अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 674, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ शातातपस्मृतिः ॥
स्थापयेत्कुम्भमेकन्तु पश्चिमायांश्रुभेदिने ।
नीलवस्त्रसमाच्छन्नं नीलमाल्यविभूषितम् ॥ ६ ॥
तस्योपरिन्यसेद्देवं ताम्रपात्रेप्रचेतसम् ।
सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितांयादसाम्पतिम् ॥ १० ॥
यजेत्पुरुषसूक्तेन वरुणंविश्वरूपिणम् ।
सामविद्ब्राह्मणस्तत्र सामवेदंसमाचरेत् ॥ ११ ॥
सुवर्णपुत्तिकांकृत्वा निष्कविंशतिसंख्यया ।
दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ १२ ॥
यादसामधिपोदेवो विश्वेषामपिपावनः ।
संसाराब्धौकर्णधारो वरुणःपावनोऽस्तुमे ॥ १३ ॥
इमंमन्त्रंसमुच्चार्य आचार्याययथाविधि ।
दद्याद्देवमलङ्कृत्य मूत्रकृच्छ्रप्रशान्तये ॥ १४ ॥
स्वसुतागमनेचैव रक्तकुष्ठंप्रजायते ।
भगिनीगमनेचैव पीतकुष्ठंप्रजायते ॥ १५ ॥
तस्यप्रतिक्रियांकर्तुं पूर्वतःकलशंन्यसेत् ।
किसी शुभ दिन पूजन स्थान के पश्चिम भाग में एक कलश नीले वस्त्र और नीले फूलों से शोभित करके स्थापित करे ॥ ९ ॥ उस कलश के ऊपर तांबे के पात्र में २४ तोला सुवर्ण से बनायी जल के अधिष्ठाता वरुण देवता की प्रतिमा स्थापित करे ॥ १० ॥ फिर विश्वरूपी वरुण देवका पुरुष सूक्त के मन्त्रों से पूजन करे और साथ ही सामवेदी ब्राह्मण सामगान करे ॥ ११ ॥ फिर अस्सी तोला सुवर्ण की प्रतिमा वरुण देवता की बनाके उस का सम्यक् पूजन करके (मैं निष्पाप हो जाऊं) ऐसा कहता हुआ निम्न रीति से ब्राह्मण गुरु को प्रतिमा का दान करे ॥ १२ ॥ सब को पवित्र करने वाले जल के अधिष्ठाता, संसार समुद्र से पार करने वाले (मल्लाह) वरुण देव मुझ को पवित्र करने वाले हों ॥ १३ ॥ इस मन्त्र का उच्चारण करके मूत्रकृच्छ्र की शान्ति के अर्थ पुष्पादि से भूषित देव प्रतिमा को विधि पूर्वक गुरु के लिये देवे ॥ १४ ॥ अपनी पुत्री से गमन करने पर जन्मान्तर में रक्त कुष्ठी होता और भगिनी से गमन करने पर पीत कुष्ठी होता है ॥ १५ ॥ उस का प्रायश्चित्त करने के लिये