भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाधर्मसंहिता ॥ २७

दुराचारोहिपुरुषो लोकेभवतिनिन्दितः । दुःखभागीचसततं व्याधितोऽल्पायुरेवच ॥ ६ ॥

आचाराल्लभतेधर्ममाचाराल्लभतेधनम् । आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारोहन्त्यलक्षणम् ॥ ७ ॥

सर्वलक्षणहीनोऽपि यःसदाचारवान्नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणिजीवति ॥ ८ ॥

आहारनिर्हारविहारयोगाः सुसंवृताधर्मविदातुकार्याः । वाग्बुद्धिकार्याणितपस्तथैव धनायुषीगुप्तमेततुकार्यै ॥६॥

उभेमूत्रपुरीषेतु दिवाकुर्यादुदङ्मुखः । रात्रौकुर्याद्दक्षिणास्य एवंह्यायुर्नहीयते ॥ १० ॥

प्रत्यग्निंप्रतिसूर्यंच प्रतिगांप्रतिचद्विजम् । प्रतिसोमोदकंसंध्यां प्रज्ञानश्यतिमेहतः ॥ ११ ॥

ननद्यांमेहनंकार्यं नभस्मनि्नगोमये । नवाकृष्टेन्ममार्गेच नोप्तेक्षेत्रेनशाद्वले ॥ १२ ॥


रोगी और अल्पायवस्थावाला होता है ॥ ६ ॥ शुद्ध आचरण होने से धर्म, धन, लक्ष्मी शोभा प्रतिष्ठा सब प्राप्त होती और आचार अलक्षण का नाश कर देता है ॥ ७ ॥ सब सुरूप आदि लक्षणों से हीन होने पर भी जो पुरुष सदाचारी श्रद्धालु और किसी की निन्दा करने वाला नहीं, वह सौ वर्ष जीवित रहता है ॥ ८ ॥ भोजन खाना-पीना-चलना फिरना मिलना इत्यादि काम धर्मज्ञ पुरुष को मध्यम कोटि के नियम बद्ध करने चाहिये। वाणी तथा बुद्धि के काम, तप, धन, और आयु इन सब को गुप्त सुरक्षित रक्खे ॥ ९ मल मूत्र का त्याग दिन में उत्तर को मुख करके और रात्रि में दक्षिण को मुख करके करे ऐसा करने से आयु क्षीण नहीं होता ॥ १० ॥ अग्नि, सूर्य, गौ, ब्राह्मण, चन्द्रमा, जलाशय, सन्ध्या, इन सबके सामने मुख करके प्रस्त्राव (पेशाब) करनेवाले की बुद्धि नष्ट होजाती है ॥ ११ नदी, भस्म, गोबर, जोते हुए खेत, मार्ग, बोये खेत और जमी हुई घास इन नदी आदि में प्रस्त्राव (पेशाब)न करे ॥१२॥