अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 707, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ १९
चतुर्भिःशुध्यतेभूमिः पञ्चमाच्चोपलेपनात् । इति ॥५३॥
रजसाशुध्यतेनारी नदीवेगेनशुध्यति ।
भस्मनाशुध्यतेकांस्यं ताम्रमम्लेनशुध्यति ॥ ५४ ॥
मद्यैर्मूत्रैःपुरीषैर्वा श्लेष्मपूयाश्रुशोणितैः ।
संस्पृष्टंनैवशुध्येत पुनःपाकेनमृन्मयम् ॥ ५५ ॥
अद्भिर्गात्राणिशुध्यन्ति मनःसत्येनशुध्यति ।
विद्यातपोभ्यांभूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेनशुध्यति ॥ ५६ ॥
अद्भिरेव काञ्चनं पूयते तथा रजतम् ॥ ५७ ॥ अङ्गुलिक-
निष्ठिकामूले दैवं तीर्थम् ॥५८॥ अङ्गुल्यग्रे मानुषम् ॥ ५९ ॥
पाणिमध्यआग्नेयम् ॥ ६० ॥ प्रदेशिन्यङ्गुष्ठयोरन्तरा पित्र्य-
म् ॥ ६१ ॥ रोचन्तइति सायं प्रातरग्नीनभिपूजयेत् ॥ ६२ ॥ स्व-
दितमिति पित्र्येषु ॥ ६३ ॥ संपन्नमित्याभ्युदयिकेषु ॥ ६४ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अशुद्ध हुई भूमि शुद्ध होजाती है ॥ ५३ ॥ रजोधर्म होजाने पर स्त्री, प्रवाह के वेग से नदी, भस्म से मांजने पर कांसे के पात्र, और खटाई से तांबे के पात्र शुद्ध होजाते हैं ॥५४॥ मद्य, मल, मूत्र, थूक, पीव, और रुधिर ये सब वा कोई जिसमें रक्खे गये हों ऐसा मिट्टी का पात्र फिर से अग्नि में पकाने से भी शुद्ध नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥ शरीर के हाथ पांव आदि अङ्ग जल से, सत्यभाषण करने से मन, विद्याभ्यास और तप करने से सूक्ष्म शरीर वा जीवात्मा और तत्त्वज्ञान होने से बुद्धि शुद्ध होती है ॥ ५६ ॥ सुवर्ण और चांदी के पात्रादि केवल जल से धोने पर शुद्ध होजाते हैं ॥ ५७ ॥ छोटी अंगुलि के मूल में दैव-तीर्थ कहाता है ॥ ५८ ॥ अंगुलियों के अग्र भाग में मनुष्य तीर्थ है ॥ ५९ ॥ हथेली के बीच में आग्नेय तीर्थ है ॥ ६० ॥ प्रदेशिनी और अंगूठा के बीच में पितरों को जल देने का तीर्थ है ॥ ६१ ॥ ( रोचन्ते ) ऐसा कहकर सायं प्रातः काल गार्हपत्यादि अग्नियों का पूजन करे ॥ ६२ ॥ श्राद्धादि पितृ सम्बन्धी कामों में भोजन किये ब्राह्मणों से ( स्वदितम् ) ऐसा कहे ॥ ६३ ॥ आभ्युदयिक विवाहादि कामों में ( संपन्नम् ) ऐसा कहे ॥ ६४ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
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