भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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३० शातातपस्मृतिः ॥

दशांशहोमः सर्वत्र घृताक्तैः क्रियते तिलैः ॥ २३ ॥ स्वाम्यङ्गनाभिगमनाज्जायते दद्रुमण्डलम् । कृत्वा लोहमयीं धेनुं पलषष्टिप्रमाणतः ॥ २४ ॥ कार्पासभाण्डसंयुक्तां कांस्यदोहां सवत्सिकाम् । दद्याद्विप्राय विधिवदिमं मन्त्रमुदीरयेत् । सुरभिर्वैष्णवी माता मम पापं व्यपोहतु ॥ २५ ॥ विश्वस्तभार्यागमने गजचर्मा प्रजायते । तस्य पापविनाशाय प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ २६ ॥ कृत्वारौप्यमयीं धेनुं निष्कृतिं विश्वसंख्यया । तस्य पापस्य नाशाय छत्रोपानहसंयुताम् ॥ २७ ॥ मातुः सपत्निगमने जायते चाश्मरीगदः । स तु पापविशुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ २८ ॥ दद्याद्विप्राय विदुषे मधुधेनुं यथोदितम् ।


के लिये पूर्व कहे पुत्री गमन के प्रायश्चित्त से आधा करना चाहिये और सभी जप पाठों में घृत मिले तिलों से दशांश होम तो करना ही चाहिये ॥ २३ ॥ स्वामी (मालिक) की स्त्री से सेवक गमन करे तो जन्मान्तर में मण्डलाकार (दखन्दावाली) दाद होती है । वह तीन सेर लोहे की गौ बनवाके, बिनौले, बसन, कांसे की दोहनी और बछड़े सहित गौ (सुरभि०) मन्त्रोच्चारण पूर्वक विधि के साथ ब्राह्मण को दान देवे कि विष्णु देवता सम्बन्धिनी सुरभि गौ माता मेरे पाप को नष्ट करे ॥ २४।२५ ॥ अपना विश्वास रखनेवाले की पत्नी से गमन करे तो अन्मान्तर में हाथी के से चर्मवाला होता है । उस पाप का प्रायश्चित्त यह है कि ॥ २६ ॥ नौ तोला चांदी की प्रायश्चित्त रूप गौ बनाकर उस पाप के नाशार्थ छाता और जूता सहित दान करे ॥ २७ ॥ अपनी सौतेली माता से गमन करे तो जन्मान्तर में मूंगारोग होता है । वह पुरुष उसका निम्न प्रायश्चित्त करे ॥ २८ ॥ विद्वान् ब्राह्मण को शहद की गौ शास्त्रविध्यनुकूल दान