भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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श्रीगणेशायनमः ॥

अथवासिष्ठस्मृतिप्रारम्भः॥

अथातः पुरुषनिःश्रेयसार्थं धर्मजिज्ञासा ॥ १ ॥ ज्ञात्वा चानुतिष्ठन्धार्मिकः प्रशस्यतमो भवति लोके प्रेत्य च स्वर्गं लोकं समश्नुते ॥२॥ श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः ॥३॥ तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम् ॥ ४ ॥ शिष्टः पुनरकामात्मा ॥५॥ अगृह्यमाणकारणो धर्मः ॥६॥ आर्यावर्त्तः प्रागादर्शात्प्रत्यक्कालकवनादुदक्पारियात्राद् दक्षिणेन हिमवत उत्तरेण विन्ध्यस्य ॥७॥ तस्मिन्देशे ये धर्मा येचाचारास्ते सर्वे प्रत्येतव्याः ॥८॥ नत्वन्ये प्रतिलोमकल्पधर्म्माणः ॥६॥ एतदार्यावर्त्तमित्याचक्षते ॥१०॥ गङ्गायमुनयोरन्तरेऽप्येके ॥ ११ ॥ यावद्वा कृष्ण-


अब वसिष्ठस्मृति का प्रारम्भ किया जाता है ॥ सुखाभिलाषी होने से मनुष्य के कल्याणार्थ धर्म को जानने की इच्छा करनी चाहिये ॥ १ ॥ धर्मको जानकर सेवन करता हुआ मनुष्य लोक में प्रामाणिक धर्मात्मा कहाता हुआ अत्यन्त प्रशंसा के योग्य होता और जन्मान्तर में स्वर्ग का सुख भोगता है ॥२॥ श्रुति (वेद) तथा स्मृति (धर्मशास्त्र) में विधान किया कर्त्तव्य-धर्म कहाता है ॥३॥ जिसका प्रमाण श्रुति स्मृति में न हो उसके लिये शिष्ट लोगों का आचार ही प्रमाण है ॥४॥ निःस्पृह निर्लोभ निष्काम पुरुष शिष्ट कहाते हैं ॥५॥ जो काम लोभादिकारणके विना ही किया जाय वही धर्म है ॥६॥ आदर्श से पूर्व' कालक बन से पश्चिम, पारियात्रसे उत्तर, हिमालय से दक्षिण और विन्ध्याचल से उत्तर में जो देश है वह आर्यावर्त्त कहाता है ॥७॥ उस आर्यावर्त्त देश में जो २ धर्म और आचार हैं वे सब प्रतीति (विश्वास करने) योग्य हैं ॥ ८ ॥ अन्य प्रान्तीय धर्म प्रतिलोम उलटी कल्पना से युक्त होने से विश्वास के योग्य नहीं हैं ॥६॥ इस देश को (आर्यावर्त्तम्) एसा कहते हैं ॥१०॥ कोई आचार्य गंगा यमुना के बीच को आर्यावर्त्त कहते हैं ॥११॥ और कोई आचार्य कहते