अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 675, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाऽर्थसहिता ॥ २५
पीतवस्त्रसमाच्छन्नं पीतमाल्यविभूषितम् ॥ १६ ॥ तस्योपरिन्यसेत्स्वर्ण पात्रेदेवंसुरेश्वरम् । सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितंवज्रधारिणम् ॥ १७ ॥ यजेत्पुरुषसूक्तेन वासवंविश्वरूपिणम् । यजुर्वेदंतत्रसाम ऋग्वेदंचसमापयेत् ॥ १८ ॥ सुवर्णपुत्तिकांकृत्वा सुवर्णदशकेनतु । दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ १९ ॥ देवानांमधिपोदेवो वज्रीकुलिशकेतनः । शतयज्ञःसहस्राक्षः पापंममनिकृन्ततु ॥ २० ॥ इमंमन्त्रंसमुच्चार्य्य आचार्याय्ययथाविधि । दद्याद्देवंसहस्राक्षं स्वपापस्यापनुत्तये ॥ २१ ॥ भ्रातृभार्याभिगमनाद् गलत्कुष्ठंप्रजायते । स्ववधूगमनेचैव कृष्णकुष्ठंप्रजायते ॥ २२ ॥ तेनकार्य्यविशुद्ध्यर्थं प्रागुक्तस्यार्द्धमेवहि ।
पीले वस्त्र और पीली फूल मालाओं से भूषित एक कलश पूजन स्थान के पूर्वभाग में स्थापित करे ॥१६॥ उस कलश के ऊपर सुवर्ण के पात्र में २४ तोला सुवर्ण से बनायी वज्रधारी इन्द्र देवता की प्रतिमा को स्थापित करे ॥१७॥ फिर विश्वरूपी इन्द्रदेव का पुरुष सूक्त से पूजन करे, साथ ही उस २ वेद के ज्ञाता ब्राह्मण लोग वहां ऋग्, यजुः-सामवेद का पाठ करें ॥ १८ ॥ और दश तोला सुवर्ण की एक प्रतिमा इन्द्रदेवता की बनाके 'मैं निष्पाप होऊं' ऐसा कहता हुआ वह प्रतिमा सम्यक् पूजन करके निम्न प्रकार ब्राह्मण गुरु को देवे ॥ १९ ॥ देवों के स्वामी, सौ यज्ञ करने वाले, सहस्रों चक्षु वाले, वज्र चिन्ह युक्त वज्रधारी इन्द्रदेव मेरे पाप को नष्ट करें ॥ २० ॥ अपने पाप के नाशार्थ इस मन्त्र का उच्चारण करके इन्द्रदेव की प्रतिमा विधि पूर्वक आचार्य को देवे ॥२१॥ भाई की पत्नी से गमन करे तो गलत्कुष्ठ और पुत्र वधू से गमन करे तो जन्मान्तर में काला कुष्ठ प्रकट होता है ॥ २२ ॥ उस को अपनी शुद्धि-
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