अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 708, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२० वसिष्ठस्मृतिः ॥
प्रकृतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्यं संस्कारविशेषाच्च ॥ १ ॥ ब्राह्मणोऽस्यमुखमासीद्वाहूराजन्यःकृतः । ऊरूतदस्ययद्वैश्यः पद्भ्यांशूद्रोऽजायत, इति निगमो भवति ॥ २ ॥ गायत्र्या छन्दसा ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यं न केनचिच्छन्दसा शूद्रमित्यसंस्कार्यो विज्ञायते ॥ ३ ॥ सर्वेषां सत्यमक्रोधो दानमहिंसा प्रजननं च ॥ ४ ॥ (पितृदेवतातिथिपूजायां पशुं हिंस्यात् ॥ ५ ॥ मधुपर्के च यज्ञे च पितृदैवतकर्मणि । अत्रैव च पशुं हिंस्यान्नान्यथेत्यब्रवीन्मनुः ॥ ६ ॥ नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् ।
स्वभाव से नाम जन्म से और गर्भाधानादि संस्कार विशेष से चारो वर्ण ब्राह्मणादि माने जाते हैं ॥ १ ॥ इस विराट् पुरुष के मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पगों से शूद्र उत्पन्न हुआ इस वेद के प्रमाण से उत्पत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण सिद्ध हैं ॥ २ ॥ गायत्री सावित्री के साथ मुख से ब्राह्मण को, त्रिष्टुप् सावित्री के साथ भुजा से क्षत्रिय को, जगती सावित्री के साथ जंघा से वैश्य को और किसी छन्द के बिना ही पगों से शूद्र को विराट् पुरुष ने उत्पन्न किया इस से शूद्र संस्कार के योग्य नहीं है। और यह भी श्रुति से सिद्ध है कि ब्राह्मणादि का वह २ पृथक् २ स्वभाव सिद्ध भिन्न २ गुरु मन्त्र होना चाहिये ॥ ३ ॥ सत्यभाषण, क्रोध का त्याग, दान देना, हिंसा न करना और किसी को दुःख न देना तथा विवाह करके सन्तानों को उत्पन्न करना ये सत्यभाषणादि चारो वर्ण के सामान्य धर्म हैं ॥ ४ ॥ पितर देवता और अतिथियों की पूजा में शास्त्रोक्त विधि से पशु हिंसा करे (परन्तु यह कलियुग में लोक विक्रुष्टादि दोषहोने से वर्जित है) ॥ ५ ॥ मधुपर्क, यज्ञ, (अग्निष्टोमादि) अष्टका श्राद्धादि पितृ कर्म, और देव कर्म इन्हीं में पशु की हिंसा करे यह मनु जी ने कहा है ॥ ६ ॥ प्राणियों की हिंसा किये बिना कहीं भी मांस प्राप्त नहीं हो सकता और प्राणियों का वध