भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ २७

कृष्णवस्त्रसमाच्छन्नं कृष्णमाल्यविभूषितम् ॥ २ ॥ तस्योपरिन्यसेद्देवं कांस्यपात्रेधनेश्वरम् । सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितंनरवाहनम् ॥ ३ ॥ यजेत्पुरुषसूक्तेन धनदंविश्वरूपिणम् । अथर्ववेदविद्विप्रो ह्याथर्वणंसमाचरेत् ॥ ४ ॥ सुवर्णपुत्तलिकांकृत्वा निष्कविंशतिसंख्यया । दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ ५ ॥ निधीनामधिपोदेवः शंकरस्यप्रियसखा । सौम्याशाधिपतिःश्रीमान् ममपापंव्यपोहतु ॥ ६ ॥ इमंमन्त्रंसमुच्चार्य आचार्याययथाविधि । दद्याद्देवंहीनकोशो लिङ्गनाशेविशुद्धये ॥ ७ ॥ गुरुजायाभिगमनान्मूत्रकृच्छ्रःप्रजायते । तेनापिनिष्कृतिःकार्य्या शास्त्रदृष्टेनकर्मणा ॥ ८ ॥


के उत्तरभाग में एक कलश स्थापितकरे उसको कालेवस्त्र और काले फूलों की माला से शोभित करे ॥२॥ उस कलश के समीप में एक कांसे के पात्र में कुबेर देवता की प्रतिमा चौबीस तोला सुवर्ण की बनवाके (जो मनुष्य पर सवार हो ऐसी प्रतिमाको) स्थापित करे ॥३॥ फिर सर्वरूप कुबेर देवता का पुरुष सूक्त से पूजन करे । और अथर्ववेदी ब्राह्मण अथर्व का पाठ भी वहीं करे ॥४॥ फिर अस्सी तोला सुवर्ण की एक पुतली (कुबेर देव की प्रतिमा) बनाकर उसका सम्यक् पूजन करके 'मैं निष्पाप होऊँ' ऐसा कहता हुआ निम्न रीति से ब्राह्मण को दान कर देवे ॥५॥ सब खज़ानों के मालिक, शंकर भगवान् के प्रियमित्र, उत्तर दिशा के स्वामी श्रीमान् कुबेरदेव मेरे पाप को नष्ट करें ॥६॥ अण्डकोशों से हीन होने वा लिङ्गेन्द्रिय हीन होने के अपराध से मुक्त होने के लिये ( निधीनामधिपो० ) इस मन्त्र का उच्चारण करके देव प्रतिमा का विधि पूर्वक आचार्य को दान कर देवे ॥ ७ ॥ गुरुपत्नी के साथ गमन करने से मूत्र कृच्छ्र रोग से युक्त होता है । उस को धर्म शास्त्रोक्त कर्म द्वारा प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ८ ॥