अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 713, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसंहिता ॥ २५
अस्यै मे ब्रह्महत्यायै तृतीयं भागंगृह्णीतेति गत्वैवमुवाच,ता अब्रुवन्, किन्नोऽभूदिति, सोऽब्रवीद्वरं वृणीध्वमिति, ता अब्रु- वन्नृतौ प्रजां विन्दामहाइति,काममाविजानितोः संभवामइति (यथेच्छयाऽऽप्रसवकालात्पुरुषेण सह मैथुनभावेन संभवामइति) एषोऽस्माकं वरस्तथेन्द्रेणोक्तास्ताः प्रतिजगृहुस्तृतीयं भ्रूणह- त्यायाः ॥ ८ ॥ सैषा भ्रूणहत्या मासिमास्याविर्भवति ॥ ९ ॥ तस्माद्रजस्वलान्नं नाश्नीयात् ॥ १० ॥ अतश्च भ्रूणहत्याया एतैषा रूपं प्रतिमुच्याऽऽस्ते कञ्चुकमिव ॥ ११ ॥ तदाहुर्ब्रह्म- वादिनः ॥ १२ ॥ अञ्जनाभ्यञ्जनमेवास्या न प्रतिग्राह्यं,तद्धि स्त्रियाअन्नमिति ॥ १३ ॥ तस्मात्तस्यास्तत्र न च मन्यन्ते ॥ १४ ॥ आचारायाश्च योषित इति सेयमुपयाति ॥ १५ ॥ उदक्यास्त्वासातेयेषां येचकेचिदनग्नयः ।
तुम लोग लेलो । तब स्त्रियों ने कहा कि तब हम को क्या फल मिलेगा ? । तब इन्द्रदेवता ने कहा कि वर मांगो । तब स्त्रियों ने कहा कि ऋतुकाल होने पर हमारे गर्भस्थिति द्वारा सन्तान हुआ करें और सन्तानोत्पत्ति होने से पहिले गर्भकाल में भी हम पतिका सहवास संयोग यथेच्छ कर सकें (अर्थात् इच्छा पूर्वक प्रसव काल पर्यन्त पति के साथ मैथुन भाव से संयोग करें रुकावट वा हानि न हो ) यही हम लोगों का वर है । जब इन्द्रदेव ने ऐसा वरदान स्त्रियों को दिया तब उनने इन्द्र की भ्रूणहत्या का तृतीयांश दोष ग्रहण किया ॥ ८ ॥ सो वही भ्रूणहत्या स्त्रियों के मासिक रजोधर्मरूप से प्रतिमास प्रकट होती है ॥ ९ ॥ तिस से रजस्वला स्त्री का अन्न वा उस का छुआ न खावे ॥ १० ॥ इस से यह स्त्री रजोधर्म की समाप्ति में भ्रूणहत्या के कलङ्क को सांप की केंचुली के समान त्याग के निर्मल शुद्ध होती है ॥ ११ ॥ सो ब्रह्मवादी सज्जन महर्षि लोग कहते हैं कि ॥१२॥ इस स्त्रीके अञ्जन और उबटन को पुरुष न लेवे क्योंकि वही स्त्री का अन्न वा भोजन है ॥१३॥ तिस से उस स्त्री का रजोधर्मकाल में मान्य नहीं करते ॥ १४ ॥ आचार वाली शुद्ध हुई स्त्री का मान्य करे तब वह समीप आती है ॥ १५ ॥ जिन घरों में कु-