अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 678, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ शातातपस्मृतिः ॥
तेनापिनिष्कृतिःकार्या महिषीदानयत्नतः ॥ ३६ ॥
तपस्विनीप्रसंगेन प्रमेहीजायतेनरः ।
मासंरुद्रजपःकार्यो दद्याच्छक्त्याचकाञ्चनम् ॥ ३७ ॥
दीक्षितस्त्रीप्रसंगेन जायतेदुष्टरक्तदृक् ।
सपातकविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यानिषट्चरेत् ॥ ३८ ॥
प्राणनाथंपरित्यज्य देवरंसेवतेध्रुवम् ।
गुदमध्येभवेद्व्याधी रशनावामहदुःसहा ।
तयाकार्यंप्रयत्नेन गोदानंहेमसम्मितम् ॥ ३९ ॥
गोविन्दगोपीजनवल्लभेशः कंसासुरघ्नस्त्रिदशेशवन्द्यः ।
गोदानतृप्तःकुरुतेदयालु रीशाननाथादपितारिवर्गः ॥ ४० ॥
श्रोत्रियस्त्रीप्रसंगेन जायतेनासिकाव्रणी ।
आचरेत्सविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यचतुष्टयम् ॥ ४१ ॥
स्वजातिजायागमने जायतेहृदयव्रणी ।
तत्पापस्यविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥ ४२ ॥
धातृउत्तरस्त्रीगमनाज्जायतेमस्तकव्रणः ।
वह भैंसियों के यथाशक्ति दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥३६॥ तपस्विनी स्त्री के साथ संगकरे तो प्रमेह रोग युक्तहोता है वह एक मास तक रुद्री का पाठ दशांश होम और यथाशक्ति सुवर्ण का दान करे ॥३७॥ दीक्षित पुरुष की स्त्री से संग करे तो रक्तविकार रोगयुक्त होता है वह छः प्राजापत्य व्रत प्रायश्चित्त करे ॥३८॥ जो स्त्री अपने पति को छोड़के देवर से संग करती है उसके गुदेन्द्रिय में रोग होता और असह्यपीड़ा होती है वह स्त्री बड़े यत्न से सुवर्ण सहित गोदान वार२ करे ॥३९॥ गोविन्द गोपीजनों के प्रियस्वामी कंसासुर के हन्ता, देवताओं के स्वामी इन्द्र के भी पूजनीय, ईशान दिशा के स्वामी महादेव जी से भी विशेषकर जिनका वर्ग तारनेवाला है ऐसे कृष्ण भगवान् गोदान से तृप्त हुए प्रायश्चित्ती पर दयाकरते हैं ॥ ४० ॥ वेदपाठी की स्त्री के साथ संग करे तो प्रायः नासिका में फोड़ा फुंसी होते हैं । वह अपनी शुद्धि के लिये चार प्राजापत्य व्रत करे ॥४१॥ अपने वर्ण की स्त्री से संग करे तो हृदय में प्रायः फोड़ा फुंसी होते हैं । उस पाप की शुद्धि के लिये दो प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४२ ॥ धायी के साथ संग