अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 693, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३
तं राजाचानुशिष्यात् ॥ ४२ ॥ राजा तु धर्मेणानुशासत् षष्ठमंशं धनस्य हरेत् ॥ ४३ ॥ अन्यत्र ब्राह्मणात् ॥ ४४ ॥ इष्टापूर्तस्य तु षष्ठमंशं भजति-इति ह ब्राह्मणो वेदमार्गं करोति, ब्राह्मणआपदउद्धरति, तस्माद् ब्राह्मणोऽनाद्यः ॥४५॥ सोमोऽस्य राजा भवतीति ह प्रेत्य चाऽऽभ्युदयिकमिति ह विज्ञायते ॥ ४६ ॥
इति श्रीवासिष्ठे धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
चत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः ॥१॥ त्रयो वर्णा द्विजातयो ब्राह्मणक्षत्रियवैश्याः ॥२॥ तेषां मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जीबन्धने ॥३॥ तत्रास्य माता सावित्री पितात्वाचार्यउच्यते ॥४॥ वेदप्रदानात्पितृत्वेनाचार्यमाचक्षत ॥ ५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥६॥ द्वयमुर्वै ह पुरुषस्य रेतो ब्राह्मणस्योर्ध्व-
और ब्राह्मण को अपने धर्म पर चलानेवाला राजा शासक रहे ॥ ४२ ॥ राजा धर्मानुकूल सबकी रक्षा वा शासन करता हुआ धन के लाभ में से छठा२ भाग कर लेवे ॥ ४३ ॥ परन्तु ब्राह्मण से कुछ भी कर न लेवे ॥ ४४ ॥ धर्म सम्बन्धी श्रौत स्मार्त्त ब्राह्मण के किये कराये कर्मों का छठा भाग पुण्य फल राजा को मिलता है । ब्राह्मण वेद को मुख्य मान के ग्रहण करता वा पढ़ाता है तथा आपदाओं से बचाता है जिससे ब्राह्मण का अन्न धनादि राजा न लेवे ॥ ४५॥ वेद में लिखा है कि (सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा) ब्राह्मण का राजा सोम होता है । और मर कर भी ब्राह्मण सुख देनेवाला है यह भी वेद से जाना जाता है ॥ ४६ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में प्रथमाध्याय पूरा हुआ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ये चार वर्ण कहाते हैं ॥१॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ये तीन वर्ण द्विजातिहैं ॥२॥ उनका पहिला जन्म माता से और द्वितीय जन्म उपनयन संस्कार से होता है ॥३॥ उस द्वितीय जन्म में माता सावित्री मन्त्र और आचार्य पिता माना जाता है ॥४॥ वेद के देने से आचार्य को पिता कहते हैं ॥५॥ इस में श्रुति का उदाहरण कहते हैं कि-॥ ६ ॥ "ब्राह्मण पुरुष के शरीर में सन्तानोत्पादन की शक्ति दो प्रकार की है । एक नाभि से ऊपर