अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 683, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषासंसहिता ॥ ६३
कारयेन्निष्कमात्रंतु पुरुषंप्रेतरूपिणम् ॥ २० ॥ चतुर्भुजंदण्डहस्तं महिषासनसंस्थितम् । पिष्टैःकृष्णतिलैःकुर्यात्पिण्डंप्रस्थप्रमाणतः ॥ २१ ॥ मध्वाज्यशर्करायुक्तं स्वर्णकुण्डलसंयुतम् । अकालमूलंकलशं पञ्चपल्लवसंयुतम् ॥ २२ ॥ कृष्णवस्त्रसमाच्छन्नं सर्वौषधिसमन्वितम् । तस्योपरिन्यसेद्देवं पात्रंधान्यफलैर्युतम् ॥ २३ ॥ सप्तधान्यन्तु सफलं तत्रतत्संमुखंन्यसेत् । कुम्भोपरिचांवेन्यस्य पूजयेत्प्रेतरूपिणम् ॥ २४ ॥ कुर्यात्पुरुषसूक्तेन प्रत्यहंदुग्धतर्पणम् । षडङ्गांश्चजपेद्रुद्रान् कलशेऽत्रवेदवित् ॥ २५ ॥ यमसूक्तेनकुर्वीत यमपूजादिकंतथा । गायत्र्याश्चैवकर्त्तव्यो जपःस्वात्मविशुद्धये ॥ २६ ॥
संक्षिप्त क्रम से ही कहते हैं कि घोड़े आदि अपमृत्यु से मरने पर प्रेतरूपी यम देव की चार तोला सुवर्ण की एक प्रतिमा बनावे उसमें चार भुजाहों हाथ में दण्ड हो, भैंसे पर सवार हो । फिर काले तिलों को पीस कर ढाईपाव का एक पिण्ड बनावै ॥ २१ ॥ उस पिण्ड में शहद घी और शक्कर भी मिली हो, सुवर्ण के कुण्डल भी उस पिण्ड पर घरे। जो तल में काला न हो ऐसे एक कलश को स्थापित करके उस पर पांच पल्लव (पत्ते) घरे ॥ २२ ॥ काले वस्त्र से उस कलश को ढांप कर सर्वौषध (मख जौ आदि) उस पर घरे। और जो चांवलादि धान्य तथा फलों से भरके एक पात्र कलश के ऊपर धरके उस पर ऊपर लिखी यम देवता की मूर्ति को स्थापित करे ॥ २३ ॥ और ऋतु फलों सहित सात धान्य (सतनजा) वहां देवमूर्ति के सामने धरै। इस प्रकार कलश पर स्थापित किये प्रेतरूपी यमराज का निम्न रीति से पूजन करे ॥ २४ ॥ अपसव्य होके पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा दूध से प्रतिदिन यमराज का तर्पण करे अर्थात् मूर्ति पर प्रत्येक मन्त्रान्त में दूध चढ़ाया करे और इस के साथ ही एक वेदपाठी ब्राह्मण कलश के समीप में षडङ्ग रुद्री का पाठ कियाकरे ॥ २५ ॥ और वेदोक्त यमसूक्त से यमराज का नित्य पूजन करे और अपनी शुद्धि के लिये वहां कलश के समीप में गायत्री का जप भी करता कराता रहे ॥ २६ ॥
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