूर्ण वस्त्र के देने से उसी समय नष्ट हो जाता है । शङ्खआदि सहित का