भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 703, कुल 805 में से

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भाषार्थसहिता ॥ १५

त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णवांश्चतुर्मेधा वाजसनेयी षडङ्गविद्ब्रह्मदेयानुसंतानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगो मन्त्रब्राह्मणविद्यः स्वधर्मानधीते यस्य दशपुरुषं मातृपितृवंशः श्रोत्रियो विज्ञायते विद्वांसः स्नातकाश्चैते पङ्क्तिपावना भवन्ति२२ चातुर्विद्योविकल्पीच अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयोमुख्याः परिषत्स्याद्दशावरा ॥ २३ ॥ उपनीय तु यः कृत्स्नं वेदमध्यापयेत्सआचार्यः ॥ २४ ॥ यस्त्वेकदेशं स उपाध्यायो यश्च वेदाङ्गानि ॥२५॥ आत्मत्राणे वर्णसंकरे वा ब्राह्मणवैश्यौ शस्त्रमाददीयाताम् ॥२६॥ क्षत्रियस्य


यजुर्वेद को पढ़ने जानने और उस के नियम व्रतों को करने वाला त्रिणाचिकेत, पञ्चाग्नि-श्रौतस्मार्त्त अग्निहोत्र करने वाला, ऋग्वेद के होतृ कर्म को पढ़ने जानने और तदुक्त नियम व्रतों को करने वाला-त्रिसुपर्णवान्, चारो वेद में जिस की बुद्धि चलती हो, वाजसनेयी संहिता को पढ़ने जानने वाला, वेद के छः अङ्गों का विद्वान्, ब्राह्म विवाह से उत्पन्न, सामवेदी, सामवेद के आरण्यक भाग का विद्वान्-ज्येष्ठसामग, मन्त्र ब्राह्मण दोनों वेदभागों का ज्ञाता, जो अपने वर्ण तथा आश्रम के धर्मों को विशेष कर पढ़ता जानता हो, जिस के माता पिता के वंश में दश पीढ़ी से वेद के पढ़ने की परम्परा चली आयी हो, ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थ बने विद्वान्, ये त्रिणाचिकेतादि ब्राह्मण पङ्क्तिपावन कहाते हैं (जिस पांति में बैठते हैं उसे पवित्र कर देते हैं) ॥ २२ ॥ चारो वेद के पढ़ने जानने वाले चार विद्वान्, नैयायिक, वेदाङ्गों का पढ़ने जानने वाला, मीमांसा वा धर्मशास्त्रों का पढ़ने जानने वाला, अपने २ आश्रम के धर्म को यथावत् सेवन करने वाले ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, ये तीनों मुख्याश्रमी इन दश पुरुषों की दशावरा धर्मसभा कहाती है ॥२३॥ जो यज्ञोपवीत संस्कार करा के पूर्ण वेद को पढ़ावे वह आचार्य कहाता है ॥२४॥ जो वेद के किसी भाग को और व्याकरणादि अङ्गों को पढ़ावे वह उपाध्याय कहाता है ॥ २५ ॥ अपनी रक्षा के लिये वा जब राजादि के अत्याचार से वर्णसंकरता का प्रचार बढ़ता हो तो ऐसे अवसरों में ब्राह्मण तथा वैश्यों को हथियार हाथ में लेना चाहिये ॥ २६ ॥ और प्रजा की रक्षा का भार

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