भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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विष्णुस्मृतिः ॥ ९

काले चतुर्थे संप्राप्ते गृहे वा यदि वा बहिः ॥ ३६ ॥
आसीनः पश्चिमां सन्ध्यां गायत्रीं शक्तितो जपेत् ।
हुत्वा चाथाग्निहोत्रं तु कृत्वा चाग्निपरिक्रियाम् ॥ ३७॥
बलिं च विधिवद्धुत्वा भुञ्जीत विधिपूर्वकम् ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ अतिथित्वत्राव्रजेद्यदि ॥ ३८॥
तृणभूवारिवाग्भिस्तु पूजयंत्तद्यथाविधि ।
कथाभिः प्रीतिमाहृत्य विद्यादीन्विचारयेत् ॥ ३९॥
संनिवेश्याथ विप्रं तु संविशेत्तदनुज्ञया ।
यदि योगी तु संप्राप्तो भिक्षार्थी समुपस्थितः ॥ ४० ॥
योगिनं पूजयेन्नित्य--मन्यथा किल्विषी भवेत् ।
पुरे वा यदि वा ग्रामे योगी सन्निहितो भवेत् ॥ ४१ ॥
पूज्या नित्यं भवन्त्येव सर्वे चैत्रनिवासिनः ।


(महा भारत आदि) का भी कुछ पाठ वा विचार करे और सायंकाल होने पर घर में वा बाहर ॥ ३६ ॥ पश्चिम दिशा के सम्मुख बैठा हुआ सन्ध्योपा-सन करे और यथाशक्ति गायत्री का जप करे फिर सायंकाल का अग्निहोत्र अग्नि की सेवा ॥ ३७॥ और गृह्योक्त विधि से केवल बलि कर्म नामक भूतयज्ञ करके विधि पूर्वक भोजन करे । अर्थात् रात में देवयज्ञ रूप होम का निषेध है । जो दिन में वा रात्रि में कोई अभ्यागत आजाय तो ॥ ३८ ॥ तृण (आ-सन) भूमि बैठने का जगह, जल, और आदर सूचक वाणी से उस का सत्कार करे जाने आने की कथा (बड़ी कृपा की कि आप आये इत्यादि) से उस को संतुष्ट करके विद्या आदि का विचार करे ॥ ३९ ॥ अतिथि को प्रथम निद्रा करा उसकी आज्ञा लेकर आप सोवे । यदि भिक्षा के लिये योगी आजावे तो उस के समीप जाकर ॥ ४० ॥ योगी का विशेष पूजन करे अन्यथा पाप लगता है । नगर में वा ग्राम में यदि योगी प्राप्त हो ॥ ४१ ॥ तो उस योगी के आने से-वहा के निवासी सब पूजने योग्य होते हैं क्यों कि स्थान और वहां के