भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भावार्थसहिता ॥ ३३

सपातकविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ ४३ ॥ पशुयोनौचगमने मूत्राघातःप्रजायते । तिलपात्रद्वयंचैव दद्यादात्मविशुद्धये ॥ ४४ ॥ अश्वयोनौचगमनाद् भुजस्तम्भःप्रजायते । सहस्रकलशैःस्नानं मासं कुर्याच्छिवस्यच ॥ ४५ ॥ आसुरीअलसीदासी चर्मकारीचनर्त्तकी । रजकीभिःसमंभोगात्पतन्तिपितृभिःसह ॥ ४६ ॥ उपोष्यैकादशींशुद्धां जागरंकारयेन्निशि । तस्यपापविशुद्ध्यर्थं दद्यादेकांपयस्विनीम् ॥ ४७ ॥ एतेदोषानराणांस्युर्नरकान्तेनसंशयः । स्त्रीणामपिभवन्त्येते तत्तत्पुरुषसंगमात् ॥ ४८ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके अगम्यागमन प्रायश्चित्तं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


करे तो मस्तक में प्रायः फोड़ा फुंसी होतेहैं यह उस पातक की शुद्धि के लिये एक प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४३ ॥ पशुजाति के संग मैथुन करने से मूत्राघात रोग होता है । उसकी शुद्धि के लिये तिलों से भरके दो पात्र दान करे ॥ ४४ ॥ घोड़ी के साथ मैथुन करने से भुजा जकड़ने का रोग होता है । इसके लिये एक महिने तक एक हज़ार कलशों से शिवजी को स्नान करावे ॥ ४५ ॥ आसुरी (राक्षसी ) अलसी ( आलसिनी ) दासी, चर्मकारी, नटिनी, वा वेश्या, और धोबिनि इन के साथ संग करने से अपने पितरों के सहित पतित हो जाते हैं ॥ ४६ ॥ इस के लिये जो अन्य तिथि से विद्ध न हो ऐसी शुद्ध एकादशी को उपवास करके रात भर जागरण करे और उस पाप से शुद्ध होने के लिये एक दूध देती गौ का दान करे ॥ ४७ ॥ इस अध्याय में कहे दोष नरक भोग के अन्तमें उन २ पापोंसे पुरुषों के निस्सन्देह होते ही हैं । और जिन २ स्त्रियों के संग से पुरुषों को दोष दिखाए हैं उन्हीं २ के पुरुषों से संग करने वाली स्त्रियों को भी वे २ पाप दोष लगते हैं इस से उन को भी उक्त प्रायश्चित्त ही करना चाहिये ॥ ४८ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में कर्मविपाक सम्बन्धी अगम्यागमन प्रायश्चित्तरूप पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥