भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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४ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

कन्यां दद्यादलङ्कृत्य तं दैवमित्याचक्षते ॥३१॥ गोमिथुनेन चाऽऽर्षः ॥ ३२ ॥ सकामां कामयमानः सदृशीं यो निरुह्यात्स गान्धर्वः ॥ ३३ ॥ यां बलेन सहसा प्रमथ्य हरन्ति स क्षात्रः ॥ ३४ ॥ पणित्वा धनक्रीतां स मानुषः ॥ ३५ ॥ तस्माद्दुहितृमतेऽधिरथं शतं देयमितीह क्रयो विज्ञायते ॥ ३६ ॥ या पत्युः क्रीता सत्यथान्यैश्चरतीति ह चातुर्मास्येषु ॥ ३७ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३८ ॥ विद्याप्रणष्टापुनरभ्युपैति जातिप्रणाशोत्त्विहसर्वनाशः । कुलापदेशेनहयोऽपिपूज्यस्तस्मात्कुलीनांस्त्रियमूद्वहन्तिइति॥३६॥ त्रयो वर्णा ब्राह्मणस्य वशे वर्त्तेरन् ॥४०॥ तेषां ब्राह्मणो धर्मान्प्रब्रूयान् ॥४१॥


विस्तार के साथ यज्ञ में ऋत्विज् का काम करते हुये वर को वस्त्राभूषणों से सहित कन्या को देवे उस को दैव विवाह कहते हैं ॥ ३१ ॥ एक गौ एक बैल वा उन का मूल्य वा कुछ न्यूनाधिक धन वर से लेकर कन्या देना आर्ष विवाह है ॥ ३२ ॥ कन्या वर दोनों की परस्पर कामना से अपने वर्ण की सदृश कन्या का ग्रहण करना गान्धर्व विवाह कहाता है ॥ ३३ ॥ जिस को बल पूर्वक विना विचारे रोकने वालों से युद्ध कर मार पीट के हर लाना यह क्षात्र विवाह है ॥ ३४ ॥ मूल्य ठहरा कर कन्या को खरीद लेना मानुष विवाह कहाता है ॥ ३५ ॥ श्रुति में लिखा है कि तिस से कन्या वाले को रथ सहित सौ धन ( स्वर्ण मुद्रादि ) देवे इस विधि से कन्या का खरीदना जाना जाता है ( परन्तु अन्य रीति से कार्य न होने पर यह निकृष्ट पक्ष है ) ॥ ३६ ॥ और चातुर्मास्ययागों के प्रकरण में यह लिखा है कि " जो पति की खरीदी हुई अन्य पुरुषों से संग करती है ( वह पापिनी नीच है ) " इस से भी उक्त अभिप्राय ही प्रकट होता है ॥ ३७ ॥ अब अन्य श्लोक भी उदाहरण में कहते हैं ॥३८॥ पढ़ी हुई विद्या नष्ट हो जाय तो फिर भी पढ़ना हो सकता है पर नीच स्त्री से जो जाति (वंश) का नाश (नीचता) हो जाय तो सभी नष्ट हुआ जानो । क्यों कि अच्छी नसल रूप कुलीनताके बहाने से घोड़ा भी प्रशंसा के योग्य होता है इस कारण कुलीन स्त्री से विवाह करे ॥३९॥ क्षत्रियादि तीनों वर्ण ब्राह्मण के आधीन रहें ॥४०॥ उन सब को यथाधिकार ब्राह्मण धर्मोपदेश करे ॥ ४१ ॥