अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 677, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाऽर्थसहिता ॥ ३१
तिलद्रोणशतंचैव हिरण्येनसमन्वितम् ॥ २९ ॥
पितृष्वस्रभिगमनाद्दक्षिणांशव्रणीभवेत् ।
तेनापिनिष्कृतिःकार्या अजादानेनशक्तितः ॥ ३० ॥
मातुलान्यांतुगमने पृष्ठकुब्जःप्रजायते ।
कृष्णाजिनप्रदानेन प्रायश्चित्तंसमाचरेत् ॥ ३१ ॥
मातृष्वस्रभिगमने वामाङ्गे व्रणवान्भवेत् ।
तेनापिनिष्कृतिःकार्या सम्यग्दासीप्रदानतः ॥ ३२ ॥
पितृव्यपत्नीगमनात्कटिकुष्ठंप्रजायते ।
निष्कृतिस्तेनकर्त्तव्या कन्यादानेनयत्नतः ॥ ३३ ॥
यदगम्यासुसंयोगात्प्रायश्चित्तमुदीरितम् ।
तदेवमुनिभिःप्रोक्तं नियतंतत्सुतास्वपि ॥ ३४ ॥
मृतभार्याभिगमने मृतभार्यःप्रजायते ।
तत्पातकविशुद्ध्यर्थं द्विजमेकंविवाहयेत् ॥ ३५ ॥
सगोत्रस्त्रीप्रसंगेन जायतेचभगन्दरः ।
देवे और सुवर्ण के सहित २५ मन तिलों का दान करे ॥ २९ ॥ फूपी ( बुआ ) के साथ गमन करे तो शरीर के दहिने भाग में फोड़े फुंसी होते हैं । वह य-थाशक्ति बकरियों के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥३०॥ मामी के साथ गमन करे तो कुबड़ी पीठवाला होता वह कृष्ण मृगचर्मों के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे॥३१॥ मौसी के साथ गमन करे तो शरीर के वामभाग में फोड़ा फुंसीयुक्त होता है वह दासी के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥ ३२ ॥ चाची के साथ गमन करे तो कटि भाग में कुष्ठरोगयुक्त होता है वह कन्याओं के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥ ३३ ॥ जिन२ अगम्यास्त्रियोंके साथ संग करने से जो२ प्रायश्चित्त कहा गया है। उन२ स्त्रियों की पुत्रियोंके साथ गमन करने पर भी ऋषियों ने वही २ प्रायश्चित्त कहा है ॥३४॥ मृत पुरुष की स्त्री के साथ गमन करे तो जन्मान्तर में उसकी भी पत्नी मर जा-या करती है । उस पाप की शुद्धि के लिये एक ब्राह्मण का विवाह करावे ॥३५॥ अपने गोत्र की स्त्री से गमन करे तो जन्मान्तर में भगन्दर रोग होता है ।