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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

२८ शातातपस्मृतिः ॥

स्थापयेत्कुम्भमेकन्तु पश्चिमायांश्रुभेदिने ।
नीलवस्त्रसमाच्छन्नं नीलमाल्यविभूषितम् ॥ ६ ॥
तस्योपरिन्यसेद्देवं ताम्रपात्रेप्रचेतसम् ।
सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितांयादसाम्पतिम् ॥ १० ॥
यजेत्पुरुषसूक्तेन वरुणंविश्वरूपिणम् ।
सामविद्ब्राह्मणस्तत्र सामवेदंसमाचरेत् ॥ ११ ॥
सुवर्णपुत्तिकांकृत्वा निष्कविंशतिसंख्यया ।
दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ १२ ॥
यादसामधिपोदेवो विश्वेषामपिपावनः ।
संसाराब्धौकर्णधारो वरुणःपावनोऽस्तुमे ॥ १३ ॥
इमंमन्त्रंसमुच्चार्य आचार्याययथाविधि ।
दद्याद्देवमलङ्कृत्य मूत्रकृच्छ्रप्रशान्तये ॥ १४ ॥
स्वसुतागमनेचैव रक्तकुष्ठंप्रजायते ।
भगिनीगमनेचैव पीतकुष्ठंप्रजायते ॥ १५ ॥
तस्यप्रतिक्रियांकर्तुं पूर्वतःकलशंन्यसेत् ।


किसी शुभ दिन पूजन स्थान के पश्चिम भाग में एक कलश नीले वस्त्र और नीले फूलों से शोभित करके स्थापित करे ॥ ९ ॥ उस कलश के ऊपर तांबे के पात्र में २४ तोला सुवर्ण से बनायी जल के अधिष्ठाता वरुण देवता की प्रतिमा स्थापित करे ॥ १० ॥ फिर विश्वरूपी वरुण देवका पुरुष सूक्त के मन्त्रों से पूजन करे और साथ ही सामवेदी ब्राह्मण सामगान करे ॥ ११ ॥ फिर अस्सी तोला सुवर्ण की प्रतिमा वरुण देवता की बनाके उस का सम्यक् पूजन करके (मैं निष्पाप हो जाऊं) ऐसा कहता हुआ निम्न रीति से ब्राह्मण गुरु को प्रतिमा का दान करे ॥ १२ ॥ सब को पवित्र करने वाले जल के अधिष्ठाता, संसार समुद्र से पार करने वाले (मल्लाह) वरुण देव मुझ को पवित्र करने वाले हों ॥ १३ ॥ इस मन्त्र का उच्चारण करके मूत्रकृच्छ्र की शान्ति के अर्थ पुष्पादि से भूषित देव प्रतिमा को विधि पूर्वक गुरु के लिये देवे ॥ १४ ॥ अपनी पुत्री से गमन करने पर जन्मान्तर में रक्त कुष्ठी होता और भगिनी से गमन करने पर पीत कुष्ठी होता है ॥ १५ ॥ उस का प्रायश्चित्त करने के लिये

भाषाऽर्थसहिता ॥ २५

पीतवस्त्रसमाच्छन्नं पीतमाल्यविभूषितम् ॥ १६ ॥ तस्योपरिन्यसेत्स्वर्ण पात्रेदेवंसुरेश्वरम् । सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितंवज्रधारिणम् ॥ १७ ॥ यजेत्पुरुषसूक्तेन वासवंविश्वरूपिणम् । यजुर्वेदंतत्रसाम ऋग्वेदंचसमापयेत् ॥ १८ ॥ सुवर्णपुत्तिकांकृत्वा सुवर्णदशकेनतु । दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ १९ ॥ देवानांमधिपोदेवो वज्रीकुलिशकेतनः । शतयज्ञःसहस्राक्षः पापंममनिकृन्ततु ॥ २० ॥ इमंमन्त्रंसमुच्चार्य्य आचार्याय्ययथाविधि । दद्याद्देवंसहस्राक्षं स्वपापस्यापनुत्तये ॥ २१ ॥ भ्रातृभार्याभिगमनाद् गलत्कुष्ठंप्रजायते । स्ववधूगमनेचैव कृष्णकुष्ठंप्रजायते ॥ २२ ॥ तेनकार्य्यविशुद्ध्यर्थं प्रागुक्तस्यार्द्धमेवहि ।


पीले वस्त्र और पीली फूल मालाओं से भूषित एक कलश पूजन स्थान के पूर्वभाग में स्थापित करे ॥१६॥ उस कलश के ऊपर सुवर्ण के पात्र में २४ तोला सुवर्ण से बनायी वज्रधारी इन्द्र देवता की प्रतिमा को स्थापित करे ॥१७॥ फिर विश्वरूपी इन्द्रदेव का पुरुष सूक्त से पूजन करे, साथ ही उस २ वेद के ज्ञाता ब्राह्मण लोग वहां ऋग्, यजुः-सामवेद का पाठ करें ॥ १८ ॥ और दश तोला सुवर्ण की एक प्रतिमा इन्द्रदेवता की बनाके 'मैं निष्पाप होऊं' ऐसा कहता हुआ वह प्रतिमा सम्यक् पूजन करके निम्न प्रकार ब्राह्मण गुरु को देवे ॥ १९ ॥ देवों के स्वामी, सौ यज्ञ करने वाले, सहस्रों चक्षु वाले, वज्र चिन्ह युक्त वज्रधारी इन्द्रदेव मेरे पाप को नष्ट करें ॥ २० ॥ अपने पाप के नाशार्थ इस मन्त्र का उच्चारण करके इन्द्रदेव की प्रतिमा विधि पूर्वक आचार्य को देवे ॥२१॥ भाई की पत्नी से गमन करे तो गलत्कुष्ठ और पुत्र वधू से गमन करे तो जन्मान्तर में काला कुष्ठ प्रकट होता है ॥ २२ ॥ उस को अपनी शुद्धि-

३० शातातपस्मृतिः ॥

दशांशहोमः सर्वत्र घृताक्तैः क्रियते तिलैः ॥ २३ ॥ स्वाम्यङ्गनाभिगमनाज्जायते दद्रुमण्डलम् । कृत्वा लोहमयीं धेनुं पलषष्टिप्रमाणतः ॥ २४ ॥ कार्पासभाण्डसंयुक्तां कांस्यदोहां सवत्सिकाम् । दद्याद्विप्राय विधिवदिमं मन्त्रमुदीरयेत् । सुरभिर्वैष्णवी माता मम पापं व्यपोहतु ॥ २५ ॥ विश्वस्तभार्यागमने गजचर्मा प्रजायते । तस्य पापविनाशाय प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ २६ ॥ कृत्वारौप्यमयीं धेनुं निष्कृतिं विश्वसंख्यया । तस्य पापस्य नाशाय छत्रोपानहसंयुताम् ॥ २७ ॥ मातुः सपत्निगमने जायते चाश्मरीगदः । स तु पापविशुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ २८ ॥ दद्याद्विप्राय विदुषे मधुधेनुं यथोदितम् ।


के लिये पूर्व कहे पुत्री गमन के प्रायश्चित्त से आधा करना चाहिये और सभी जप पाठों में घृत मिले तिलों से दशांश होम तो करना ही चाहिये ॥ २३ ॥ स्वामी (मालिक) की स्त्री से सेवक गमन करे तो जन्मान्तर में मण्डलाकार (दखन्दावाली) दाद होती है । वह तीन सेर लोहे की गौ बनवाके, बिनौले, बसन, कांसे की दोहनी और बछड़े सहित गौ (सुरभि०) मन्त्रोच्चारण पूर्वक विधि के साथ ब्राह्मण को दान देवे कि विष्णु देवता सम्बन्धिनी सुरभि गौ माता मेरे पाप को नष्ट करे ॥ २४।२५ ॥ अपना विश्वास रखनेवाले की पत्नी से गमन करे तो अन्मान्तर में हाथी के से चर्मवाला होता है । उस पाप का प्रायश्चित्त यह है कि ॥ २६ ॥ नौ तोला चांदी की प्रायश्चित्त रूप गौ बनाकर उस पाप के नाशार्थ छाता और जूता सहित दान करे ॥ २७ ॥ अपनी सौतेली माता से गमन करे तो जन्मान्तर में मूंगारोग होता है । वह पुरुष उसका निम्न प्रायश्चित्त करे ॥ २८ ॥ विद्वान् ब्राह्मण को शहद की गौ शास्त्रविध्यनुकूल दान

भाषाऽर्थसहिता ॥ ३१

तिलद्रोणशतंचैव हिरण्येनसमन्वितम् ॥ २९ ॥
पितृष्वस्रभिगमनाद्दक्षिणांशव्रणीभवेत् ।
तेनापिनिष्कृतिःकार्या अजादानेनशक्तितः ॥ ३० ॥
मातुलान्यांतुगमने पृष्ठकुब्जःप्रजायते ।
कृष्णाजिनप्रदानेन प्रायश्चित्तंसमाचरेत् ॥ ३१ ॥
मातृष्वस्रभिगमने वामाङ्गे व्रणवान्भवेत् ।
तेनापिनिष्कृतिःकार्या सम्यग्दासीप्रदानतः ॥ ३२ ॥
पितृव्यपत्नीगमनात्कटिकुष्ठंप्रजायते ।
निष्कृतिस्तेनकर्त्तव्या कन्यादानेनयत्नतः ॥ ३३ ॥
यदगम्यासुसंयोगात्प्रायश्चित्तमुदीरितम् ।
तदेवमुनिभिःप्रोक्तं नियतंतत्सुतास्वपि ॥ ३४ ॥
मृतभार्याभिगमने मृतभार्यःप्रजायते ।
तत्पातकविशुद्ध्यर्थं द्विजमेकंविवाहयेत् ॥ ३५ ॥
सगोत्रस्त्रीप्रसंगेन जायतेचभगन्दरः ।


देवे और सुवर्ण के सहित २५ मन तिलों का दान करे ॥ २९ ॥ फूपी ( बुआ ) के साथ गमन करे तो शरीर के दहिने भाग में फोड़े फुंसी होते हैं । वह य-थाशक्ति बकरियों के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥३०॥ मामी के साथ गमन करे तो कुबड़ी पीठवाला होता वह कृष्ण मृगचर्मों के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे॥३१॥ मौसी के साथ गमन करे तो शरीर के वामभाग में फोड़ा फुंसीयुक्त होता है वह दासी के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥ ३२ ॥ चाची के साथ गमन करे तो कटि भाग में कुष्ठरोगयुक्त होता है वह कन्याओं के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥ ३३ ॥ जिन२ अगम्यास्त्रियोंके साथ संग करने से जो२ प्रायश्चित्त कहा गया है। उन२ स्त्रियों की पुत्रियोंके साथ गमन करने पर भी ऋषियों ने वही २ प्रायश्चित्त कहा है ॥३४॥ मृत पुरुष की स्त्री के साथ गमन करे तो जन्मान्तर में उसकी भी पत्नी मर जा-या करती है । उस पाप की शुद्धि के लिये एक ब्राह्मण का विवाह करावे ॥३५॥ अपने गोत्र की स्त्री से गमन करे तो जन्मान्तर में भगन्दर रोग होता है ।

३२ शातातपस्मृतिः ॥

तेनापिनिष्कृतिःकार्या महिषीदानयत्नतः ॥ ३६ ॥
तपस्विनीप्रसंगेन प्रमेहीजायतेनरः ।
मासंरुद्रजपःकार्यो दद्याच्छक्त्याचकाञ्चनम् ॥ ३७ ॥
दीक्षितस्त्रीप्रसंगेन जायतेदुष्टरक्तदृक् ।
सपातकविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यानिषट्चरेत् ॥ ३८ ॥
प्राणनाथंपरित्यज्य देवरंसेवतेध्रुवम् ।
गुदमध्येभवेद्व्याधी रशनावामहदुःसहा ।
तयाकार्यंप्रयत्नेन गोदानंहेमसम्मितम् ॥ ३९ ॥
गोविन्दगोपीजनवल्लभेशः कंसासुरघ्नस्त्रिदशेशवन्द्यः ।
गोदानतृप्तःकुरुतेदयालु रीशाननाथादपितारिवर्गः ॥ ४० ॥
श्रोत्रियस्त्रीप्रसंगेन जायतेनासिकाव्रणी ।
आचरेत्सविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यचतुष्टयम् ॥ ४१ ॥
स्वजातिजायागमने जायतेहृदयव्रणी ।
तत्पापस्यविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥ ४२ ॥
धातृउत्तरस्त्रीगमनाज्जायतेमस्तकव्रणः ।


वह भैंसियों के यथाशक्ति दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥३६॥ तपस्विनी स्त्री के साथ संगकरे तो प्रमेह रोग युक्तहोता है वह एक मास तक रुद्री का पाठ दशांश होम और यथाशक्ति सुवर्ण का दान करे ॥३७॥ दीक्षित पुरुष की स्त्री से संग करे तो रक्तविकार रोगयुक्त होता है वह छः प्राजापत्य व्रत प्रायश्चित्त करे ॥३८॥ जो स्त्री अपने पति को छोड़के देवर से संग करती है उसके गुदेन्द्रिय में रोग होता और असह्यपीड़ा होती है वह स्त्री बड़े यत्न से सुवर्ण सहित गोदान वार२ करे ॥३९॥ गोविन्द गोपीजनों के प्रियस्वामी कंसासुर के हन्ता, देवताओं के स्वामी इन्द्र के भी पूजनीय, ईशान दिशा के स्वामी महादेव जी से भी विशेषकर जिनका वर्ग तारनेवाला है ऐसे कृष्ण भगवान् गोदान से तृप्त हुए प्रायश्चित्ती पर दयाकरते हैं ॥ ४० ॥ वेदपाठी की स्त्री के साथ संग करे तो प्रायः नासिका में फोड़ा फुंसी होते हैं । वह अपनी शुद्धि के लिये चार प्राजापत्य व्रत करे ॥४१॥ अपने वर्ण की स्त्री से संग करे तो हृदय में प्रायः फोड़ा फुंसी होते हैं । उस पाप की शुद्धि के लिये दो प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४२ ॥ धायी के साथ संग

भावार्थसहिता ॥ ३३

सपातकविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ ४३ ॥ पशुयोनौचगमने मूत्राघातःप्रजायते । तिलपात्रद्वयंचैव दद्यादात्मविशुद्धये ॥ ४४ ॥ अश्वयोनौचगमनाद् भुजस्तम्भःप्रजायते । सहस्रकलशैःस्नानं मासं कुर्याच्छिवस्यच ॥ ४५ ॥ आसुरीअलसीदासी चर्मकारीचनर्त्तकी । रजकीभिःसमंभोगात्पतन्तिपितृभिःसह ॥ ४६ ॥ उपोष्यैकादशींशुद्धां जागरंकारयेन्निशि । तस्यपापविशुद्ध्यर्थं दद्यादेकांपयस्विनीम् ॥ ४७ ॥ एतेदोषानराणांस्युर्नरकान्तेनसंशयः । स्त्रीणामपिभवन्त्येते तत्तत्पुरुषसंगमात् ॥ ४८ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके अगम्यागमन प्रायश्चित्तं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


करे तो मस्तक में प्रायः फोड़ा फुंसी होतेहैं यह उस पातक की शुद्धि के लिये एक प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४३ ॥ पशुजाति के संग मैथुन करने से मूत्राघात रोग होता है । उसकी शुद्धि के लिये तिलों से भरके दो पात्र दान करे ॥ ४४ ॥ घोड़ी के साथ मैथुन करने से भुजा जकड़ने का रोग होता है । इसके लिये एक महिने तक एक हज़ार कलशों से शिवजी को स्नान करावे ॥ ४५ ॥ आसुरी (राक्षसी ) अलसी ( आलसिनी ) दासी, चर्मकारी, नटिनी, वा वेश्या, और धोबिनि इन के साथ संग करने से अपने पितरों के सहित पतित हो जाते हैं ॥ ४६ ॥ इस के लिये जो अन्य तिथि से विद्ध न हो ऐसी शुद्ध एकादशी को उपवास करके रात भर जागरण करे और उस पाप से शुद्ध होने के लिये एक दूध देती गौ का दान करे ॥ ४७ ॥ इस अध्याय में कहे दोष नरक भोग के अन्तमें उन २ पापोंसे पुरुषों के निस्सन्देह होते ही हैं । और जिन २ स्त्रियों के संग से पुरुषों को दोष दिखाए हैं उन्हीं २ के पुरुषों से संग करने वाली स्त्रियों को भी वे २ पाप दोष लगते हैं इस से उन को भी उक्त प्रायश्चित्त ही करना चाहिये ॥ ४८ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में कर्मविपाक सम्बन्धी अगम्यागमन प्रायश्चित्तरूप पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

३४ शातातपस्मृतिः ॥

अश्वशूकरशृङ्ग्यद्रि द्रुमादिशकटेनच ।
भृग्वग्निदारुशस्त्राश्मविषोद्बन्धनजैर्मृताः ॥ १ ॥
व्याघ्रादिगजभूपालचोरवैरिदृकाहताः ।
काष्ठशल्यमृतायेच शौचसंस्कारवर्जिताः ॥ २ ॥
विसूचिकागलकवलदवातीसारतोमृताः ।
डाकिन्यादिग्रहैर्ग्रस्ता विद्युत्पातहताश्चये ॥ ३ ॥
अस्पृश्याअपवित्राश्च पतिताःपुत्रवर्जिताः ।
पञ्चत्रिंशत्प्रकारैश्च नाप्नुवन्तिगतिंमृताः ॥ ४ ॥
पित्राद्याःपिण्डभाजःस्युस्त्रयोलेपभुजस्तथा ।
ततोनान्दीमुखाःप्रोक्तास्त्रयोप्यश्रुमुखास्त्रयः ॥ ५ ॥
द्वादशैतेपितृगणास्तर्पिताःसन्ततिप्रदाः ।
गतिहीनाःसुतादीनां सन्ततिंनाशयन्तिते ॥ ६ ॥
दशव्याघ्रादिनिहता गर्भान्निघ्नन्त्यमीक्रमात् ।


घोड़ा, सुवर, सींगों वाले पशुओं ने मारे, पर्वत तथा वृक्षादि से गिरके, गाड़ी से पिचल के मरे, पर्वत की शिला, अग्नि, लकड़ी, शस्त्र, पत्थर, विष, और फांसी से मरे ॥ १ ॥ वाघ आदि, हाथी, राजा, चोर, शत्रु, भेड़िया, इन ने जिन को मारा, काष्ठ वा कांटे से घाव हो कर मरे जो शुद्धि तथा उपनयनादि संस्कारों से हीन रहते हुए मरे हों ॥ २ ॥ हैजा द्वारा, अन्न से, गले में ग्रास अटक जाने से, बन के अग्नि से, अतीसार (अधिक दस्तों के होने से) डाकिनी आदि से, ग्रहों (राहु आदि) से ग्रस्त (पकड़े हुए), बिजली पड़ने से, ॥ ३ ॥ स्पर्श न करने योग्य वा अपवित्र दशा (विष्ठा मूत्रादि में पड़के) में, पतित होके और पुत्रहीन हो कर जो मरे हों इन पैंतीश ३५ प्रकारों से मरे मनुष्यों की अच्छी गति नहीं होती है ॥ ४ ॥ पितादि तीन (पिता, पितामह, प्रपितामह, ) पिण्डों के भागी, उन से पहिले तीन लेप भागी, उनसे पहिले तीन नान्दीमुखश्राद्धभागी और उन से भी पहिले तीन अश्रुमुख पितर कहलातेहैं ॥५॥ ये बारह पितृगण श्राद्ध तर्पणादि से तृप्त हुये पुत्रादि की सन्तति बढ़ाते हैं। और श्राद्धादि न किये जावें तो वे ही पुत्रादि की सन्तति को नष्ट करते हैं ॥ ६ ॥ इसी श्लो० में कहे व्याघ्रादि दश के द्वारा मरे हुए पितर

द्वादशास्त्रादिनिहता आकर्षन्तिचबालकम् ॥ ७ ॥

भाषाऽर्थसंहिता ॥ ३५

द्वादशास्त्रादिनिहता आकर्षन्तिचबालकम् ॥ ७ ॥
विषादिनिहताघ्नन्ति दशसुद्वादशस्वपि ।
वर्षैकबालंकुर्यादनपत्योऽनपत्यताम् ॥ ८ ॥
व्याघ्रेणहन्यतेजन्तुः कुमारीगमनेनच ।
विषदस्त्वैवसर्पेण गजेननृपदुःखकृत् ॥ ९ ॥
राज्ञाराजकुमारघ्नश्चोरेणपशुहिंसकः ।
वैरिणामित्रभेदीच वकवृत्तिर्वृकेणतु ॥ १० ॥
गुरुघातीचशय्यायां मत्सरीशौचवर्जितः ।
द्रोहीसंस्काररहितः शुनानिःक्षेपहारकः ॥ ११ ॥
नरोविहन्यतेऽरण्ये शूकरेणचपाशिकः ।
कृमिभिःकृत्तवासाश्च कृमिणाचनिकृन्तनः ॥ १२ ॥
शृङ्गिणाशङ्करद्रोही शकटेनचसूचकः ।


क्रम से गर्भ को नष्ट करते हैं । और शस्त्रादि १२ से मरेहुए बालक को गर्भ में से खींचते ( गर्भ को गिरा देते ) हैं ॥ ७ ॥ विष खाने आदि से मरे दश तथा बारह वर्ष के बालक को भी नष्ट करते हैं । और निर्वंशी मरे पितर अपने २ कुल के एक वर्ष के बालक को नष्ट करते वा अन्यों को भी निर्वंश कर देते हैं ॥ ८ ॥ कुमारी कन्या से जो संग करता है वह जन्मान्तर में व्याघ्रसे मारा जाता है । विष देने वाला सांप से और राजा को दुःख देने वाला हाथी से मारा जाता है ॥ ९ ॥ राजकुमार को मार डालने वाला राजा की आज्ञा से, पशुहिंसक चोर से, मित्रों में फूट विरोध कराने वाला वैरी से, वकवृत्ति (अन्य का माल मारने में बगुला कासा ध्यान लगाने वाला ) भेडिया से मारा जाता है ॥१०॥ गुरु की हत्या करने वाला शय्या (खटिया) पर, मत्सरता करने वाला-अशुद्ध दशा में, द्रोह करने वाला-संस्कार हीन दशा में और धरोहर मारने वाला कुत्ते के काटने से मरता है ॥११ फांसी देने वाला-बन में सुअर से माराजाता, कपड़ा फाडने वाला-कीड़ों से मरता, गांठ काटने वाला कीड़े के काटने से मरता है ॥१२॥ शंकर भगवान् का द्रोही-शंग वाले से, निन्दक-गाड़ी से दबकर, भूमि चुराने वाला-पर्वत से गिर के, और यज्ञ में हानि

३६ शातातपस्मृतिः ॥

भृगुणामेदिनीचौरो वह्निनायज्ञहानिकृत् ॥ १३ ॥ दवेनदक्षिणाचोरः शस्त्रेणश्रुतिनिन्दकः । अश्मनाद्विजनिन्दाकृद्विषेणकुमतिप्रदः ॥ १४ ॥ उद्वन्धनेनहिंस्रःस्यात् सेतुभेदीजलेनतु । द्रुमेणराजदन्तहृदतिसारेणलोहहृत् ॥ १५ ॥ गोग्रासहृद्विषूचिकया कवलेनद्विजात्रहृत् । भ्रामेणराजपत्नीहृदतिसारेणनिष्क्रियः ॥ १६ ॥ शाकिन्याद्यैश्चम्रियते स्वदर्पात्कार्यकारकः । अनध्यायेप्यधीयानो म्रियतेविद्युतातथा ॥ १७ ॥ अस्पृश्योऽस्पृश्यसंगीच वान्तमाश्रित्यशास्त्रहृत् । पतितोऽपत्यविक्रेताऽनपत्योद्विजवस्त्रहृत् ॥ १८ ॥ विक्रेताघातकश्चैव द्वावेतौतुल्यवृत्तौ । घातकश्चैवहत्यायां राज्ञांरोषाच्चविक्रयी ॥ १९ ॥ अथतेषांक्रमेणैव प्रायश्चित्तं विधीयते ।


वा विघ्न करने वाला -अग्नि में जल कर मरता है ॥१३॥ दक्षिणा चुरानेवाला- दावाग्नि से, वेदनिन्दक-शस्त्र से, ब्राह्मणनिन्दक-पत्थर से, और बुरे काम को सिखाने वाला विष से मारा जाता है ॥ १४ ॥ हिंसक-फांसी से, बांध तो- ड़ने वाला-जल में डूब के, हाथीदांत का चुराने वाला-वृक्ष से गिर के, और लोहे के बर्तनों का चोर-दस्त होने द्वारा मरता है ॥१५॥ गौ का ग्रास (पहिली रोटी) खाने वाला-विषूचिका (हैज़ा) से, ब्राह्मणार्थ समर्पित भोजन वा अन्न को मारलेने वाला-ग्रास अटकने से, राजपत्नी को भगा ले जाने वाला -भ्रमरोग से, और निकम्मा-अतीसार (दस्तों के) रोग से मरता है ॥ १६ ॥ अपने दर्प से काम करने वाला शाकिनी आदि लगने से मरता, अनध्याय के दिन वेद पढ़ने वाला विद्युत् गिरने से मरता है ॥ १७ ॥ स्पर्श न करने योग्य का संगी-अस्पृश्य (मलमूत्रादि से लिप्त) दशामें, शास्त्र को चुराने वाला-प- तित होके, और ब्राह्मण के वस्त्र' चुराने वाला- निर्वंशी सन्तान हीन होकर मरता है ॥ १८ ॥ सन्तान बेंचने और मार डालने वाला दोनों तुल्य अपराधी हैं। घातक तो हत्या में और बेंचने वाला सन्तान त्यानी धनको भोगताहुआ सन्तान को ही भोगता है ॥ १९ ॥ अब इन थोड़े अर्थह से मरने वालों के

भाषासंसहिता ॥ ६३

कारयेन्निष्कमात्रंतु पुरुषंप्रेतरूपिणम् ॥ २० ॥ चतुर्भुजंदण्डहस्तं महिषासनसंस्थितम् । पिष्टैःकृष्णतिलैःकुर्यात्पिण्डंप्रस्थप्रमाणतः ॥ २१ ॥ मध्वाज्यशर्करायुक्तं स्वर्णकुण्डलसंयुतम् । अकालमूलंकलशं पञ्चपल्लवसंयुतम् ॥ २२ ॥ कृष्णवस्त्रसमाच्छन्नं सर्वौषधिसमन्वितम् । तस्योपरिन्यसेद्देवं पात्रंधान्यफलैर्युतम् ॥ २३ ॥ सप्तधान्यन्तु सफलं तत्रतत्संमुखंन्यसेत् । कुम्भोपरिचांवेन्यस्य पूजयेत्प्रेतरूपिणम् ॥ २४ ॥ कुर्यात्पुरुषसूक्तेन प्रत्यहंदुग्धतर्पणम् । षडङ्गांश्चजपेद्रुद्रान् कलशेऽत्रवेदवित् ॥ २५ ॥ यमसूक्तेनकुर्वीत यमपूजादिकंतथा । गायत्र्याश्चैवकर्त्तव्यो जपःस्वात्मविशुद्धये ॥ २६ ॥


संक्षिप्त क्रम से ही कहते हैं कि घोड़े आदि अपमृत्यु से मरने पर प्रेतरूपी यम देव की चार तोला सुवर्ण की एक प्रतिमा बनावे उसमें चार भुजाहों हाथ में दण्ड हो, भैंसे पर सवार हो । फिर काले तिलों को पीस कर ढाईपाव का एक पिण्ड बनावै ॥ २१ ॥ उस पिण्ड में शहद घी और शक्कर भी मिली हो, सुवर्ण के कुण्डल भी उस पिण्ड पर घरे। जो तल में काला न हो ऐसे एक कलश को स्थापित करके उस पर पांच पल्लव (पत्ते) घरे ॥ २२ ॥ काले वस्त्र से उस कलश को ढांप कर सर्वौषध (मख जौ आदि) उस पर घरे। और जो चांवलादि धान्य तथा फलों से भरके एक पात्र कलश के ऊपर धरके उस पर ऊपर लिखी यम देवता की मूर्ति को स्थापित करे ॥ २३ ॥ और ऋतु फलों सहित सात धान्य (सतनजा) वहां देवमूर्ति के सामने धरै। इस प्रकार कलश पर स्थापित किये प्रेतरूपी यमराज का निम्न रीति से पूजन करे ॥ २४ ॥ अपसव्य होके पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा दूध से प्रतिदिन यमराज का तर्पण करे अर्थात् मूर्ति पर प्रत्येक मन्त्रान्त में दूध चढ़ाया करे और इस के साथ ही एक वेदपाठी ब्राह्मण कलश के समीप में षडङ्ग रुद्री का पाठ कियाकरे ॥ २५ ॥ और वेदोक्त यमसूक्त से यमराज का नित्य पूजन करे और अपनी शुद्धि के लिये वहां कलश के समीप में गायत्री का जप भी करता कराता रहे ॥ २६ ॥

३८ शातातपस्मृतिः ॥

ग्रहशान्तिकपूर्वकं च दशांशंजुहुयात्तिलैः ।
अज्ञातनामगोत्राय प्रेतायसतिलोदकम् ॥
प्रदद्यात्पितृतीर्थेन पिण्डंमन्त्रमुदीरयेत् ॥ २७ ॥
इमंतिलमयं पिण्डं मधुसर्पिःसमन्वितम् ।
ददामितस्मैप्रेताय यःपीडांकुरुतेमम ॥ २८ ॥
सजलांकृष्णकलशांस्तिलपात्रसमन्वितान् ।
द्वादशप्रेतमुद्दिश्य दद्यादेकंचविष्णवे ॥ २९ ॥
ततोऽभिषिञ्चेदाचार्यो दम्पतीकलशोदकैः ॥
शुचिर्वरायुधधरो मन्त्रैर्वरुणदैवतैः ॥ ३० ॥
यजमानस्ततोदद्यादाचार्यायसदक्षिणाम् ।
ततोनारायणबलिः कर्त्तव्यःशास्त्रनिश्चयात् ॥ ३१ ॥
एषसाधारणविधिर्गतीनामुदाहृतः ।
विशेषस्तुपुनर्ज्ञेयो व्याघ्रादिनिहतेष्वपि ॥ ३२ ॥
व्याघ्रेणनिहतेप्रेते परकन्यांविवाहयेत् ।


फिर ग्रहशान्ति पूर्वक घी मिले तिलों से दशांश होम करे और तिलों तथा जल के सहित पूर्वोक्त तिलों के पिण्ड को (इमंतिल०) मन्त्र पढ़कर अपसव्य हो दक्षिण को मुखकर अज्ञात नाम गोत्र वाले मृतपुरुष के नाम से पितृतीर्थ-द्वारा छोड़े ॥ २७ ॥ शहद और घी से युक्त तिल स्वरूप इस पिण्ड को मैं उस प्रेत के लिये देता हूं कि जो मुझ को पीडित करता है ॥ २८ ॥ जिन पर तिलों से भरा एक २ पात्र रक्खा हो ऐसे जल से भरे काले रंगेहुए बारह कलश प्रेत के उद्देश से दान करे । और एक कलश विष्णु के नाम से दान करे ॥ २९ ॥ तदनन्तर अच्छा शस्त्र धारण किये या स्फ्य को हाथ में लिये पवित्र हुआ आचार्य्य पुरुष यजमान स्त्री पुरुषों का कलश के जल से वरुणदेवतावाले मन्त्रों द्वारा अभिषेक करे ॥ ३० ॥ फिर यजमान दक्षिणा सहित वह प्रतिमा आचार्य्य को दे देवे । तदनन्तर शास्त्र के निश्चय से नारायणबलि करे ॥ ३१ ॥ यह अच्छी गति न होने वाले अपमृत्यु से मरों के लिये साधारण विधान कहा गया है । अब व्याघ्रादि से मरे हुओं के विषय में भिन्न २ विशेष विधान दिखाते हैं ॥३२॥ व्याघ्र से मरे प्रेत के निमित्त अन्य किसी की कन्या का विवाह

भाषाऽर्थसहिता ॥ ३९

सर्पदंशेनागबलिर्देयःसर्षपुकान्चनम् ॥ ३३ ॥ चतुर्निष्कमिमंहेम गजंदद्याद्गजेर्हते । राज्ञाविनिहतेदद्यात्पुरुषन्तुहिरण्मयम् ॥ ३४ ॥ चौरेणनिहतेधेनुं वैरिणानिहतेवृषम् । वृकेणनिहतेदद्याद्यथाशक्तिचकाञ्चनम् ॥ ३५ ॥ शय्यामृतेप्रदातव्या शय्यातूलीसमान्विता ॥ निष्कमात्रंसुवर्णस्य विष्णुनासमधिष्ठिता ॥ ३६ ॥ शौचहीनेमृतेचैव द्विनिष्कस्वर्णजंहरिम् । संस्कारहीनंचमृते कुमारंचविवाहयेत् ॥ ३७ ॥ शुनाहतेचनिःक्षेपं स्थापयेन्निजशक्तितः । शूकरेणहतेदद्यान्महिषंदक्षिणान्वितम् ॥ ३८ ॥ कृमिभिश्चमृतेदद्याद् गोधूमार्द्धद्विजातये । शृङ्गिणाचहतेदद्याद् वृषंसंवस्त्रसंयुतम् ॥ ३९ ॥ शकटेनमृतेदद्याद् दव्यंसोपस्करान्वितम् ।

अपने व्यय से करा देवे । सांप के काटने से मरने पर सब छवियों में किंचित् किंचित् सुवर्ण धरके सांपों के लिये बलि देवे ॥ ३३ ॥ हाथी से मारेजाने पर सोलह तोला सुवर्ण का हाथी बनाकर दान करे । राजाज्ञा से मारे गये पर सुवर्ण का पुरुष बनाके दान करे ॥ ३४ ॥ चौर से मृत्यु होने पर गोदान, और शत्रु से मारे जाने पर बैल का दान करे । भेड़िया से मारेजाने पर यथाशक्ति सुवर्ण का दान करे ॥ ३५ ॥ खटिया पर मरजाने पर चार तोला सुवर्ण से बनायी तोशक तकिया सहित खटिया पर स्थापित की विष्णुभगवान् की मूर्ति का दान करे ॥ ३६ ॥ अशुद्ध दशा में मरने पर आठ तोला सुवर्ण की विष्णु मूर्ति का दान करे । संस्कारहीन दशा में मरने पर ब्राह्मण कुमार का विवाह अपने व्यय से करावे ॥ ३७ ॥ कुत्ते के काटने से मरने पर अपनी शक्ति के अनुसार धर्म के लिये किसी के यहां धन जमा करे । सूअर से मृत्यु होने पर दक्षिणा सहित भैंसा का दान करे ॥ ३८ ॥ कृमियों से मरने पर ब्राह्मण को गेहूं का दान करे । और सींगवाले पशु से मृत्यु हो तो वस्त्र सहित बैल का दान करे ॥ ३९ ॥ गाड़ी से दब के मरने पर सामग्री सहित धन का दान करे । पहाड़ से गिर कर मरने पर धान्य पर्वत का दान करे (जौ चांवलादि अन्न का

४० शातातपस्मृतिः ॥

भृगुपातेमृतेचैव प्रदद्याद्धान्यपर्वतम् ॥ ४० ॥ अग्निनानिहितेकार्यमग्निदानंस्वशक्तितः । दारुणा निहतेचैव कर्तव्यासद्मनेसभा ॥ ४१ ॥ शस्त्रेणनिहतेदद्यान्महिषींदक्षिणान्विताम् । अश्मनानिहतेदद्यात्सवत्सांगांपयस्विनीम् ॥ ४२ ॥ विषेणचमृतेदद्यान्मेदिनींहेमनिर्मिताम् । उद्बन्धनमृतेचापि प्रदद्याद्गांपयस्विनीम् ॥ ४३ ॥ मृतेजलेनवरुणं हैमंदद्याद्द्विनिष्ककम् । वृक्षेवृक्षहतेदद्यात्सौवर्णंस्वर्णसंयुतम् ॥ ४४ ॥ अतिसारमृतेलक्षं सावित्र्याः संयतोजपेत् । शाकिन्यादिमृतेचैवं जपेद्रुद्रंयथोचितम् ॥ ४५ ॥ कासरोगमृतेवापि कृच्छ्राब्दिकव्रतं चरेत् । विद्युत्पातेननिहते विद्यादानंसमाचरेत् । अस्पर्शंचमृतेकार्यं वेदपारायणंतथा ॥ ४६ ॥ सच्छास्त्रपुस्तकंदद्याद्वान्नमग्नित्यसंस्थिते ।


इतना ऊंचा ढेर लगावे जिस के पार खड़ा मनुष्य दूसरे पार से न दीखे उस को धान्य पर्वत कहते हैं) ॥ ४० ॥ अग्नि से मरने पर यथाशक्ति सुवर्ण वा दीपादि प्रकाश का दान करे । काष्ठ से मरने पर धर्मशाला वा व्याख्यानसमा बनवा देवे ॥ ४१ ॥ शस्त्र से मरने पर दक्षिणा महित भैंस का दान करे । पत्थर से मरने पर बछड़ा सहित दूध देती गौ का दान करे ॥ ४२ ॥ विष से मरने पर सुवर्ण से जटिल पृथिवी का, और फांसी से मरने पर दूध देती गौ का दान करे ॥ ४३ ॥ जल से मरने पर आठ तोला सुवर्ण से बनी वरुणादेवता की प्रतिमा का, और वृक्ष से मरने पर यथाशक्ति सुवर्ण से बनाये सुवर्ण दक्षिणा सहित वृक्ष का दान करे ॥ ४४ ॥ अतीसार (दस्त हो कर) से मरने पर नियम बद्ध हो कर एक लक्ष गायत्री का जप करे । शाकिनी आदि की बाधा से मरने पर रुद्री के यथोचित ११ पाठ और दशांश होम करे ॥ ४५ ॥ खांसी के रोग से मृत्यु होने पर एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करे । बिजली गिरने से मरने पर विद्या दान करे और स्पर्श न करने योग्य दशा में मरे तो वेद का पारायण करे ॥ ४६ ॥ वमन हो कर मरे तो सत् शास्त्र के पुस्तक का दान

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९

पातित्येन मृतेकुर्यात्प्राजापत्यानिषोडश ॥ ४७ ॥
मृतेचापत्यरहिते कृच्छ्राणांनवतिंचरेत् ।
निष्कत्रयमितंस्वर्णं दद्यादश्वंहयाहते ॥ ४८ ॥
कपिनानिहतेदद्यात् कपिंकनकनिर्मितम् ।
विषूचिकामृतेस्वादु भोजयेच्चशतंद्विजान् ॥ ४९ ॥
तिलधेनुःप्रदातव्या कण्ठेऽन्नकवलैमृते ।
केशरोगमृतेचापि अष्टौकृच्छ्रान्समाचरेत् ॥ ५० ॥
एवंकृतेविधानेन विदध्यादौर्ध्वदैहिकम् ।
सतःप्रेतत्वनिर्मुक्ताः पितरस्तर्पितास्तथा ॥ ५१ ॥
दद्युःपुत्रांश्चपौत्रांश्च आयुरारोग्यसंपदः ॥ ५२ ॥
इतिशातातपप्रोक्तो विपाकःकर्मणामयम् ।
शिष्यायशरभङ्गाय विनयात्परिपृच्छते ॥ ५३ ॥
इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके अगतिप्राय-
श्चित्तनिरूपणं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इति शातातपस्मृतिः समाप्ता ॥
श्रीरस्तु


करे । पतित होने से मरे तो सोलह प्राजापत्य व्रत करे ॥४७॥ सन्तान रहित होके मरे तो ९० नब्बे कृच्छ्र व्रत करे । घोड़े से मरे तो १२ तोला सुवर्ण का घोड़ा बना के दान करे ॥ ४८ ॥ बानर से मरे तो सुवर्ण का बानर बनाकर दान करे । और हैजा से मरे तो सौ १०० ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करावे ॥४९॥ कण्ठ में अन्न का ग्रास अटकने से मरे तो तिलधेनु का दान करे और बालों के रोग से मरे तो आठ कृच्छ्र व्रत करे ॥५०॥ ऐसा करके विधिपूर्वक सूतक के श्राद्धादि कर्म करे । तिस से प्रेतयोनि से छूटते और पितृगण भी तृप्त होते हैं ॥ ५१ ॥ तृप्त हुए पितर पुत्र, पौत्र, आयु, नीरोगता और सम्पत्ति अपने कुटुम्बियों को देते हैं ॥ ५२ ॥ यह महर्षि शातातप ने विनय पूर्वक पूछते हुए अपने शरभङ्ग नामक शिष्य से कर्मोंका फल कहा है ॥५३॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में कर्म विपाक मध्ये अगति प्रायश्चित्त निरूपण नाम छठा अध्याय पूरा हुआ ॥६॥ तथा यह शातातप स्मृति भी समाप्त हुई ॥ ओं शान्तिः ॥ ३ ॥

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श्रीगणेशायनमः ॥

अथवासिष्ठस्मृतिप्रारम्भः॥

अथातः पुरुषनिःश्रेयसार्थं धर्मजिज्ञासा ॥ १ ॥ ज्ञात्वा चानुतिष्ठन्धार्मिकः प्रशस्यतमो भवति लोके प्रेत्य च स्वर्गं लोकं समश्नुते ॥२॥ श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः ॥३॥ तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम् ॥ ४ ॥ शिष्टः पुनरकामात्मा ॥५॥ अगृह्यमाणकारणो धर्मः ॥६॥ आर्यावर्त्तः प्रागादर्शात्प्रत्यक्कालकवनादुदक्पारियात्राद् दक्षिणेन हिमवत उत्तरेण विन्ध्यस्य ॥७॥ तस्मिन्देशे ये धर्मा येचाचारास्ते सर्वे प्रत्येतव्याः ॥८॥ नत्वन्ये प्रतिलोमकल्पधर्म्माणः ॥६॥ एतदार्यावर्त्तमित्याचक्षते ॥१०॥ गङ्गायमुनयोरन्तरेऽप्येके ॥ ११ ॥ यावद्वा कृष्ण-


अब वसिष्ठस्मृति का प्रारम्भ किया जाता है ॥ सुखाभिलाषी होने से मनुष्य के कल्याणार्थ धर्म को जानने की इच्छा करनी चाहिये ॥ १ ॥ धर्मको जानकर सेवन करता हुआ मनुष्य लोक में प्रामाणिक धर्मात्मा कहाता हुआ अत्यन्त प्रशंसा के योग्य होता और जन्मान्तर में स्वर्ग का सुख भोगता है ॥२॥ श्रुति (वेद) तथा स्मृति (धर्मशास्त्र) में विधान किया कर्त्तव्य-धर्म कहाता है ॥३॥ जिसका प्रमाण श्रुति स्मृति में न हो उसके लिये शिष्ट लोगों का आचार ही प्रमाण है ॥४॥ निःस्पृह निर्लोभ निष्काम पुरुष शिष्ट कहाते हैं ॥५॥ जो काम लोभादिकारणके विना ही किया जाय वही धर्म है ॥६॥ आदर्श से पूर्व' कालक बन से पश्चिम, पारियात्रसे उत्तर, हिमालय से दक्षिण और विन्ध्याचल से उत्तर में जो देश है वह आर्यावर्त्त कहाता है ॥७॥ उस आर्यावर्त्त देश में जो २ धर्म और आचार हैं वे सब प्रतीति (विश्वास करने) योग्य हैं ॥ ८ ॥ अन्य प्रान्तीय धर्म प्रतिलोम उलटी कल्पना से युक्त होने से विश्वास के योग्य नहीं हैं ॥६॥ इस देश को (आर्यावर्त्तम्) एसा कहते हैं ॥१०॥ कोई आचार्य गंगा यमुना के बीच को आर्यावर्त्त कहते हैं ॥११॥ और कोई आचार्य कहते

२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

मृगो विचरति तावद्ब्रह्मवर्चसमित्यन्ये ॥१२॥ अथापि भा- ल्लविनो निदाने गाथामुदाहरन्ति ॥ १३ ॥ पश्चात्सिन्धुर्विहरिणी सूर्यस्योदयनंपुरः । यावत्कृष्णोऽभिधावति तावद्वैब्रह्मवर्चसम् ॥ १४ ॥ त्रैविद्यवृद्धायंब्रूयुर्धर्मन्धर्मविदो जनाः । पवनेपावनेचैव सधर्मोनात्रसंशयः । इति ॥१५॥ देशधर्मजातिधर्मकुलधर्मान् श्रुत्यभावादब्रवीन्मनुः ॥१६॥ सूर्याभ्युदितः सूर्याभिनिर्मुक्तः कुनखी श्यावदन्तः परिवित्तिः परिवेत्ताऽग्रेदिधिषूर्दिधिषूपतिर्वीरहा ब्रह्मोञ्झइत्येनस्विनः १७ पञ्च महापातकान्याचक्षते ॥१८॥ गुरुतल्पं सुरापानं भ्रूणहत्यां ब्राह्मणसुवर्णापहरणं पतितसंयोगञ्च ॥१९॥ ब्राह्मेण वा यौनेन


हैं कि जहां तक कृष्ण (कषांयल) हिरण स्वभाव से विचरते हैं वहां तक के प्रदेशों में ब्रह्मतेज होने से धर्म की भूमि है ॥ १२ ॥ और भी भाल्लवी शाखाध्यायी ऋषि लोग प्राचीन गाथा का उदाहरण देते हैं कि-॥१३॥ पश्चिम में विहार करती हुई सिन्धु नदी, पूर्व में सूर्य नारायण के उदय का स्थान और जहां तक कृष्ण मृग स्वभाव से विचरता है वहां तक ब्रह्मतेज (यज्ञियभूमि) है ॥ १४ ॥ तीनों वेद की विद्या में जो वृद्ध (विशेष जानकार) हैं वे धर्म का तत्त्व जानने वाले विद्वान् लोग जिस धर्म को कहें उसके पावन होने वा शोधक होने में सन्देह नहीं है ॥१५॥ देशधर्म, जातिधर्म, कुल धर्मों को श्रुति में न होने से मनुजी ने कहा है ॥१६॥ सूर्य के उदय तथा अस्त होने के समय जो सन्ध्यादि न करे, बिगड़े नखों वाला, कालेदांतों वाला, जेठभाई से पहिले अपना विवाह करने तथा अग्निहोत्र लेने वाला-परिवेत्ता, उसका बड़ाभाई परिवित्ति, जिस के आगे (विद्यमान रहते) ही स्त्री ने दूसरा पति कर लिया हो वह अग्रेदिधिषू और उसका द्वितीयपति-दिधिषूपति, स्थापित अग्नि को त्यागने वाला, और वेदाध्ययन को त्यागने वाला ब्राह्मण ये सब पापी कहाते हैं ॥१७॥ पांच महा पातक विद्वान् लोग कहते हैं ॥१८॥ गुरुपत्नीगमन, सुरापीना, भ्रूण (ब्राह्मण से ब्राह्मणी में हुए गर्भ की) हत्या करना, ब्राह्मण का सुवर्ण चुराना, और इन पतितों के साथ सम्बन्ध करना ॥१९॥ वह सम्बन्ध वेदादि के पढ़ने पढ़ाने

भाषार्थसंहिता ॥

वा ॥२०॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥२१॥
संवत्सरेणपतति पतितेनसहाऽऽचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्नतुयानासनाशनात् । इति ॥२२॥
योऽग्नीनपविध्येद् गुरुं च यः प्रतिजघ्नुयान्नास्तिको ना-
स्तिकवृत्तिः सोमं च विक्रीणीयादित्यपपातकानि ॥ २३ ॥
तिस्रो ब्राह्मणस्य भार्या वर्णानुपूर्व्येण,द्वे राजन्यस्य,एकैका
वैश्यशूद्रयोः ॥ २४ ॥ शूद्रामप्येके मन्त्रवर्जं तद्वत् ॥ २५ ॥
तथा न कुर्यात् ॥ २६ ॥ अतो हि ध्रुवः कुलापकर्षः प्रेत्य चा-
स्वर्गः ॥ २७ ॥ षड्विवाहाः ॥ २८ ॥ ब्राह्मो दैव आर्षो गा-
न्धर्वः क्षात्रो मानुषश्चेति ॥ २९ ॥ इच्छत उदकपूर्वं यां द-
द्यात्स ब्राह्मः ॥ ३० ॥ यज्ञतन्त्रे वितत ऋत्विजे कर्म कुर्वते


तथा विवाह करने इन दो प्रकार से पतित करता है ॥ २० ॥ इस पर श्लोक प्रमाण कहते हैं कि-॥ २१ ॥ पतित को यज्ञ कराने, वेद पढ़ाने और उसकी कन्या से विवाह करने से एक वर्ष में पतित होजाता है । परन्तु एक सवारी नौकादि में, वा सभादि में पतित के साथ चलने बैठने तथा एक पङ्क्ति में भोजन करने से पतित नहीं होता । किन्तु उसमें भी कुछ पाप अवश्य लगता है ॥२२॥

जो स्थापित अग्नियों को नष्ट करे, गुरु को त्यागे वा विरोध करे, वेद का निन्दक, नास्तिकताके कामों से जीविका करने वाला, और जो यज्ञ में सोम को बेंचे वे सब उपपातकी कहाते हैं ॥ २३ ॥ ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या ये तीन ब्राह्मण की पत्नी, क्षत्रिया, वैश्या दो क्षत्रिय की, वैश्य तथा शूद्र की अपने २ वर्ण की एक २ स्त्री हो ( ब्राह्मण क्षत्रिय कामी हों तो उन को सवर्णा से भिन्न उक्त स्त्रियों से विवाह करना व्यभिचार से अच्छा मध्यम कोटि है । और एक सवर्णा से विवाह करना सर्वथा उत्तम है ) ॥ २४ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि ब्राह्मणादि वेद मन्त्रों के बिना शूद्र कन्या से भी चाहें तो विवाह क-रलें ॥ २५ ॥ सो वैसा न करे ॥ २६ ॥ क्योंकि शूद्र कन्या के साथ विवाह करने से अवश्य ही कुल बिगड़ता और जन्मान्तर में स्वर्ग प्राप्त नहीं हो सकता ॥ २७ ॥ विवाह छः हैं ॥ २८ ॥ ब्राह्म१ । दैव२ । आर्ष३ । गान्धर्व४ । क्षात्र५ । मानुष६ ॥२९॥ इच्छा करते हुये योग्य वर को हाथ में जल लेके संकल्प पूर्वक जिस कन्या को देवे वह ब्राह्म विवाह कहाता है ॥३०॥ अनेक विध अङ्गाङ्गिभाव से

४ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

कन्यां दद्यादलङ्कृत्य तं दैवमित्याचक्षते ॥३१॥ गोमिथुनेन चाऽऽर्षः ॥ ३२ ॥ सकामां कामयमानः सदृशीं यो निरुह्यात्स गान्धर्वः ॥ ३३ ॥ यां बलेन सहसा प्रमथ्य हरन्ति स क्षात्रः ॥ ३४ ॥ पणित्वा धनक्रीतां स मानुषः ॥ ३५ ॥ तस्माद्दुहितृमतेऽधिरथं शतं देयमितीह क्रयो विज्ञायते ॥ ३६ ॥ या पत्युः क्रीता सत्यथान्यैश्चरतीति ह चातुर्मास्येषु ॥ ३७ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३८ ॥ विद्याप्रणष्टापुनरभ्युपैति जातिप्रणाशोत्त्विहसर्वनाशः । कुलापदेशेनहयोऽपिपूज्यस्तस्मात्कुलीनांस्त्रियमूद्वहन्तिइति॥३६॥ त्रयो वर्णा ब्राह्मणस्य वशे वर्त्तेरन् ॥४०॥ तेषां ब्राह्मणो धर्मान्प्रब्रूयान् ॥४१॥


विस्तार के साथ यज्ञ में ऋत्विज् का काम करते हुये वर को वस्त्राभूषणों से सहित कन्या को देवे उस को दैव विवाह कहते हैं ॥ ३१ ॥ एक गौ एक बैल वा उन का मूल्य वा कुछ न्यूनाधिक धन वर से लेकर कन्या देना आर्ष विवाह है ॥ ३२ ॥ कन्या वर दोनों की परस्पर कामना से अपने वर्ण की सदृश कन्या का ग्रहण करना गान्धर्व विवाह कहाता है ॥ ३३ ॥ जिस को बल पूर्वक विना विचारे रोकने वालों से युद्ध कर मार पीट के हर लाना यह क्षात्र विवाह है ॥ ३४ ॥ मूल्य ठहरा कर कन्या को खरीद लेना मानुष विवाह कहाता है ॥ ३५ ॥ श्रुति में लिखा है कि तिस से कन्या वाले को रथ सहित सौ धन ( स्वर्ण मुद्रादि ) देवे इस विधि से कन्या का खरीदना जाना जाता है ( परन्तु अन्य रीति से कार्य न होने पर यह निकृष्ट पक्ष है ) ॥ ३६ ॥ और चातुर्मास्ययागों के प्रकरण में यह लिखा है कि " जो पति की खरीदी हुई अन्य पुरुषों से संग करती है ( वह पापिनी नीच है ) " इस से भी उक्त अभिप्राय ही प्रकट होता है ॥ ३७ ॥ अब अन्य श्लोक भी उदाहरण में कहते हैं ॥३८॥ पढ़ी हुई विद्या नष्ट हो जाय तो फिर भी पढ़ना हो सकता है पर नीच स्त्री से जो जाति (वंश) का नाश (नीचता) हो जाय तो सभी नष्ट हुआ जानो । क्यों कि अच्छी नसल रूप कुलीनताके बहाने से घोड़ा भी प्रशंसा के योग्य होता है इस कारण कुलीन स्त्री से विवाह करे ॥३९॥ क्षत्रियादि तीनों वर्ण ब्राह्मण के आधीन रहें ॥४०॥ उन सब को यथाधिकार ब्राह्मण धर्मोपदेश करे ॥ ४१ ॥

भाषार्थसहिता ॥

तं राजाचानुशिष्यात् ॥ ४२ ॥ राजा तु धर्मेणानुशासत् षष्ठमंशं धनस्य हरेत् ॥ ४३ ॥ अन्यत्र ब्राह्मणात् ॥ ४४ ॥ इष्टापूर्तस्य तु षष्ठमंशं भजति-इति ह ब्राह्मणो वेदमार्गं करोति, ब्राह्मणआपदउद्धरति, तस्माद् ब्राह्मणोऽनाद्यः ॥४५॥ सोमोऽस्य राजा भवतीति ह प्रेत्य चाऽऽभ्युदयिकमिति ह विज्ञायते ॥ ४६ ॥

इति श्रीवासिष्ठे धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

चत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः ॥१॥ त्रयो वर्णा द्विजातयो ब्राह्मणक्षत्रियवैश्याः ॥२॥ तेषां मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जीबन्धने ॥३॥ तत्रास्य माता सावित्री पितात्वाचार्यउच्यते ॥४॥ वेदप्रदानात्पितृत्वेनाचार्यमाचक्षत ॥ ५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥६॥ द्वयमुर्वै ह पुरुषस्य रेतो ब्राह्मणस्योर्ध्व-


और ब्राह्मण को अपने धर्म पर चलानेवाला राजा शासक रहे ॥ ४२ ॥ राजा धर्मानुकूल सबकी रक्षा वा शासन करता हुआ धन के लाभ में से छठा२ भाग कर लेवे ॥ ४३ ॥ परन्तु ब्राह्मण से कुछ भी कर न लेवे ॥ ४४ ॥ धर्म सम्बन्धी श्रौत स्मार्त्त ब्राह्मण के किये कराये कर्मों का छठा भाग पुण्य फल राजा को मिलता है । ब्राह्मण वेद को मुख्य मान के ग्रहण करता वा पढ़ाता है तथा आपदाओं से बचाता है जिससे ब्राह्मण का अन्न धनादि राजा न लेवे ॥ ४५॥ वेद में लिखा है कि (सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा) ब्राह्मण का राजा सोम होता है । और मर कर भी ब्राह्मण सुख देनेवाला है यह भी वेद से जाना जाता है ॥ ४६ ॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में प्रथमाध्याय पूरा हुआ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ये चार वर्ण कहाते हैं ॥१॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ये तीन वर्ण द्विजातिहैं ॥२॥ उनका पहिला जन्म माता से और द्वितीय जन्म उपनयन संस्कार से होता है ॥३॥ उस द्वितीय जन्म में माता सावित्री मन्त्र और आचार्य पिता माना जाता है ॥४॥ वेद के देने से आचार्य को पिता कहते हैं ॥५॥ इस में श्रुति का उदाहरण कहते हैं कि-॥ ६ ॥ "ब्राह्मण पुरुष के शरीर में सन्तानोत्पादन की शक्ति दो प्रकार की है । एक नाभि से ऊपर