अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 672, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ शातातपस्मृतिः ॥
देवस्वहरणाच्चैव जायतेविविधोज्वरः । ज्वरोमहाज्वरश्चैव रौद्रोवैष्णवएवच ॥ ३२ ॥ ज्वरेरौद्रंजपेत्कर्णे महारुद्रंमहाज्वरे । अतिरौद्रंजपेद्रौद्रे वैष्णवेतद्द्वयंजपेत् ॥ ३३ ॥ नानाविधद्रव्यचौरो जायतेग्रहणीयुतः । तेनान्नोदकवस्त्राणि हेमदेयंचशक्तितः ॥ ३४ ॥ माषतिललोहहारी गजचर्माप्रजायते । माषद्वयमितांदद्याद् धेनुंद्विपतिलान्विताम् ॥ ३५ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके स्तेयप्रायश्चित्तं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ मातृगामीभवेद्यस्तु लिङ्गंतस्यविनश्यति । चाण्डालीगमनेचैव हीनकोशःप्रजायते ॥ १ ॥ तस्यप्रतिक्रियांकर्त्तुं कुम्भमुत्तरतोन्यसेत् ।
देव पूजा सम्बन्धी धनके चुरानेसे रौद्र ज्वर, वैष्णवज्वर, इत्यादि अनेक प्रकार का ज्वर अपराधी को होता है ॥ ३२ ॥ साधारण ज्वर में अपराधी के निकट रुद्री के ११ पाठ, महाज्वर में महारुद्र (रुद्री के १२१ पाठ) रौद्रज्वर में अतिरौद्र (रुद्री के १३३१ पाठ) और वैष्णवज्वर में महारुद्र अतिरुद्र दोनों का अनुष्ठान करावे । पीछे तदनुसार दशांश का होम कराया जाय ॥ ३३ ॥ अनेक प्रकार के द्रव्यों को चुरानेवाला संग्रहणीरोग युक्त होता है उसको अन्न, जल, वस्त्र और सुवर्ण का यथाशक्ति दान करना चाहिये ॥ ३४ ॥ उड़द, तिल और लोहे को चुरानेवाला हाथी के तुल्य चर्म रोगवाला होता है वह दो मासे सुवर्ण की धेनु को हाथी से स्पर्श कराये तिलों सहित दान करे ॥ ३५ ॥
यह शातातपीय धर्मशास्त्र के कर्मविपाक विषय में चोरी का प्रायश्चित्तरूप चतुर्थोऽध्याय पूरा हुआ ॥
माता से गमन करनेवाले का नरक भोगके अन्त में होनेवाले मनुष्य जन्म में लिङ्गेन्द्रिय नष्ट होजाता है। और चाण्डाली से गमन करने पर अण्डकोशों से हीन उत्पन्न होता है ॥ १ ॥ उस पाप की निवृत्ति के लिये पुनीत स्थान