अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 691, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसंहिता ॥ ३
वा ॥२०॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥२१॥
संवत्सरेणपतति पतितेनसहाऽऽचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्नतुयानासनाशनात् । इति ॥२२॥
योऽग्नीनपविध्येद् गुरुं च यः प्रतिजघ्नुयान्नास्तिको ना-
स्तिकवृत्तिः सोमं च विक्रीणीयादित्यपपातकानि ॥ २३ ॥
तिस्रो ब्राह्मणस्य भार्या वर्णानुपूर्व्येण,द्वे राजन्यस्य,एकैका
वैश्यशूद्रयोः ॥ २४ ॥ शूद्रामप्येके मन्त्रवर्जं तद्वत् ॥ २५ ॥
तथा न कुर्यात् ॥ २६ ॥ अतो हि ध्रुवः कुलापकर्षः प्रेत्य चा-
स्वर्गः ॥ २७ ॥ षड्विवाहाः ॥ २८ ॥ ब्राह्मो दैव आर्षो गा-
न्धर्वः क्षात्रो मानुषश्चेति ॥ २९ ॥ इच्छत उदकपूर्वं यां द-
द्यात्स ब्राह्मः ॥ ३० ॥ यज्ञतन्त्रे वितत ऋत्विजे कर्म कुर्वते
तथा विवाह करने इन दो प्रकार से पतित करता है ॥ २० ॥ इस पर श्लोक प्रमाण कहते हैं कि-॥ २१ ॥ पतित को यज्ञ कराने, वेद पढ़ाने और उसकी कन्या से विवाह करने से एक वर्ष में पतित होजाता है । परन्तु एक सवारी नौकादि में, वा सभादि में पतित के साथ चलने बैठने तथा एक पङ्क्ति में भोजन करने से पतित नहीं होता । किन्तु उसमें भी कुछ पाप अवश्य लगता है ॥२२॥
जो स्थापित अग्नियों को नष्ट करे, गुरु को त्यागे वा विरोध करे, वेद का निन्दक, नास्तिकताके कामों से जीविका करने वाला, और जो यज्ञ में सोम को बेंचे वे सब उपपातकी कहाते हैं ॥ २३ ॥ ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या ये तीन ब्राह्मण की पत्नी, क्षत्रिया, वैश्या दो क्षत्रिय की, वैश्य तथा शूद्र की अपने २ वर्ण की एक २ स्त्री हो ( ब्राह्मण क्षत्रिय कामी हों तो उन को सवर्णा से भिन्न उक्त स्त्रियों से विवाह करना व्यभिचार से अच्छा मध्यम कोटि है । और एक सवर्णा से विवाह करना सर्वथा उत्तम है ) ॥ २४ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि ब्राह्मणादि वेद मन्त्रों के बिना शूद्र कन्या से भी चाहें तो विवाह क-रलें ॥ २५ ॥ सो वैसा न करे ॥ २६ ॥ क्योंकि शूद्र कन्या के साथ विवाह करने से अवश्य ही कुल बिगड़ता और जन्मान्तर में स्वर्ग प्राप्त नहीं हो सकता ॥ २७ ॥ विवाह छः हैं ॥ २८ ॥ ब्राह्म१ । दैव२ । आर्ष३ । गान्धर्व४ । क्षात्र५ । मानुष६ ॥२९॥ इच्छा करते हुये योग्य वर को हाथ में जल लेके संकल्प पूर्वक जिस कन्या को देवे वह ब्राह्म विवाह कहाता है ॥३०॥ अनेक विध अङ्गाङ्गिभाव से