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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

विष्णुस्मृतिः ॥ ९

काले चतुर्थे संप्राप्ते गृहे वा यदि वा बहिः ॥ ३६ ॥
आसीनः पश्चिमां सन्ध्यां गायत्रीं शक्तितो जपेत् ।
हुत्वा चाथाग्निहोत्रं तु कृत्वा चाग्निपरिक्रियाम् ॥ ३७॥
बलिं च विधिवद्धुत्वा भुञ्जीत विधिपूर्वकम् ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ अतिथित्वत्राव्रजेद्यदि ॥ ३८॥
तृणभूवारिवाग्भिस्तु पूजयंत्तद्यथाविधि ।
कथाभिः प्रीतिमाहृत्य विद्यादीन्विचारयेत् ॥ ३९॥
संनिवेश्याथ विप्रं तु संविशेत्तदनुज्ञया ।
यदि योगी तु संप्राप्तो भिक्षार्थी समुपस्थितः ॥ ४० ॥
योगिनं पूजयेन्नित्य--मन्यथा किल्विषी भवेत् ।
पुरे वा यदि वा ग्रामे योगी सन्निहितो भवेत् ॥ ४१ ॥
पूज्या नित्यं भवन्त्येव सर्वे चैत्रनिवासिनः ।


(महा भारत आदि) का भी कुछ पाठ वा विचार करे और सायंकाल होने पर घर में वा बाहर ॥ ३६ ॥ पश्चिम दिशा के सम्मुख बैठा हुआ सन्ध्योपा-सन करे और यथाशक्ति गायत्री का जप करे फिर सायंकाल का अग्निहोत्र अग्नि की सेवा ॥ ३७॥ और गृह्योक्त विधि से केवल बलि कर्म नामक भूतयज्ञ करके विधि पूर्वक भोजन करे । अर्थात् रात में देवयज्ञ रूप होम का निषेध है । जो दिन में वा रात्रि में कोई अभ्यागत आजाय तो ॥ ३८ ॥ तृण (आ-सन) भूमि बैठने का जगह, जल, और आदर सूचक वाणी से उस का सत्कार करे जाने आने की कथा (बड़ी कृपा की कि आप आये इत्यादि) से उस को संतुष्ट करके विद्या आदि का विचार करे ॥ ३९ ॥ अतिथि को प्रथम निद्रा करा उसकी आज्ञा लेकर आप सोवे । यदि भिक्षा के लिये योगी आजावे तो उस के समीप जाकर ॥ ४० ॥ योगी का विशेष पूजन करे अन्यथा पाप लगता है । नगर में वा ग्राम में यदि योगी प्राप्त हो ॥ ४१ ॥ तो उस योगी के आने से-वहा के निवासी सब पूजने योग्य होते हैं क्यों कि स्थान और वहां के

८ भाषार्थसहिता ॥

तस्मात्पूजयेन्नित्यं योगिनंगृहमागतम् ॥ ४२ ॥
तस्मिन्प्रयुक्तायापूजा साक्षयायोपकल्पते ।
गृहमेधिनांयत्प्रोक्तं स्वर्गसाधनमुत्तमम् ॥४३॥
ब्राह्मेमुहूर्तउत्थाय तत्सर्वं सम्यगाचरेत् ।
चतुःप्रकारंभिद्यन्ते गृहिणोधर्मसाधकाः ॥४४॥
वृत्तिभेदेनसततं ज्यायांस्तेषांपरःपरः ।
कुसूलधान्यकोवास्यात्कुंभीधान्यकएववा ॥ ४५ ॥
त्र्यहैहिकोवापिभवे-त्सद्यःप्रक्षालकोपिवा ।
श्रौतंस्मार्तचयत्किंचिद्विधानंधर्मसाधनम् ॥४६॥
गृहेतद्वसताकार्य-मन्यथादोषभाग्भवेत् ।
एवंविप्रोगृहस्थस्तु शान्तःशुक्लांबरःशुचिः ॥ ४७ ॥


मनुष्य पवित्र होजाते हैं तिस से घर में आये योगी का नित्य पूजन करे ॥४२॥ उस योगी अभ्यागत की जो पूजा की जाती है वह अविनाशी सुख देने वाली होती है । गृहस्थियों के लिये स्वर्ग का साधन जो उत्तम कर्म है वह यही है कि ॥४३ ॥ ब्राह्म मुहूर्त ( ३ अथवा ४ घड़ी रात रहे पर) में उठ कर उस (पू-र्वोक्त ) कर्म का भली प्रकार सेवन करै-धर्म के सिद्ध करने वाले गृहस्थी अ-पनी जीविका के भेद से चार प्रकार से भिन्न २ होते हैं ॥४४॥ उन में अगले-२ श्रेष्ठ हैं १ कुसूलधान्यक ( कोठे में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से ३ वर्ष नि-र्वाह हो ) २ कुंभी धान्यक ( कुंडी में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से १ वर्ष निर्वाह हो ) ॥ ४५ ॥ ३ त्र्यहैहिक (तीन दिनका जो अन्न रक्खै ) महा प्रक्षा-लक ( प्रति दिन खाने को लाने वाला ) श्रुति वा स्मृतियों में कहा जो धर्म का साधन कर्म है ॥ ४६ ॥ घर में बसते हुये मनुष्य को यह सब करना चाहिये क्योंकि न करने से दोष का भागी होता है इस प्रकार शांत स्वभाव-शुक्ल व-स्त्रों वाला-शुद्ध-गृहस्थी ब्राह्मण ॥ ४७ ॥

विष्णुस्मृतिः ॥

प्रजापतेः परं स्थानं सम्प्राप्नोति न संशयः ।
इति वैष्णवे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वनवासं यदाचरेत् ॥ ४८ ॥
चीरवल्कलधारी स्यादाकृष्टान्नशनो मुनिः ।
गत्वा च विजनं स्थानं पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ॥४९॥
अग्निहोत्रं च जुहुयादन्नैर्नीवारकादिभिः ।
श्रावणेनाग्निमादाय ब्रह्मचारी वने स्थितः ॥५०॥
पञ्चयज्ञविधानेन यज्ञं कुर्यादतन्द्रितः ।
संचितं तु यदारण्यं भक्तार्थं विधिवद्वने ॥ ५१ ॥
त्यजेदाश्वयुजे मासि वन्यमन्यत्समाहरेत् ।
आकाशशायी वर्षासु हेमन्ते च जलाशयः ॥ ५२ ॥
ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो भवेन्नित्यं वने वसन् ।


अच्छा उत्तम स्थान को प्राप्त होता है इस में सन्देह नहीं है ॥
इति विष्णुस्मृतौ द्वितीयोऽध्यायः ॥

गृहस्थी वा ब्रह्मचारी जब वन में निवास करना चाहे ॥ ४८ ॥ तब चीर (चीथड़े) वा वृक्षों के वक्कल को वस्त्रों की जगह धारण करे और अकृष्टान्न (जो बिना जोते बोए पैदा हो) वन के मुन्यन्न को भक्षण करे और मौन रहे और निर्जन स्थान में जाकर भी पञ्चयज्ञों का परित्याग न करे ॥ ४९ ॥ नीवार आदि अन्न से अग्निहोत्र भी करे और श्रावण मास में अग्नि को लेकर वन में जावे और ब्रह्मचर्य धारण कर वहां रहे ॥ ५० ॥ निरालस होकर पञ्चयज्ञके विधान से यज्ञ करे। जो भोजन के लिये वनका अन्न इकट्ठा किया हो ॥५१॥ उस को आश्विन के मास में त्याग दे और वन में पैदा हुए नये अन्न को संग्रह करे और वर्षा काल में आकाश (खुले ऊंचे स्थान) में जाड़ों में जल में ॥ ५२ ॥ तथा ग्रीष्म ऋतु (गरमी) में पंचाग्नि [चारों दिशामें अग्नि जलता ता हो उसके बीच में बैठे ऊपर से सूर्य्य तपते हों इसको पञ्चाग्नि तप कहते हैं]

१० भाषार्थसहिता ॥

कृच्छ्रं चान्द्रायणंचैव तुलापुरुषमेवच ॥ ५३ ॥ अतिकृच्छ्रं प्रकुर्वीत त्यक्त्वाकामान्शुचिस्ततः । त्रिसन्ध्यंस्नानमातिष्ठेत्सहिष्णुर्भूतजान्गुणान् ॥ ५४ ॥ पूजयेदतिथींश्चैव ब्रह्मचारीवनंगतः । प्रतिग्रहनगृहणीया-त्परेषांकिंचिदात्मवान् ॥ ५५ ॥ दाताचैवभवेन्नित्यं श्रद्दधानःप्रियंवदः । रात्रौस्थण्डिलशायीस्या-त्प्रपदैस्तुदिनंक्षिपेत् ॥ ५६ ॥ वीरासनेनतिष्ठेद्वा क्लेशमात्मन्यचिंतयन् । केशरोमनखश्मश्रु नच्छिन्द्यान्नापिकर्त्तयेत् ॥ ५७॥ त्यजन्शरीरसौहार्दं वनवासरतःशुचिः । चतुःप्रकारंभिद्यन्ते मुनयःशंसितव्रताः ॥ ५८ ॥ अनुष्ठानविशेषेण श्रेयांस्तेषांपरःपरः ।


के मध्य में वन में बसता हुआ मनुष्य नित्य रहे और तिसके अनन्तर कृच्छ्र , चांद्रायण-तुला पुरुष॥५३॥ अतिकृच्छ्र इन व्रतों को निष्काम होकर शुद्धता से करे और पांचो भूतों के गुणों ( शब्द, स्पर्श, रूप-रस-गन्ध-) को सहता हुआ त्रिकाल स्नान करे ॥ ५४ ॥ वन में प्राप्त हुआ ब्रह्मचारी वानप्रस्थ अतिथियों का पूजन करै और अपने आपमें नियम बद्ध रहता हुआ किसी से प्रतिग्रह (दान) न ले ॥ ५५ ॥ प्रियभाषी और श्रद्धावान् होकर जो अपने पास फल मूलादि हों उनका प्रतिदिन दान दिया करे स्वयं बनाये मंच ( चबूतरे ) पर रातमें सोवे और पैरों की अंगुलियोंसे खड़ा जप करता हुआ दिनकोविता दे ॥५६॥ अथवा अपने मनमें क्लेश मानता हुआ वीरासन से दिन में बैठा रहै और शिरके केश-रोम-नख-दाढ़ी-इनको न कैंची से कतरावे और न खुरे से कटावे ॥ ५७॥ वन वास में तत्पर शुद्ध अपने शरीर की प्रीति को छोड़ता हुआ अपने पूर्वोक्त कर्म को करे इस उत्तम प्रशस्त व्रतवाले मुनि अनुष्ठान के भेद से चारप्रकार के होते हैं॥५८॥ उनमें अगला श्रेष्ठ है-१ वर्ष भरके लिये विधि पूर्वक

विष्णुस्मृतिः ॥ ११

वार्षिकं वन्यमाहार-माहृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ५९ ॥
वनस्थधर्ममातिष्ठन्नयेत्कालं जितेन्द्रियः ।
भूरिसंवार्षिकश्चायं वनस्थः सर्वकर्मकृत् ॥ ६० ॥
आदेहपतनात्तिष्ठेन्मृत्युं चैवानकांक्षति ।
षण्मासांस्तुततश्चान्यः पञ्चयज्ञक्रियापरः ॥ ६१ ॥
कालेचतुर्थभुञ्जानो देहंत्यजतिधर्मतः ।
त्रिंशद्दिनार्थमाहृत्य वन्यान्नानिशुचिव्रतः ॥६२॥
निर्वर्त्यसर्वकार्याणि स्याच्चषष्ठान्नभोजनः ।
दिनार्थमन्नमादाय पञ्चयज्ञक्रियारतः ॥६३॥
सद्यःप्रक्षालकोनाम चतुर्थःपरिकीर्तितः ।
एवमेतेहि वैमान्या मुनयःशंसितव्रताः ॥६४॥
इति० वैष्ण० धर्म० तृतीयोऽध्यायः ॥३॥


वन के आहार (नीवारादि) को संचय करके वानप्रस्थों के धर्म में ठहरा हुआ इन्द्रियोंको जीत और आलस्य को छोड़कर ॥ ५९ ॥ काल को जो व्यतीत करे इन सब कर्मों के कर्त्ता वानप्रस्थ को भूरिसंवाषिक कहते हैं ॥ ६० ॥ २ दूसरा-मरण तक वन में रहै और मृत्यु की भी इच्छा न करे पंचमहायज्ञ करने में तत्पर हुआ छः महीने तक के अन्नका संचय करके ॥ ६१ ॥ चौथे काल (सन्ध्या) में भोजन करता हुआ धर्म से देह को त्यागता है । ३ तीसरा तीस दिन के लिये वन के अन्न का संचय करके और शुद्ध व्रत होकर ॥ ६२ ॥ सब कर्मों को करके छठे प्रहर में रात को दश बजे भोजन करे । ४ चौथा एक दिन के लिये अन्न का संग्रह करके पञ्चमहायज्ञ कर्म में तत्पर रहै ॥६३॥ यह सद्यः प्रक्षालक नाम चौथा कहा है इस प्रकार ये चारों प्रशस्त व्रतवाले मुनि पूजनीय होते हैं ॥६४॥

इति विष्णुस्मृतौ ३ अध्यायः ।

१२ भाषार्थसहिता ॥

यथोत्तमानि स्थानानि प्राप्नुवन्तिदृढव्रताः । ब्रह्मचारी गृहस्थोवा वानप्रस्थोयतिस्तथा ॥६५॥ विरक्तःसर्वकामेषु पारिव्राज्यंसमाश्रयेत् । आत्मन्यग्नीन्समारोप्यदत्वाचाभयदक्षिणाम् ॥६६॥ चतुर्थमाश्रमंगच्छेद्व्राह्मणःप्रव्रजन्गृहात् ॥ आचार्येणसमादिष्टं लिङ्गंयत्नात्समाश्रयेत् ॥६७॥ शौचमाश्रमसम्वद्धं यतिधर्मांश्चशिक्षयेत् । अहिंसासत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमफल्गुता ॥६८॥ दयांचसर्वभूतेषु नित्यमेतद्यतिश्चरेन् । ग्रामान्तेवृक्षमूलेच नित्यकालनिकेतनः । ६९॥ पर्यटेत्कीटवद्भूमिं वर्षास्वेकत्रसंविशेत् । वृद्धानामातुराणांच भीरुणांसंगवर्जितः ॥७०॥


भा०जिस प्रकार ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ और यतिये चारों दृढ़ व्रत हुए उत्तम स्थान (ब्रह्म लोक) को प्राप्त होते हैं वह यह है कि ॥६५॥ सब कामनाओं से विरक्त हो संन्यास का सम्यक् आश्रय लेवे कि यही सब इष्ट का साधक है अपने शरीर ही में अग्नियों का समारोप मन्त्रपूर्वक करके और स्त्री आदिकों को अभय दक्षिणा दे (ठीक २ समझा कर) ॥ ६६ ॥

घर से चलकर ब्राह्मण चौथे आश्रम में पग धरे आचार्य के कहे हुए चिह्न (दंड आदि) को यत्न से धारण करे ॥ ६७ ॥ संन्यास के (यतीनांतुचतुर्णाश्म्) शौच और संन्यासियों के धर्मों को सीखे अहिंसा-सत्य-चोरी का त्याग-ब्रह्मचर्य-अफल्गुता (निरर्थक बोलने आदि का त्याग) ॥६८॥ सब प्राणियों पर दया इतने कर्म नित्य नियम से करे-ग्राम के समीप किसी वृक्ष के नीचे सदैव स्थान रक्खे ॥ ६९ ॥ कीड़े के समान पृथ्वी पर विचरे । वर्षा काल में एक जगह बैठे विचरे नहीं और वृद्ध-रोगी-डरपोक इन का संग न करे ॥ ७० ॥

पादुकेचापिगृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्यसंग्रहम् ।

विष्णुस्मृतिः ॥ १३

ग्रामेवापिपुरेवापि वासेनेकत्रदुष्यति । कौपीनाच्छादनंवासः कन्थांशीतापहारिणीम् ॥७१॥ पादुकेचापिगृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्यसंग्रहम् । संभाषणंसहस्त्रीभि–रालम्भप्रेक्षणेतथा ॥ ७२॥ नृत्यंगानंसभांसेवां परिवादांश्चवर्जयेत् । वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां प्रीतियत्नेनवर्जयेत् ॥ ७३ ॥ एकाकीविचरेन्नित्यं त्यक्त्वासर्वपरिग्रहम् । याचितायाचिताभ्यांतु भिक्षयाकल्पयेत्स्थितिम् ॥७४॥ साधुकारंयाचितंस्यात्प्राक्प्रणीतमयाचितम् । चतुर्विधाभिक्षुकाःस्यु कुटीचकवहूदकौ ॥ ७५ ॥ हंसःपरमहंसश्च पश्चाद्योयःसउत्तमः । एकदण्डीभवेद्वापि त्रिदण्डीवापिवाभवेत् ॥ ७६ ॥ त्यक्त्वासर्वसुखास्वादं पुत्रैश्वर्यसुखंत्यजेत् ।


ग्राम वा नगर में एक स्थान में बसने से संन्यासी को दोष लगता है । कौपीन (लंगोटी) ओढ़ने का वस्त्र, जिस में शीत न लगे ऐसी कन्था (गुदड़ी) ॥७१॥ और खडाऊ इन को ग्रहण करे । इन से भिन्न वस्तुओं का संग्रह न करै । स्त्रियों के संग बोलना–स्पर्श–देखना ॥ ७२ ॥ नाचना, गाना, सभा करना सेवा ( नौकरी ) निन्दा–इन को त्याग दे वानप्रस्थ और गृहस्थ के संग यत्न से प्रीति को त्याग दे ॥ ७३ ॥ सब प्रकार के परिग्रह ( अर्जनरक्षणावा–योगक्षेमों ) को त्यागकर अकेला विचरै–मांगने और बिना मांगने से जो भोजन मिले उस से अपना निर्वाह करै ॥ ७४ ॥ अच्छा कह कर लेने को याचित बिना मांगे जो मिले उसे अयाचित कहते हैं ये संन्यासी चार प्रकार के होते हैं–१ कुटीचक–२बहूदक ॥ ७५ ॥ ३ हंस–४ परमहंस–इन में जो २ पिछला २ है वह २ उत्तम है एक दंड को धारण करै वा तीन दंड को ॥ ७६ ॥ सब सुखों के स्वाद को त्याग पुत्र के ऐश्वर्य ( प्रताप ) के सुख को त्यागे अथवा.

१४ भाषार्थसहिता ॥

अपत्येषुवसेन्नित्यं ममत्वंयत्नतस्त्यजेत् ॥ ७७ ॥ नान्यस्यगेहेभुञ्जीत भुञ्जानोदोषभाग्भवेत् । कामंक्रोधंचलोभंच तथेर्ष्या'सत्यमेवच ॥ ७८ ॥ कुटीचकस्त्यजेत्सर्वं पुत्रार्थंचैवसर्वतः । भिक्षाटनादिकेऽशक्तो यतिःपुत्रेषुसंन्यसेत् ॥ ७९ ॥ कुटीचकइतिज्ञेयः परित्राट्त्यक्तबान्धवः। त्रिदण्डंकुण्डिकांचैव भिक्षाधारंतथैवच ॥ ८० ॥ सूत्रंतथैवगृह्णीयान्नित्यमेवबहूदकः । प्राणायामेप्यभिरतो गायत्रींसततंजपेत् ॥ ८१ ॥ विश्वरूपंहृदिध्यायन्नयेत्कालं जितेन्द्रियः । ईषत्कृतकषायस्य लिंगमाश्रित्यतिष्ठतः ॥ ८२ ॥ अन्नार्थंलिङ्गमुद्दिष्टं नमोक्षार्थमितिस्थितिः ।


अपने लड़कों ही में निश्चय बसे और यत्न से ममता को त्याग दे ॥ ७७ ॥ अन्य के घर में भोजन न करै क्योंकि दोष का भागी होता है और कामक्रोध लोभ ईर्ष्या, झूठ इन को छोड़ देवे ॥ ७८ ॥ पुत्र के लिये १ कुटीचक सब प्रकार से सब अन्नधनादि त्याग दे-भिक्षा मांगने आदि में असमर्थ हो तो संन्यासी अपने पुत्रों को ही अपना देह सौंपदे ॥ ७९ ॥ इस को कुटीचक कहते हैं-२ दूसरा त्याग दिये हैं बंधु जिसने ऐसा संन्यासी त्रिदंड-कुंडी और भिक्षा का पात्र ॥८० ॥ यज्ञोपवीत इन को बहूदक नित्य ग्रहण करै । प्राणायाम में तत्पर हुआ निरंतर गायत्री को जपे ॥ ८१ ॥ विश्व रूप भगवान् का हृदय में ध्यान करता हुआ इन्द्रियों को जीतकर काल को व्यतीत करै-कुछेक गेरुवा वस्त्रों को करके एक चिह्न (संन्यासकी पहचान) बनाकर अपने आश्रम में ठहरते हुए संन्यासी के ५२ ८२ ॥ चिन्ह अन्न भिक्षा मिलने के लिये नियत किये हैं मोक्ष के लिये कोई चिन्ह नहीं है ।

विष्णुस्मृतिः ॥ १५

त्यक्त्वापुत्रादिकंसर्वं योगमार्गव्यवस्थितः ॥८३॥
इन्द्रियाणिमनश्चैव कर्षन्हंसोभिधीयते ।
कृच्छ्रैश्चान्द्रायणैश्चैव तुलापुरुषसंज्ञकैः ॥ ८४ ॥
अन्यैश्चशोषयेद्देहमाकाङ्क्षन्ब्रह्मणःपदम् ।
यज्ञोपवीतंदंडंच वस्त्रंजंतुनिवारणम् ॥ ८५ ॥
अयं परिग्रहोनान्यो हंसस्यश्रुतिवेदिनः ।
आध्यात्मिकंब्रह्मजपन्प्राणायामांस्तथाचरन् ॥८६॥
वियुक्तःसर्वसंगेभ्यो योगी नित्यंचरेन्महीम् ।
आत्मनिष्ठःस्वयंयुक्तस्त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥ ८७ ॥
चतुर्थोयंमहानेषांध्यानभिक्षुरुदाहृतः ।
त्रिदण्डंकुण्डिकांचैव सूत्रंचाथकपालिकाम् ॥८८ ॥
जन्तूनांनिवारणंवस्त्रं सर्वंभिक्षुरिदंत्यजेत् ।


भा०-इस से सब पुत्रादि को त्याग और योगमार्ग में ठहर कर ॥४३॥ इन्द्रियां और मन को वश में करता हुआ संन्यासी हंस कहाता है। कृकू, चान्द्रायण, तुला पुरुष ॥८४॥ तथा अन्य व्रतों द्वारा ब्रह्मपद की इच्छा करता हुआ संन्यासी अपने देह को सुखादे-यज्ञोपवीत, दंड और जिस से जीव देह पर न गिरें ऐसा वस्त्र ॥ ८५ ॥ वेद के ज्ञाता हंस नामक संन्यासी को यही परिग्रह नाम वस्तुस्वीकार है अन्य नहीं। ४चौथा अध्यात्म नाम व्यापक प्रणव ब्रह्म को जपता और प्राणायामों को करता हुआ ॥ ८६ ॥ सब संगों से वियुक्त (रहित) अपने आपे में स्थित स्वयं युक्त हो कर सब स्वीकारों को त्यागने वाला योगी होकर पृथिवी पर नित्य विचरे ॥ ८७ ॥ यह चौथा इन चारों में बड़ा और ध्यान भिक्ष (परम हंस) कहा है। त्रिदंड-कुंडी-यज्ञोपवीत-(कपालिका) बड़े नारियल का आधा टुकड़ा वा खप्पर भिक्षा का पात्र ॥ ८८ ॥ जन्तुओं के निवारणार्थ वस्त्र इन सब को भी यह भिक्षु त्यागदे-कौपीन ओढने

१६ | भाषाधर्मसंहिता ॥

कोपोनाच्छादनार्थंच वासोऽद्यञ्चपरिग्रहेत् ॥ ८८ ॥
कुर्यात्परमहंसस्तु दण्डमेकंचधारयेत् ।
आत्मन्येवात्मनाबुद्ध्या परित्यक्तशुभाशुभः ॥९०॥
अव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्तश्च चरेद्भिक्षुःसमाहितः ।
प्राप्तपूजोनसंतुष्येदलाभेत्यक्तमत्सरः ॥ ९१ ॥
त्यक्ततृष्णःसदाविद्वान्मूकवत्पृथिवींचरेत् ।
देहसंरक्षणार्थंतु भिक्षामीहेद्द्विजातिषु ॥ ९२ ॥
पात्रमस्यभवेत्पाणिस्तेननित्यंगृहानटेत् ।
अतैजसानिपात्राणि भिक्षार्थंक्लृप्तवान्मनुः ॥९३॥
सर्वेषामेवभिक्षूणां दार्बलाबुमयानिच ।
कांस्यपात्रेनभुञ्जीत आपद्यपिकथंचन ॥९४॥
मलाशाःसर्वउच्च्यन्ते यतयःकांस्यभोजनाः ।


का वस्त्र इन का ही केवल धारण ॥ ८८ ॥ परम हंस करै और एक दण्ड का धारण करै और अपने मन में ही अपनी बुद्धि से त्याग दिया है शुभ और अशुभ कर्म जिसने ॥९०॥ ऐसा अपने चिन्ह को छिपा कर अप्रकट होकर सावधान हुआ विचरै पूजा ( बड़ाई ) की प्राप्ति से प्रसन्न न हो और आदर सत्कार न होने पर क्रोध न करै ॥ ९१ ॥ त्यागी है तृष्णा जिसने ऐसा ज्ञानी गूंगे के समान पृथिवी पर विचरै और देह की रक्षा के अर्थ द्विजातियों से भिक्षा मांगे ॥९२॥ भिक्षुक का पात्र हाथ है उसीसे नित्य गृहों में विचरै अर्थात् भिक्षा मांगे और मनु जी ने भिक्षा के लिये धातु से भिन्न काष्ठ तुंबा आदि के पात्र ॥९३॥ सब संन्यासियों को कहे हैं । और कांसे के पात्र में विपत्ति के समय भी संन्यासी लोग भोजन न करें ॥९४॥ कांसे के पात्र में खाने वाले सब संन्यासी मल ( विष्ठा ) के खाने वाले कहे हैं । कांसी के पात्र बनाने वाले को और

विष्णुस्मृतिः ॥ ९१

कांस्यकस्यतुयत्पापं गृहस्थस्यतथैवच ॥६५॥
कांस्यभोजीयतिःसर्वं तयोःप्राप्नोतिकिल्विषम् ।
ब्रह्मचारीगृहस्थश्च वानप्रस्थोयतिस्तथा ॥६६॥
उत्तमांवृत्तिमाश्रित्य पुनरावर्त्तयेद्यदि ।
आरूढपतितोज्ञेयः सर्वधर्म्मबहिष्कृतः ॥६७॥
निन्द्यश्चसर्वदेवानां पितॄणांचतथोच्यते।
त्रिदण्डंलिङ्गमाश्रित्य जीवन्तिबहवोद्विजाः ॥६८॥
नतेषामपवर्गोस्ति लिङ्गमात्रोपजीविनाम् ।
त्यक्त्वालोकांश्चवेदांश्च विषयानिन्द्रियाणिच ॥६९॥
आत्मन्येवस्थितोयस्तु प्राप्नोतिपरमंपदम् ।
इति० वैष्ण० धर्म्म० चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
राज्ञांतुपुण्यवृत्तानां त्रिवर्गपरिकाङ्क्षिणाम् ॥१००॥


उस में भोजन कराने वाले गृहस्थ को जो पाप होता है ॥६५॥ उन दोनों के उस पाप को काँसे के पात्र में भोजन करने वाला संन्यासी प्राप्त होता है । जो ब्रह्मचारी-गृहस्थ-वानप्रस्थ और संन्यासी इन में से कोई भी ॥६६॥ उत्तम आचरण नियम व्रत को स्वीकार कर फिर उसका त्याग करता है उसे आरूढ पतित कहते वह सब धर्मों से बहिष्कृत ( बाह्य ) ॥६७॥ वह सब देवता और पितरों में निन्दित कहा है । संन्यास वेष का आश्रय लेकर बहुत से ब्राह्मण संसार में जीविका करते पुजाते हैं ॥ ६८ ॥ वेषमात्र से जीविका करने वाले उन का मोक्ष नहीं होता-और जो लोक-वेद, विषय, इन्द्रिय, इन सम्बन्धी सब भोगों वा विषयों को त्याग कर ॥६९॥ अपने आत्मा में ही स्थित रहता है वह परमपद को प्राप्त होता है ॥

इति वैष्णवे धर्मशास्त्रे ४ अध्यायः ॥

पवित्र है आचार जिन का ऐसे धर्म अर्थ काम के अभिलाषी राजाओंका ॥१००॥

३२ भाषार्थसहिता ॥

वक्ष्यमाणन्तु यो धर्मस्तत्त्वतस्तन्निबोधत । तेजः सत्यं धृतिर्दाक्ष्यं संग्रामेष्वनिवर्तिता ॥१०१॥ दानमीश्वरभावश्च क्षत्रधर्मः प्रकीर्तितः । क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानांपरिपालनम् ॥१०२॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षयेन्नृपतिः प्रजाः । त्रीणि कर्माणि कुर्वीत राजन्यस्तु प्रयत्नतः ॥१०३॥ दानमध्ययनं यज्ञं ततो योगनिषेवणम् । ब्राह्मणानांच सन्तुष्टिमाचरेत्सततंतथा ॥१०४॥ तेषु तुष्टेषु नियतं राज्यं कोशश्च वर्द्धते । वाणिज्यं कर्पणंचैव गपांच परिपालनम् ॥ १०५ ॥ ब्राह्मणक्षत्रसेवाच वैश्यकर्म प्रकीर्तितम् । खलयज्ञं कृषीजांच गोयज्ञंचैव यत्नतः ॥ १०६ ॥ कुर्याद्वैश्यश्च सततं गपांच शरणंतथा ।


जो धर्म, उस को हम कहते हैं तुम सुनो। तेज, सत्य, धैर्य दक्षता (चतुराई) संग्राम से न भागना ॥१०१॥ दान देना, ईश्वरता (सबाये हुकूमत करना) यह क्षत्रिय का धर्म कहा है। प्रजाओं को पालना करना क्षत्रियों का परमधर्म है ॥१०२॥ इस से सब यत्न से राजा प्रजाओं की रक्षा करे और क्षत्रिय बड़े यत्न से तीन कामों को करे कि ॥१०३॥ दान-पढ़ना-यज्ञ और फिर योगमार्ग का सेवन और ब्राह्मणों को निरन्तर सदा प्रसन्न सन्तुष्ट करने का उद्योग करता रहे ॥१०४॥ उनके प्रसन्न हुये पर राजा का राज्य और कोश (खज़ाना) बढ़ता है। ब्यवह० (लेन देन) कृषि गौओं को पालना ॥१०५॥ ब्राह्मण और क्षत्रिय की सेवा ये कर्म वैश्य के कहे हैं। और कृषि (खेती) के खलियान के यज्ञ और गौओं के रक्षार्थ यज्ञ को ॥१०६॥ और गौओं के शरण (घर) इन को वैश्य निरन्तर करे और गूढ़ ईर्ष्या को त्याग कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इन की

विष्णुस्मृतिः ॥ १८

ब्राह्मणक्षत्रवैश्यांश्च चरन्नित्यममत्सरः ॥ १०७ ॥
कुर्वंस्तुशूद्रःशुश्रूषां लोकान्जयतिधर्मतः ।
पंचयज्ञविधानंतु शूद्रस्यापि विधीयते ॥ १०८ ॥
तस्यप्रोक्तोनमस्कारः कुर्वन्नित्यंनहीयते ।
शूद्रोपिद्विविधोज्ञेयः श्राद्धीचैवेतरस्तथा ॥ १०९ ॥
श्राद्धीभोज्यस्तयोरुक्तो ह्यभोज्यस्त्वतरोमतः ।
प्राणानर्थांस्तथादारा-न्ब्राह्मणार्थंनिवेदयेत् ॥ ११० ॥
सशूद्रजातिर्भोज्यः स्या-दभोज्यःशेषउच्यते ।
कुर्याच्छूद्रस्तुशुश्रूषां ब्रह्मक्षत्रविशांक्रमात् ॥ १११ ॥
कुर्यादुत्तरयोर्वैश्यः क्षत्रियोब्राह्मणस्यतु ।
आश्रमास्तुत्रयःप्रोक्ता वैश्यराजन्ययोस्तथा ॥ ११२ ॥
पारिव्राज्याश्रमप्राप्ति-र्ब्राह्मणस्यैवचोदिता ।


नित्य सेवा करे ॥१०७॥ क्योंकि इन की शुश्रूषा को धर्म से करता हुआ शूद्र लोक ( स्वर्गादि ) को जीतता ( प्राप्त होता ) है और पंचयज्ञ का करना शूद्र को भी कहा है ॥ १०८ ॥ उस शूद्र को देवता के नामान्त में नमः लगा कर नाम मन्त्रों से पञ्च यज्ञ करने चाहिये जैसे ( अग्नयेनमः ) इत्यादि इस प्रकार नित्य २ करता हुआ शूद्र पतित नहीं होता—शूद्र भी दो प्रकार का है एक श्राद्ध का अधिकारी और दूसरा अनधिकारी ॥ १०९ ॥ उन दोनों में से श्राद्धके अधिकारी का भोजन करना चाहिये--और अनधिकारी का नहीं जो शूद्र अपने प्राण-धन, स्त्री इत्यादि सब ब्राह्मण को समर्पण करदे ॥ ११० ॥ वह शूद्र भोजन करने योग्य है और शेष शूद्र का अन्न अभोज्य है । और शूद्र क्रम से ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य--इन की सेवा करे ॥१११॥ वैश्य ब्राह्मण क्षत्रिय की सेवा करे और क्षत्रिय, ब्राह्मण की ही सेवा करे । वैश्य और क्षत्रिय इन के तीन आश्रम कहे हैं । अर्थात् ब्रह्मचर्य-गृहस्थ, वानप्रस्थ ॥ ११२ ॥ और संन्यास

२० भाषार्थसहिता ॥

आश्रमानामयं प्रोक्तो मयाधर्मः सनातनः ॥ ११३ ॥
यदत्राविदितंकिंचित्तदन्येभ्योगमिष्यथ ॥
इति विष्णुप्रोक्तं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥


आश्रम की प्राप्ति केवल ब्राह्मण को ही कही है—यह चारो आश्रमों का सनातन धर्म हमने कहा ॥ ११३ ॥ जो कुछ इस ग्रन्थ में तुमने नहीं जाना उस को अन्य धर्म शास्त्र ग्रन्थों से जान जाओगे ॥
इति वैष्णवधर्मशास्त्रभाषासमाप्ता ॥

अथ हारीतस्मृतिः

येवर्णाश्रमधर्मस्थास्तेभक्ताःकेशवं प्रति ।
इतिपूर्वंत्वयाप्रोक्तं भूर्भुवःस्वर्द्विजोत्तमाः ॥ १ ॥
वर्णानामाश्रमाणाञ्च धर्मान्नोब्रूहिसत्तम ।
येनसन्तुष्यतेदेवो नारसिंहःसनातनः ॥ २ ॥
अत्राहंकथयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम् ।
ऋषिभिःसहसंवादं हारीतस्यमहात्मनः ॥ ३ ॥
हारीतंसर्वधर्मज्ञमासीनमिवपावकम् ।
प्रणिपत्याऽब्रुवन्सर्वे मुनयोधर्मकाङ्क्षिणः ॥ ४ ॥
भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्त्तक ।
वर्णानामाश्रमाणांच धर्मान्नोब्रूहिभार्गव ॥ ५ ॥
समासाद्योगशास्त्रंच विष्णुभक्तिकारंपरम् ।


भा०:–जो वर्ण तथा आश्रम के धर्ममें स्थित तीनों लोक के ब्राह्मण हैं वे केशव भ-
गवान् के भक्त होते हैं यह प्रथम तुमने कहा था– ॥ १ ॥ अब हे पुरुषों में
श्रेष्ठ जिस से सनातन नरसिंह देव प्रसन्न हों उन वर्ण आश्रम के धर्मों को क-
हो ॥ २ ॥ इस विषय में उत्तम पुरातन वृत्तान्त हम कहेंगे कि जो हारीत म-
हात्मा के संग ऋषियों का संवाद हुआ है ॥ ३ ॥ तपोबल से अग्नि के स-
मान तेजस्वी–बैठे हुए सब धर्मों के मर्म ज्ञाता–हारीत से धर्म के अभिलाषी
सम्पूर्ण मुनि नमस्कार करके बोले कि ॥ ४ ॥ हे भगवन् हे सब धर्मों के जानने
वाले–हे सब धर्मों के प्रवर्त्तक और हे भृगुवंश में उत्पन्न ! वर्ण और आश्रमों के
धर्मों को हम से कहिये ॥ ५ ॥ जो विष्णु भगवान् में उत्तम भक्ति प्रकट करने

२ भाषाधर्मसंहिता ॥

एतच्चान्यच्चभगवन् ब्रूहिनःपरमोगुरुः ॥ ६ ॥ हारीतस्तानुवाचाथ तैरैवंचोदितोमुनिः । शृण्वन्तुमुनयःसर्वे धर्म्मान्वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥७॥ वर्णानामाश्रमाणांच योगशास्त्रंचसत्तमाः । सन्धार्थमुच्यतेमर्त्यो जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ८ ॥ पुरादेवोजगत्स्रष्टा परमात्माजलोपरि । सुष्वापभोगिपर्य्यंके शयनेतुश्रियासह ॥ ९ ॥ तस्यसुप्तस्यनाभौतु महत्पद्ममभूत्किल । पद्ममध्येऽभवद्ब्रह्मा वेदवेदांगभूषणः ॥ १० ॥ सचोक्तोदेवदेवेन जगत्सृजपुनःपुनः ।


वाला योगशास्त्र है उस को और हे भगवन् अन्य उत्तम उपदेश को संक्षेप से कहो क्यों कि तुम हमारे परम गुरु हो ॥ ६ ॥ उन मुनियों के इस प्रकार प्रेरणा करने पर हारीत मुनि उन से बोले कि हे सम्पूर्ण मुनियो ! सुनो मैं सनातन धर्मों को कहता हूं ॥ ७ ॥ वर्ण तथा आश्रमों के धर्म और योगशास्त्र को भली प्रकार जान कर मनुष्य संसार के बन्धन से छूट जाता है ॥ ८ ॥ पूर्व प्रलय समय में जगत् के रचने वाले देव परमात्मा जलों के ऊपर शेष शय्या पर लक्ष्मी सहित सोये ॥९ ॥ सोते हुये उन की नाभि से महान् (बड़ा) कमल हुआ उस पद्म के बीच वेद और वेदांगों के भूषण ब्रह्मा जी प्रकट हुए ॥१०॥ उन को देवों के देव परब्रह्म ने वारंवार यह कहा कि तुम जगत् को रचो।

वि० (९ । १०) आकाश मण्डल में निराधार रहने वाला जल यहां लेना उचित है उसी जल पर नौका स्थानीय वा आधार भूत जो सामान था वही शय्या है प्रलय के समय भगवान् लक्ष्मी वा स्त्री शक्ति रूप प्रकृति को अपन में लीन कर विश्राम करते हैं । जब संसार रचने का समय आता है तब स्वयमेव भगवान् के नाभि नाम मध्य भाग में कमलाकार अण्ड पैदा होता उसी के बीच ब्रह्मा जी होते हैं जो आगे सब सृष्टि को बनाते हैं ।

हारीतस्मृतिः ॥

सोपिसृष्ट्वाजगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ११ ॥
यज्ञसिद्ध्यर्थमनघान् ब्राह्मणान्मुखतोऽसृजत् ।
असृजत्क्षत्रियान्बाह्वोर्वैश्यानप्यूरुदेशतः ॥ १२ ॥
शूद्रांश्चपादयोःसृष्ट्वा तेषांचैवानुपूर्वशः ।
यथाप्रोवाचभगवान् ब्रह्मयोनिःपितामहः ॥ १३ ॥
तद्वचःसंप्रवक्ष्यामि शृणुतद्विजसत्तमाः ।
धन्यंयशस्यमायुष्यंस्वर्ग्यंमोक्षफलप्रदम् ॥ १४ ॥
ब्राह्मण्यांब्राह्मणेनैव ह्युत्पन्नोब्राह्मणःस्मृतः ।
तस्यधर्म्मं प्रवक्ष्यामि तद्योग्यंदेशमेवच ॥ १५ ॥
कृष्णसारोमृगोयत्र स्वभावेनप्रवर्त्तते ।
तस्मिन्देशेवसेद्धर्माः सिद्ध्यन्तिद्विजसत्तमाः ॥ १५॥
षट्कर्माणिर्निजान्याहु-र्ब्राह्मणस्यमहात्मनः ।
तैरेवसततंयस्तु वर्तयेत्सुखमेधते ॥ १६ ॥
अध्यापनंचाध्ययनं याजनंयजनंतथा ।


उन ब्रह्माजी ने भी देवता, असुर, मनुष्य, इन सहित संपूर्ण जगत् को रचकर ॥ ११ ॥ यज्ञ की सिद्धि के लिये पाप रहित तपस्वी ऋषि/ब्राह्मणों को मुख से। क्षत्रियों को भुजाओं से। वैश्यों को जंघाओं से/१२ और शूद्रों को चरणों से उत्पन्न किया।। इस क्रम से उन चारों को रच कर भगवान् ब्रह्मयोनि (ब्रह्मा) जी ने यह वचन कहा कि॥ १३॥ हे ब्रह्मर्षि लोगो ! उस वचन को मैं कहता हूं तुम सुनो और वह वचन धन, यश, अवस्था, स्वर्ग तथा मोक्षफल देनेवाला है॥१४॥ब्राह्मण पिता सेजो ब्राह्मणी माता में पैदा हो उसे ब्राह्मण कहते हैं उसका धर्म और उस के निवास के योग्य देश को हम कहेंगे ॥ १५ ॥

काला मृग जिस में स्वभाव से विचरता हो उस देश में ब्राह्मण बसे और उसी देश में किया धर्म, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! सिद्ध नाम सुफल होता है॥१६॥

महात्मा ब्राह्मणों के छः कर्म निज के हैं उन्हीं कर्मों सहित जो निरंतर व-

४ भाषार्थसहिता ॥

दानंप्रतिग्रहश्चेति षट्कर्माणीतिचोच्यते ॥ १७ ॥
अध्यापनञ्चत्रिविधं धर्म्मार्थमृक्थकारणात् ।
शुश्रूषाकरणंचेति त्रिविधंपरिकीर्तितम् ॥ १८ ॥
एषामन्यतमाभावे वृथाचारोभवेद्विजः ।
तत्रविद्यानदातव्या पुरुषेणहितैषिणा ॥ १९ ॥
योग्यानध्यापयेच्छिष्या=नयोग्यानपिवर्जयेत् ।
विदितात्प्रतिगृह्णीयाद् गृहेधर्मप्रसिद्धये ॥ २० ॥
वेदञ्चैवाभ्यसेन्नित्यं शुचौदेशेसमाहितः ।
धर्म्मशास्त्रंतथापाठ्यंब्राह्मणैःशुद्धमानसैः ॥ २१ ॥
वेदवत्पठितव्यंच श्रोतव्यंचदिवानिशि ।
स्मृतिहीनायविप्राय श्रुतिहीनेतथैवच ॥ २२ ॥
दानंभोजनमन्यच्च दत्तंकुलविनाशनम् ।


संतान रहे वह सुख से बढ़ता है अर्थात् धन पुत्रवान् होता है ॥१६॥वेदका पढ़ाना पढ़ना-द्विजों को यज्ञ कराना और स्वयं यज्ञ करना-सुपात्र को दान देना और प्रतिग्रह (दान) लेना ये छः कर्म कहे हैं ॥१७॥ वेदादिशास्त्र का पढ़ाना भी तीन प्रकार का है १ धर्म के अर्थ २ धन को लेकर और ३ सेवा के लिये ॥ १८ ॥ इन तीनों में से जिस शिष्य में धर्मादि एक भी न हो उस के पढ़ाने से ब्राह्मण वृथाचारी होता है ऐसे शिष्य को अपने हित का अभिलाषी पुरुष विद्या न दे ॥ १९ ॥ योग्य शिष्यों को पढ़ावे और अयोग्यों को वर्जेदे और गृहस्थ धर्म के निर्वाहार्थ प्रसिद्ध पुरुष (धनी) से प्रतिग्रह ले ॥२०॥ शुद्ध देश में सावधान होकर वेदका अभ्यास करे और शुद्ध मनवाले ब्राह्मणों को धर्म शास्त्र भी पढ़ना चाहिये ॥२१॥वेद के समान धर्म शास्त्र को भी प्रतिदिन पढ़ना और सुनना चाहिये, स्मृति नाम धर्मशास्त्र श्रुति वेद इन दोनों से हीन ब्राह्मण को॥२२॥ दान-भोजन-और अन्य जो दिया जाय वह कुलको नष्टकरता है।इस से

हारीतस्मृतिः ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन धर्मशास्त्रं पठेद्द्विजः ॥ २३॥
श्रुतिस्मृतीचविप्राणां चक्षुषीदेवनिर्म्मिते ।
काणस्तत्रैकयाहीनो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ॥२४॥
गुरुशुश्रूषणञ्चैव यथान्यायमतन्द्रितः ।
सायंप्रातरुपासीत विवाहाग्निंद्विजोत्तमः ॥२५॥
सुस्नातस्तुप्रकुर्वीत वैश्वदेवंदिनेदिने ।
अतिथीनागतांश्छक्त्यापूजयेदविचारतः ॥ २६ ॥
अन्यानभ्यागतान्विप्रान्पूजयेच्छक्तितोगृही ।
स्वदारनिरतोनित्यं परदारविवर्जितः ॥ २७ ॥
कृतहोमस्तुभुञ्जीत सायंप्रातरुदारधीः ।
सत्यवादीजितक्रोधो नाधर्मेवर्त्तयन्मतिम् ॥२८॥
स्वकर्मणिचसंप्राप्ते प्रमादान्ननिवर्त्तते ।


सब यत्न से ब्राह्मण धर्म शास्त्र को अवश्य पढ़े ॥२३॥ श्रुति स्मृति ये दोनों परमेश्वर के रचे हुये ब्राह्मणों के नेत्र हैं इन दोनों में से जो एक से हीन है वह काणा, और दोनों से हीन को अंधा कहा है ॥ २४ ॥ आलस्य को त्याग कर गुरु की सेवा करे और ब्राह्मण सायं प्रातः काल विवाहाग्नि ( जिस में विवाह का होम हो फिर अपने घर लाकर जीवन पर्यन्त बनाये रक्खे ) की उपासना ( उसी में स्मार्त्त होम ) करै ॥ २५ ॥ भले प्रकार स्नान करके प्रति दिन बलिवैश्व देव करै तथा आये हुए विरक्त अतिथियों को बिना विचारे शक्ति के अनुसार पूजे ॥२६॥ और अन्य गृहस्थ ब्राह्मणादि अभ्यागतों को भी गृहस्थी ब्राह्मण शक्ति के अनुसार पूजे तथा अपनी स्त्री से ही सदा प्रेम रक्खे पर स्त्री को वर्ज दे ॥ २७ ॥ उदार बुद्धि वाला ब्राह्मण साय प्रातःकाल के समय अग्निहोत्र करके भोजन करे। सत्य बोले, क्रोध को जीते तथा अधर्म में बुद्धि को कभी न लगावे ॥ २८ ॥ अपने सन्ध्यादि कर्म के समय में प्रमाद से कर्म को न छोड़े । सत्य सब की हितकारिणी और परलोक में अ-

६ भाषार्थसहित

सत्यांहितांवदेद्वाचं परलोकाहितैषिणीम् ॥ २९ ॥
एषधर्म्मःसमुद्दिष्टो ब्राह्मणस्यसमासतः ।
धर्ममेवहियःकुर्यात्सयातिब्रह्मणःपदम् ॥ ३० ॥
इत्येषधर्मःकथितोमयायं पृष्टोभवद्भिस्त्वखिलाघहारी ।
वदामिराज्ञामपिचैवधर्म्मान्पृथक्पृथग्बोधतविप्रवर्याः ॥३१॥

इति हारीते धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

क्षत्रादीनांप्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्व्वशः ।
येषुप्रवृत्ताविधिना सर्वेयान्तिपरांगतिम् ॥१॥
राज्यस्थःक्षत्रियश्चापि प्रजाधर्मेणपालयन् ।
कुर्यादध्ययनंसम्यग् यजेद्यज्ञान्यथाविधि ॥२॥
दद्याद्दानंद्विजातिभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः ।
स्वभार्यानिरतोनित्यं षड्भागार्हःसदानृपः ॥३॥
नीतिशास्त्रार्थकुशलः सन्धिविग्रहतत्त्ववित् ।


पना हित करने वाली वाणी को बोला करे ॥ २९ ॥ यह धर्म ब्राह्मण का संक्षेप से कहा, जो ब्राह्मण धर्म को ही करता है वह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! जो धर्म तुमने मुझे पूछा था संपूर्ण पापों का ना-शक वह यह धर्म हमने कहा और राजाओं के भी पृथक् २ धर्मों को कहते हैं तुम सुनो ॥ ३१ ॥

इति हारीते धर्म शास्त्रे १ अध्याय भाषा समाप्त।

अब क्षत्रियादि के धर्म को यथार्थ क्रम से हम कहते हैं कि जिन धर्मों को विधि से करते हुए (क्षत्रियादि) परमगति को प्राप्त होते हैं ॥१॥ राज्य पदवी पर स्थित धर्म से प्रजा की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय भी वेद पढ़े और विधिपूर्वक यज्ञ करे ॥२॥ जो राजा धर्मानुकूल बुद्धि करके ब्राह्मणों को दान दे और अपनी स्त्री में ही प्रेम रक्खे वेश्यादि से सदा बचे ऐसा राजा सदैव प्रजा से षष्ठांश कर लेने योग्य होता है ॥३॥ नीतिशास्त्र में कुशल और सन्धि