अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 709, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थंसंहिता ॥ २१
नचप्राणिवधःस्वर्ग्यस्तस्माद्यागेवधोऽवधः ॥ ७ ॥
अथापि ब्राह्मणाय वा राजन्याय वाऽभ्यागताय वा महोक्षं वा महाजं वा पचेदेवमस्यातिथ्यं कुर्वन्तीति ॥ ८ ॥
उदकक्रियामशौचं च द्विवर्षात्प्रभृति मृत उभयं कुर्यात् ॥९॥
दन्तजननादित्येके ॥ १० ॥ शरीरमग्निना संयोज्याऽनवेक्षमाणा अपोऽभ्यवयन्ति ॥ ११ ॥ सव्योत्तराभ्यां पाणिभ्यामुदकक्रियां कुर्वन्ति ॥ १२ ॥ अयुग्मा दक्षिणामुखाः ॥ १३ ॥ पितॄणां वा एषा दिग् या दक्षिणा ॥ १४ ॥ गृहान्व्रजित्वा स्वस्तरे त्र्यहमनश्नन्त आसीरन् ॥१५॥ अशक्तौ क्रीतोत्पन्नेन वर्तेरन्, दशाहं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ॥ १६ ॥ मरणात्प्र-
करना दुःख का हेतु है। इस से यज्ञ में पशुओं का वध करना हिंसा नहीं है। और अन्यत्र जहां हिंसा अवश्य है वहां न मारे ॥७॥ और भी श्रुति में लिखा है कि आये हुए ब्राह्मण, वा क्षत्रिय-राजा, वा अतिथि के लिये बड़े बैल, वा बड़े बकरा को पकावे, ऐसे ही इस ब्राह्मणादि का अतिथि सत्कार करते हैं ॥८॥ दो वर्ष से ऊपर आयु वाले बालक के मरने पर अशुद्धि मानना और तिलांजलि देना दोनों काम करें ॥ ९ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि दांत निकलने बाद बालक के मरनेपर शुद्धि माने और तिलांजलि करे ॥ १० ॥ अन्त्येष्टि के समय चिता पर मुर्दा शरीर में अग्नि लगाकर पीछे को न देखते हुए लौटकर जलाशय में स्नान करें ॥ ११ ॥ बायां हाथ दहिने के ऊपर लगा के एक अंजुली जल सूतककेनाम सेजलाशय के तटपर अपसव्य होकर छोड़ें ॥१२॥ जल देते समय एक धोती मात्र वस्त्र हो अंगोछा कन्धे पर न हो और दक्षिण को मुख कर के जल देवें ॥ १३ ॥ यह दक्षिण दिशा पितरों की है ॥ १४ ॥ फिर घर पर जाकर चटाई वा पलाल के बिछौना पर दिन तथा रात में तीन दिन रात कुछ न खाते हुये बैठें किन्तु खटिया पर न बैठें न लेटें ॥१५॥ भोजन किये बिना न रह सकें तो किसी से मूल्यद्वारा खरीदकर खायें स्वयं घर का कोई न पकावे। सात पीढ़ी के मनुष्यों को दश दिन तक सूतक की अशुद्धि माननी कही है ॥ १६ ॥ मरने के समय से लेकर दिनों की गणना करें अर्थात् थोड़ी