भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३८ शातातपस्मृतिः ॥

ग्रहशान्तिकपूर्वकं च दशांशंजुहुयात्तिलैः ।
अज्ञातनामगोत्राय प्रेतायसतिलोदकम् ॥
प्रदद्यात्पितृतीर्थेन पिण्डंमन्त्रमुदीरयेत् ॥ २७ ॥
इमंतिलमयं पिण्डं मधुसर्पिःसमन्वितम् ।
ददामितस्मैप्रेताय यःपीडांकुरुतेमम ॥ २८ ॥
सजलांकृष्णकलशांस्तिलपात्रसमन्वितान् ।
द्वादशप्रेतमुद्दिश्य दद्यादेकंचविष्णवे ॥ २९ ॥
ततोऽभिषिञ्चेदाचार्यो दम्पतीकलशोदकैः ॥
शुचिर्वरायुधधरो मन्त्रैर्वरुणदैवतैः ॥ ३० ॥
यजमानस्ततोदद्यादाचार्यायसदक्षिणाम् ।
ततोनारायणबलिः कर्त्तव्यःशास्त्रनिश्चयात् ॥ ३१ ॥
एषसाधारणविधिर्गतीनामुदाहृतः ।
विशेषस्तुपुनर्ज्ञेयो व्याघ्रादिनिहतेष्वपि ॥ ३२ ॥
व्याघ्रेणनिहतेप्रेते परकन्यांविवाहयेत् ।


फिर ग्रहशान्ति पूर्वक घी मिले तिलों से दशांश होम करे और तिलों तथा जल के सहित पूर्वोक्त तिलों के पिण्ड को (इमंतिल०) मन्त्र पढ़कर अपसव्य हो दक्षिण को मुखकर अज्ञात नाम गोत्र वाले मृतपुरुष के नाम से पितृतीर्थ-द्वारा छोड़े ॥ २७ ॥ शहद और घी से युक्त तिल स्वरूप इस पिण्ड को मैं उस प्रेत के लिये देता हूं कि जो मुझ को पीडित करता है ॥ २८ ॥ जिन पर तिलों से भरा एक २ पात्र रक्खा हो ऐसे जल से भरे काले रंगेहुए बारह कलश प्रेत के उद्देश से दान करे । और एक कलश विष्णु के नाम से दान करे ॥ २९ ॥ तदनन्तर अच्छा शस्त्र धारण किये या स्फ्य को हाथ में लिये पवित्र हुआ आचार्य्य पुरुष यजमान स्त्री पुरुषों का कलश के जल से वरुणदेवतावाले मन्त्रों द्वारा अभिषेक करे ॥ ३० ॥ फिर यजमान दक्षिणा सहित वह प्रतिमा आचार्य्य को दे देवे । तदनन्तर शास्त्र के निश्चय से नारायणबलि करे ॥ ३१ ॥ यह अच्छी गति न होने वाले अपमृत्यु से मरों के लिये साधारण विधान कहा गया है । अब व्याघ्रादि से मरे हुओं के विषय में भिन्न २ विशेष विधान दिखाते हैं ॥३२॥ व्याघ्र से मरे प्रेत के निमित्त अन्य किसी की कन्या का विवाह

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