अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
कुलंचाश्रोत्रियंयेषां सर्वेतेशूद्रधर्म्मिणः । इति ॥१६॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे पञ्चमोध्यायः ॥ ५ ॥
आचारःपरमोधर्मः सर्वेषामितिनिश्चयः ।
हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्यचेहचनश्यति ॥ १ ॥
नैनंतपांसिनब्रह्म नाग्निहोत्रंनदक्षिणाः ।
हीनाचारमितोभ्रष्टं तारयन्तिकथंचन ॥ २ ॥
आचारहीनंनपुनन्तिवेदा यद्यप्यधीताःसहषड्भिरङ्गैः ।
छन्दांस्येनंमृत्युकालेत्यजन्ति नीडंशकुन्ताइवजातपक्षाः ॥३॥
आचारहीनस्यतुब्राह्मणस्य वेदाःषडङ्गास्त्वखिलाःसयज्ञाः ।
कांप्रीतिमुत्पादयितुंसमर्था अन्धस्यदाराइवदर्शनीयाः ॥४॥
नैनंछन्दांसिवृजिनात्तारयन्ति मायाविनंमाययावर्त्तमानम्।
द्वेऽप्यक्षरेसम्यगधीयमाने पुनाति तद्ब्रह्मयथावदिष्टम् ॥५॥
मारी कन्या ऋतुमती होती हो, जिसने अग्निहोत्र नहीं लिया, और जिनके कुलमें कोई श्रोत्रिय न हो वे सब शूद्रधर्मी ब्राह्मण कहे वा मानेजाते हैं ॥१६॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
सब वर्गों के लिये आचार ही परमोत्तम धर्म है यह निश्चय जानो । जिसका अन्तःकरण निकृष्ट आचार से युक्त है वह इस लोक परलोक दोनों में नष्ट होता है ॥ १ ॥ तप करना, वेद पढ़ना, अग्निहोत्र लेना और दान दक्षिणा देना इत्यादि काम धर्म से भ्रष्ट आचार से हीन पुरुष को कदापि दुःख सागर से पार नहीं करते ॥ २ ॥ यदि कही वेदाङ्गों के सहित वेदों को पढ़ा हो तो भी वे वेद आचारहीन पुरुष को पवित्र नहीं करते । पढ़े हुए वेद मृत्यु के समय इसको ऐसे ही त्याग देते हैं कि जैसे पंख निकल आने पर पक्षियों के बच्चे घोंसलों को छोड़के उड़जाते हैं॥३॥ आचार हीन ब्राह्मण को पढ़े जाने हुए कही वेदाङ्ग, और यज्ञ विधि सहित जानेहुए चारों वेद क्या प्रीति वा प्रसन्नता कर सकते हैं ? अर्थात् कुछ नहीं । जैसे अन्धे को अपनी रूपवती पत्नी के रूप से कुछ भी प्रसन्नता वा आनन्द नहीं होता वैसे ही आचार हीन को वेदों से कुछ सुख नहीं मिलता ॥ ४ ॥ छल कपट के साथ बर्ताव करनेवाले मायावी पुरुष को पढ़े हुए वेद पाप से पार नहीं करते । परन्तु शुद्धाचारी पुरुष वेद के दो अक्षर भी सम्यक् श्रद्धा तथा शुद्धि से पढ़े तो वही उसको पवित्र कर देते हैं ॥ ५ ॥ दुराचारी पुरुषलोक में निन्दित, निरन्तर दुःखी'