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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषार्थसंहिता ॥ २५

अस्यै मे ब्रह्महत्यायै तृतीयं भागंगृह्णीतेति गत्वैवमुवाच,ता अब्रुवन्, किन्नोऽभूदिति, सोऽब्रवीद्वरं वृणीध्वमिति, ता अब्रु- वन्नृतौ प्रजां विन्दामहाइति,काममाविजानितोः संभवामइति (यथेच्छयाऽऽप्रसवकालात्पुरुषेण सह मैथुनभावेन संभवामइति) एषोऽस्माकं वरस्तथेन्द्रेणोक्तास्ताः प्रतिजगृहुस्तृतीयं भ्रूणह- त्यायाः ॥ ८ ॥ सैषा भ्रूणहत्या मासिमास्याविर्भवति ॥ ९ ॥ तस्माद्रजस्वलान्नं नाश्नीयात् ॥ १० ॥ अतश्च भ्रूणहत्याया एतैषा रूपं प्रतिमुच्याऽऽस्ते कञ्चुकमिव ॥ ११ ॥ तदाहुर्ब्रह्म- वादिनः ॥ १२ ॥ अञ्जनाभ्यञ्जनमेवास्या न प्रतिग्राह्यं,तद्धि स्त्रियाअन्नमिति ॥ १३ ॥ तस्मात्तस्यास्तत्र न च मन्यन्ते ॥ १४ ॥ आचारायाश्च योषित इति सेयमुपयाति ॥ १५ ॥ उदक्यास्त्वासातेयेषां येचकेचिदनग्नयः ।


तुम लोग लेलो । तब स्त्रियों ने कहा कि तब हम को क्या फल मिलेगा ? । तब इन्द्रदेवता ने कहा कि वर मांगो । तब स्त्रियों ने कहा कि ऋतुकाल होने पर हमारे गर्भस्थिति द्वारा सन्तान हुआ करें और सन्तानोत्पत्ति होने से पहिले गर्भकाल में भी हम पतिका सहवास संयोग यथेच्छ कर सकें (अर्थात् इच्छा पूर्वक प्रसव काल पर्यन्त पति के साथ मैथुन भाव से संयोग करें रुकावट वा हानि न हो ) यही हम लोगों का वर है । जब इन्द्रदेव ने ऐसा वरदान स्त्रियों को दिया तब उनने इन्द्र की भ्रूणहत्या का तृतीयांश दोष ग्रहण किया ॥ ८ ॥ सो वही भ्रूणहत्या स्त्रियों के मासिक रजोधर्मरूप से प्रतिमास प्रकट होती है ॥ ९ ॥ तिस से रजस्वला स्त्री का अन्न वा उस का छुआ न खावे ॥ १० ॥ इस से यह स्त्री रजोधर्म की समाप्ति में भ्रूणहत्या के कलङ्क को सांप की केंचुली के समान त्याग के निर्मल शुद्ध होती है ॥ ११ ॥ सो ब्रह्मवादी सज्जन महर्षि लोग कहते हैं कि ॥१२॥ इस स्त्रीके अञ्जन और उबटन को पुरुष न लेवे क्योंकि वही स्त्री का अन्न वा भोजन है ॥१३॥ तिस से उस स्त्री का रजोधर्मकाल में मान्य नहीं करते ॥ १४ ॥ आचार वाली शुद्ध हुई स्त्री का मान्य करे तब वह समीप आती है ॥ १५ ॥ जिन घरों में कु-

२६ वसिष्ठस्मृतिः ॥

कुलंचाश्रोत्रियंयेषां सर्वेतेशूद्रधर्म्मिणः । इति ॥१६॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे पञ्चमोध्यायः ॥ ५ ॥

आचारःपरमोधर्मः सर्वेषामितिनिश्चयः ।
हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्यचेहचनश्यति ॥ १ ॥
नैनंतपांसिनब्रह्म नाग्निहोत्रंनदक्षिणाः ।
हीनाचारमितोभ्रष्टं तारयन्तिकथंचन ॥ २ ॥
आचारहीनंनपुनन्तिवेदा यद्यप्यधीताःसहषड्भिरङ्गैः ।
छन्दांस्येनंमृत्युकालेत्यजन्ति नीडंशकुन्ताइवजातपक्षाः ॥३॥
आचारहीनस्यतुब्राह्मणस्य वेदाःषडङ्गास्त्वखिलाःसयज्ञाः ।
कांप्रीतिमुत्पादयितुंसमर्था अन्धस्यदाराइवदर्शनीयाः ॥४॥
नैनंछन्दांसिवृजिनात्तारयन्ति मायाविनंमाययावर्त्तमानम्।
द्वेऽप्यक्षरेसम्यगधीयमाने पुनाति तद्ब्रह्मयथावदिष्टम् ॥५॥


मारी कन्या ऋतुमती होती हो, जिसने अग्निहोत्र नहीं लिया, और जिनके कुलमें कोई श्रोत्रिय न हो वे सब शूद्रधर्मी ब्राह्मण कहे वा मानेजाते हैं ॥१६॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
सब वर्गों के लिये आचार ही परमोत्तम धर्म है यह निश्चय जानो । जिसका अन्तःकरण निकृष्ट आचार से युक्त है वह इस लोक परलोक दोनों में नष्ट होता है ॥ १ ॥ तप करना, वेद पढ़ना, अग्निहोत्र लेना और दान दक्षिणा देना इत्यादि काम धर्म से भ्रष्ट आचार से हीन पुरुष को कदापि दुःख सागर से पार नहीं करते ॥ २ ॥ यदि कही वेदाङ्गों के सहित वेदों को पढ़ा हो तो भी वे वेद आचारहीन पुरुष को पवित्र नहीं करते । पढ़े हुए वेद मृत्यु के समय इसको ऐसे ही त्याग देते हैं कि जैसे पंख निकल आने पर पक्षियों के बच्चे घोंसलों को छोड़के उड़जाते हैं॥३॥ आचार हीन ब्राह्मण को पढ़े जाने हुए कही वेदाङ्ग, और यज्ञ विधि सहित जानेहुए चारों वेद क्या प्रीति वा प्रसन्नता कर सकते हैं ? अर्थात् कुछ नहीं । जैसे अन्धे को अपनी रूपवती पत्नी के रूप से कुछ भी प्रसन्नता वा आनन्द नहीं होता वैसे ही आचार हीन को वेदों से कुछ सुख नहीं मिलता ॥ ४ ॥ छल कपट के साथ बर्ताव करनेवाले मायावी पुरुष को पढ़े हुए वेद पाप से पार नहीं करते । परन्तु शुद्धाचारी पुरुष वेद के दो अक्षर भी सम्यक् श्रद्धा तथा शुद्धि से पढ़े तो वही उसको पवित्र कर देते हैं ॥ ५ ॥ दुराचारी पुरुषलोक में निन्दित, निरन्तर दुःखी'

भाषाधर्मसंहिता ॥ २७

दुराचारोहिपुरुषो लोकेभवतिनिन्दितः । दुःखभागीचसततं व्याधितोऽल्पायुरेवच ॥ ६ ॥

आचाराल्लभतेधर्ममाचाराल्लभतेधनम् । आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारोहन्त्यलक्षणम् ॥ ७ ॥

सर्वलक्षणहीनोऽपि यःसदाचारवान्नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणिजीवति ॥ ८ ॥

आहारनिर्हारविहारयोगाः सुसंवृताधर्मविदातुकार्याः । वाग्बुद्धिकार्याणितपस्तथैव धनायुषीगुप्तमेततुकार्यै ॥६॥

उभेमूत्रपुरीषेतु दिवाकुर्यादुदङ्मुखः । रात्रौकुर्याद्दक्षिणास्य एवंह्यायुर्नहीयते ॥ १० ॥

प्रत्यग्निंप्रतिसूर्यंच प्रतिगांप्रतिचद्विजम् । प्रतिसोमोदकंसंध्यां प्रज्ञानश्यतिमेहतः ॥ ११ ॥

ननद्यांमेहनंकार्यं नभस्मनि्नगोमये । नवाकृष्टेन्ममार्गेच नोप्तेक्षेत्रेनशाद्वले ॥ १२ ॥


रोगी और अल्पायवस्थावाला होता है ॥ ६ ॥ शुद्ध आचरण होने से धर्म, धन, लक्ष्मी शोभा प्रतिष्ठा सब प्राप्त होती और आचार अलक्षण का नाश कर देता है ॥ ७ ॥ सब सुरूप आदि लक्षणों से हीन होने पर भी जो पुरुष सदाचारी श्रद्धालु और किसी की निन्दा करने वाला नहीं, वह सौ वर्ष जीवित रहता है ॥ ८ ॥ भोजन खाना-पीना-चलना फिरना मिलना इत्यादि काम धर्मज्ञ पुरुष को मध्यम कोटि के नियम बद्ध करने चाहिये। वाणी तथा बुद्धि के काम, तप, धन, और आयु इन सब को गुप्त सुरक्षित रक्खे ॥ ९ मल मूत्र का त्याग दिन में उत्तर को मुख करके और रात्रि में दक्षिण को मुख करके करे ऐसा करने से आयु क्षीण नहीं होता ॥ १० ॥ अग्नि, सूर्य, गौ, ब्राह्मण, चन्द्रमा, जलाशय, सन्ध्या, इन सबके सामने मुख करके प्रस्त्राव (पेशाब) करनेवाले की बुद्धि नष्ट होजाती है ॥ ११ नदी, भस्म, गोबर, जोते हुए खेत, मार्ग, बोये खेत और जमी हुई घास इन नदी आदि में प्रस्त्राव (पेशाब)न करे ॥१२॥

२८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

छावायामन्धकारेवा रात्रावहनिवाद्बिजः ।
यथासुखमुखःकुर्यात्प्राणबाधाभयेषुच ॥ १३ ॥
उद्धृताभिरद्भिः कार्यं कुर्यात्स्नानमनुद्धृताभिरपि ॥ १४ ॥
आहरेन्मृत्तिकांविप्रः कुलात्ससिकतांतथा ।
अन्तर्जलेदेवगृहे वल्मीकेमूषिकस्थले ॥
कृतशौचावशिष्टाच नग्राह्याःपञ्चमृत्तिकाः ॥ १५ ॥
एकालिङ्गेकरेतिस्र उभाभ्यांद्वेतृमृत्तिके ।
पञ्चापानेदशैकस्मिन्नुभयोःसप्तमृत्तिकाः ॥ १६ ॥
एतच्छौचंगृहस्थस्य द्विगुणं ब्रह्मचारिणः ।
वानप्रस्थस्यत्रिगुणं यतीनांतुचतुर्गुणम् ॥ १७ ॥
अष्टौग्रासामुनेर्भक्तं वानप्रस्थस्यषोडश ।


बादलादि की छाया में, तथा अन्धकार के समय रात्रि हो वा दिन हो और जहां प्राणों के जाने का भय हो तब जिधर को सुभीता दीखे उसी ओर मुख करके मल मूत्र का त्याग कर लेवे ॥१३॥ जलाशय से पृथक् निकाले हुए जल से अन्य सब काम करने चाहिये किन्तु जलाशय के भीतर नहीं परन्तु स्नान जलाशय के भीतर भी कर सकता है ॥ १४ ॥ ब्राह्मण हाथ मांजने आदि के लिये जलाशय के तट से बालू मही लेवे । और जलके भीतर से, देवस्थान से, बिलसे, मूषिक रहने के स्थान से और किसी के हाथ वा वर्त्तनादि मांजने में बची यह पांच प्रकार की मही शुद्धि के लिये न लेवे ॥ १५ ॥ केवल पेशाब के समय लिङ्गेन्द्रिय को एक बार मट्टी जलसे शुद्ध कर एक हाथ को तीन बार तथा दोनों हाथों को दोबार मट्टी जल से धोवे । मल त्याग के समय भी एकवार लिङ्गेन्द्रिय को और पांचवार गुदेन्द्रिय को मट्टी जल लगा के शुद्ध करके एक बाम हाथ को दशबार और दोनों हाथों को सातवार मट्टी जल लगा २ के शुद्ध करे ॥ १६ ॥ यह शुद्धि गृहस्थ के लिये कही है इस से दूनी ब्रह्मचारी, तिगुनी वानप्रस्थ, और चौगुणी शुद्धि संन्यासी करे ॥ १७ ॥ मुनि वा संन्यासी लोगों का भोजन आठ ग्रास, वानप्रस्थ का सोलह ग्रास, गृहस्थ का बत्तीस

भाषार्थसहिता ॥ २९

द्वात्रिंशद्गृहस्थस्य अमितंब्रह्मचारिणः ॥ १८ ॥
अनड्वान्ब्रह्मचारीच आहिताग्निश्चतेत्रयः ।
भुञ्जानाएवसिद्ध्यन्ति नैषांसिद्धिरनश्नताम् ॥१९॥
तपोदानोपहारेषु व्रतेषुनियमेषुच ।
इज्याध्ययनधर्मेषु योनाऽऽसक्तःसनिष्क्रियः ॥ २० ॥
योगस्तपोदमोदानं सत्यंशौचंदयाश्रुतम् ।
विद्याविज्ञानमास्तिक्य मेतद्ब्राह्मणलक्षणम् ॥ २१ ॥
येशान्तदान्ताःश्रुतिपूर्णकर्णा जितेन्द्रियाःप्राणिवधान्निवृत्ताः।
प्रतिग्रहेसंकुचिताग्रहस्तास्तेब्राह्मणास्तारयितुंसमर्थाः ॥२२॥
नास्तिकःपिशुनश्चैव कृतघ्नोदीर्घरोषकः ।
चत्वारःकर्मचाण्डाला जन्मतश्चापिपञ्चमः ॥ २३ ॥
दीर्घवैरमसूयाच असत्यंब्रह्मदूषणम् ।


ग्रास और ब्रह्मचारी को अपरिमित ग्रास (जितनी भूख हो) भोजन करना चाहिये ॥ १८ ॥ बैल, ब्रह्मचारी तथा अग्निहोत्री ब्राह्मण ये तीनों भोजन में त्रुटि न करें (अर्थात् अधिक उपवासादि न करें) भोजन करते हुए ही ये तीनों सिद्धि को प्राप्त होते हैं किन्तु लंघन उपवास करते हुए उक्त तीनों की सिद्धि नहीं है ॥ १९ ॥ जो ब्राह्मणादि द्विज तप करने, दान देने, गुरु आदि मान्यों की भेंट पूजा करने, व्रत, नियम, यज्ञ, वेदाध्ययन और अहिंसा दयादि धर्म इनमें से किसी काम में तत्पर नहीं वही निकम्मा है ॥ २० ॥ योगाभ्यास, तप, मनका दमन, दान, सत्यभाषण, शुद्धि, दया, शास्त्राध्ययन, वेदान्त (तत्त्वज्ञान) का अभ्यास, विज्ञान (लौकिक व्यवहार का ज्ञान) आस्तिकता ये सब जिनमें हैं वही ब्राह्मण है अर्थात् योगाभ्यासादि ब्राह्मणत्व के लक्षण नाम चिन्ह हैं ॥ २१ ॥ मन को वशीभूत करनेवाले दान्त, श्रुतियों (वेदों) से जिनके कान भरे गये हों, जितेन्द्रिय, हिंसा से निवृत्त, दान लेने में जिनने हाथ को सकोड़ रक्खा हो ऐसे ब्राह्मण अन्यों को तार देने में समर्थ होते हैं ॥ २२ ॥ नास्तिक, चुगल, कृतघ्न (अपना उपकार करनेवाले की हानि करनेवाला) बहुत कालतक क्रोध को न त्यागनेवाला ऐसे चारो ब्राह्मणादि कर्म से चाण्डाल हैं और पांचवां चाण्डाल जन्म से होता है ॥ २३ ॥ बहुत कालतक बैर रखना, निन्दा करना

३० वसिष्ठस्मृतिः ॥

पैशुन्यंनिर्दयत्वंच जानीयाच्छूद्रलक्षणम् ॥ २४ ॥
किंचिद्वेदमयंपात्रं किंचित्पात्रंतपोमयम् ।
पात्राणामपितत्पात्रं शूद्रान्नंयस्यनोदरे ॥ २५ ॥
शूद्रान्नरसपुष्टाङ्गो ह्यधीयानोऽपिनित्यशः ।
जुह्वन्वाऽपिजपन्वाऽपि गतिमूर्ध्वां नविन्दति ॥ २६ ॥
शूद्रान्नेनोदरस्थेन यःकश्चिन्म्रियतेद्विजः ।
सभवेत्सूकरोग्राम्यस्तस्यवाजायतेकुले ॥ २७ ॥
शूद्रान्नेनतुभुक्तेन मैथुनंयोऽधिगच्छति ।
यस्यान्नंतस्यतेपुत्रा नचस्वर्गार्हकोभवेत् ॥ २८ ॥
स्वाध्यायोत्थैर्द्यानिमन्तंप्रशान्तं वैतानस्थंपापभीरुंबहुज्ञम् ।
स्त्रीषुक्षान्तंधार्मिकंगोशरण्यं वृतैःक्षान्तंतादृशंपात्रमाहुः ॥२९॥
आमपात्रेयथान्यस्तं क्षीरंदधिघृतंमधु ।


मिथ्या भाषण, ब्राह्मण या वेद को दोष लगाना, चुगली करना, निर्दयी होना इन सबको शूद्र के लक्षण जानो अर्थात् ऐसे लक्षण ब्राह्मणादि में हों तो जान लो कि उसकी उत्पत्ति में संकरतादि दोष है ॥ २४ ॥ कोई सदा ही वेद के पढ़ने विचारने में तत्पर वेदरूप सुपात्र और कोई प्रायः तप करनेवाला तपस्वी सुपात्र कहाता है परन्तु सब में उत्तम सुपात्र वह है जिसके पेट में शूद्र का अन्न न जाता हो ॥ २५ ॥ शूद्र के अन्न से बने रस से जिसका शरीर हष्ट पुष्ट हुआ है वह भले ही नित्यशः वेद पढ़ता हो, अग्निहोत्र करता और गायत्र्यादि का जप भी भले ही करता हो तो भी स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता ॥२६॥ शूद्र का अन्न पेट में विद्यमान होते हुए जो ब्राह्मण मरता है वह जन्मान्तर में या तो गांव का सुअर होता अथवा उसी यजमान शूद्र के कुल में उत्पन्न होता है ॥ २७ ॥ शूद्र का अन्न खाकर जो मैथुन करता है तो जिसका अन्न खाया उसी के वे पुत्र होते हैं और वह स्वर्ग को जाने योग्य नहीं होता ॥२८॥ वेद के स्वाध्याय से बढ़े हुए, आन्तिर्ज्ञान, कुलीन, श्रौतस्मार्त्त अग्निहोत्री, पापों से डरनेवाले, बहुतजाननेवाले, स्त्रियों में क्षमा शील, धर्मात्मा, गो सेवा में तत्पर, व्रत करर के कृश दुबले हुए ऐसे ब्राह्मण को ऋषि लोग सुपात्र कहते हैं ॥ २९ ॥ जैसे मट्टी के कच्चे पात्र में गिराये हुए दूध दही घी शहद आदि

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३१

विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्चपात्रंरसाश्चते ॥ ३० ॥
एवंगांचहिरण्यंच वस्त्रमश्वंमहींतिलान् ।
अविद्वान्प्रतिगृह्णानो भस्मीभवतिदारुवत् ॥ ३१ ॥
नाङ्गनखवादनं कुर्यान्ननखैश्च भोजनादौ ॥३२॥ न चा-
पोऽञ्जलिना पिबेत् ॥३३॥ न पादेन पाणिना वा जलमभिह-
न्यान्न जलेन जलम् ॥ ३४ ॥ नेष्टकाभिः फलानि पातयेत्
॥ ३५ ॥ न फलेन फलंन कल्केन कुहको भवेत् ॥३६॥ नम्ले-
च्छभाषां शिक्षेत ॥ ३७ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३८ ॥
नपाणिपादचपलो ननेत्रचपलोभवेत् ।
नस्यादङ्गचपलोविप्र इतिशिष्टिस्यगोचरः ॥ ३९ ॥
पारंपर्यागतोयेषां वेदःसपरिवृंहणः ।
तेशिष्टाब्राह्मणा ज्ञेयाःश्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥४०॥
यन्नसन्तंनचासन्तं नाश्रुतंनबहुश्रुतम् ।


वस्तु पात्र के निर्बल होने से वह पात्र और दूध आदि रस नष्ट होजाते हैं ॥ ३० ॥ ऐसे ही गौ सुवर्ण वस्त्र घोड़ा भूमि और तिल आदि पदार्थों का दान लेता हुआ मूर्ख ब्राह्मण काष्ठ के तुल्य भस्म होजाता है ॥ ३१ ॥ शरीर के अङ्गों तथा नखों को न बजावे । दांतों से नखों को न काटे ॥ ३२ ॥ अञ्जलि से जल न पीवे ॥ ३३ ॥ पांव वा हाथ से जल को न पीटे न ताड़ना करे और न जल से जल की ताड़ना करे ॥३४॥ ईंटों से फलों को न गिरावे ॥३५॥ फल से फल को झाड़के न गिरावे दम्भ वा पाप में तत्पर हो के धर्म से शून्य न होवे ॥३६॥ फारसी आदि म्लेच्छ भाषा को न सीखे ॥३७॥ इस पर श्लोक कहते हैं ॥३८॥ हाथ पांव आंखें तथा शरीर के अन्य अङ्गों द्वारा चपलता दिखाने वाला ब्राह्मण न हो, यही शिष्ट होने का मार्ग है ॥ ३९ ॥ जिन के यहां कुल परम्परा से वेद वेदाङ्गों के पढ़ने जानने की परिपाटी निष्कारण धर्म बुद्धि से चलीआती है वे श्रुति को ही साक्षात्प्रमाण मानने वाले ब्राह्मण शिष्ट कहाते हैं ॥ ४० ॥ जो कोई धनादि के होने न होने को, विद्वान् अविद्वान् को और सदाचारी दुराचारी को कुछ नहीं जानता इत्यादि को अभेद दृष्टि से देखता

३२वसिष्ठस्मृतिः ॥

नसुवृत्तंनदुर्वृत्तं वेदकश्चित्सब्राह्मणोब्राह्मण ॥इति ॥४९॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

चत्वार आश्रमा ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थपरिव्राजकाः ॥ १ ॥ तेषां वेदमधीत्य वेदौ वा वेदान्वाऽविशीर्णब्रह्मचर्यो यमिच्छेत्तमाश्रयेत् ॥ २ ॥ ब्रह्मचार्याचार्यं परिचरेत् ॥ ३ ॥ आशरीरविमोक्षात् ॥ ४॥ आचार्ये प्रमातेऽग्निं परिचरेत् ॥५॥ विज्ञायते हि तत्राग्निरार्चायोइति ॥ ६ ॥ संयतवाक्चतुर्थषष्ठाष्टमकालभोजी भैक्षमाचरेत् ॥ ७ ॥ गुर्वधीनो जटिलः शिखाजटो वा गुरुं गच्छन्तमनुगच्छेत् ॥ ८ ॥ आसीनं च तिष्ठञ्शयानं चासीन उपासीत ॥ ९ ॥ आहूताध्यायी सर्वं लब्धं निवेद्य तदनुज्ञया भुञ्जीत ॥ १० ॥ खट्वाशयनदन्तप्रक्षालनाञ्जनाभ्यञ्जनापानच्छत्रवर्जी तिष्ठेदहनि रात्रावासीत


शान्तस्वरूप पूर्णतत्त्वज्ञानी वैराग्यवान् पूरा वा उत्तम कोटिका ब्राह्मण है ॥४९॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी ये चार आश्रम कहाते हैं ॥१॥ प्रथम एक दो वा तीनों वेदों को अङ्गों सहित पढ़ जानके ब्रह्मचर्य जिस का स्खलित न हुआ हो ऐसा हो कर जिस आश्रम में रहने की इच्छा हो उसी में ठहरे ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मचारी रहे तो आचार्य की सेवा करे इसी में अपने इष्ट की पूर्ण सिद्धि माने ॥ ३ ॥ जीवन भर गुरुसेवा करे ॥ ४ ॥ गुरु का स्वर्गवास हो जाने पर अग्नि की सेवा करे ॥ ५ ॥ क्योंकि श्रुति में लिखा है कि ( तेरा आचार्य अग्नि है ) ॥६॥ वाणी को वश में रक्खे । चौथे छठे वा आठव प्रहर में एकबार भोजन करे ॥ ७ ॥ गुरु के अधीन रहे । सब जटा रखावे वा केवल शिखामात्र रक्खे । चलते हुए गुरु जी के पीछे २ चला करे ॥८॥ गुरु बैठे हों तब खड़ा रहे और लेटे हों तो बैठाहुआ उपासना करे ॥ ९ ॥ पढ़ने को गुरु बुलावे तब जा कर गुरु के समीप में पढ़े । प्राप्तहुए भिक्षादि सब पदार्थों को गुरु की सेवा में निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१०॥ खटिया पर सोना, दातौन करना, आंखों में अञ्जन, शरीर में तेल लगाना, जूता और छाता इन सब का त्याग रक्खे । विशेष कर दिनमें खड़ा रहे रात्रि

भाषार्थसहिता ॥ ३३

॥ ११ ॥ त्रिःकृत्वोऽभ्युपेयादपोऽभ्युपेयादपः । इति ॥१२॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
गृहस्थो विनीतक्रोधहर्षो गुरुणाऽनुज्ञातः स्नात्वाऽस-
मानार्षामस्पृष्टमैथुनां यवीयसीं सदृशीं भार्यां विन्देत ॥१॥
पञ्चमीं मातृबन्धुभ्यः सप्तमीं पितृबन्धुभ्यः ॥ २ ॥ वैवाह्य-
मग्निमिन्धीत ॥ ३ ॥ सायमागतमतिथिं नावरुन्ध्यात् ॥४॥
नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥ ५ ॥
यस्यनाश्नातिवासार्थी ब्राह्मणोगृहमागतः ।
सुकृतंतस्ययत्किंचित्सर्वमादायगच्छति ॥ ६ ॥
एकरात्रंतु निवसन्मतिथिर्ब्राह्मणःस्मृतः ।
अनित्यंहिस्थितोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ७ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसांगतिकंतथा ।

में बैठा रहा करे ॥ ११ ॥ सायं प्रातःकाल ओर मध्यान्ह में तीनोंकाल जला-
शय के निकट जा कर शौचाचमनादिपूर्वक सन्ध्योपासनादि किया करे ॥१२॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

यदि वह गृहस्थाश्रम में रहे तो गुरु की आज्ञा से समावर्त्तन स्नान क-
रके अधिक क्रोध हर्षका त्याग करताहुआ रागद्वेष रहित होके जिसका किसी
पुरुष से संग न हुआ हो जो अपने गोत्र की न हो ऐसी युवति अपने तुल्य
कुल सम्पत्तिआदि वाली स्त्री से विवाह करे ॥१॥ मातृकुल की पांचवीं पीढ़ी
की अथवा पितृ कुल की सातवीं पीढ़ी की कन्या से भी विवाह हो सकता
है ॥ २ ॥ फिर गृह्याग्नि को विवाह की वेदी से ला कर विधिपूर्वक स्थापित
करे ॥ ३ ॥ सायंकाल में आये अभ्यागत का अनादर न करे ॥ ४ ॥ विना भो-
जन किया अतिथि गृहस्थ के घर पर भूखा न पड़ा रहे ॥ ५ ॥ जिस के घर में
ठहरने को आया ब्राह्मण भोजन मिले बिना भूखा रहता है। उस गृहस्थ के
जन्मभर में किये सब पुण्य को लेजाता है ॥ ६ ॥ एक दिन निवास करने से
अनित्य स्थिति होने के कारण ब्राह्मण अतिथि कहाता है ॥ ७ ॥ अपने ही
गांव में रहने वाला तथा पहिले से मेली मिलापी ब्राह्मण अतिथि नहीं क-

३२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

नसुवृत्तंनदुर्वृत्तं वेदकश्चित्सब्राह्मणोब्राह्मण ॥ इति ॥४१॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

चत्वार आश्रमा ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थपरिव्राजकाः ॥ १ ॥ तेषां वेदमधीत्य वेदौ वा वेदान्वाऽविशीर्णब्रह्मचयर्यो यमिच्छेत्तमावसेत् ॥ २ ॥ ब्रह्मचार्याचार्यं परिचरेत् ॥ ३ ॥ आशरीरविमोक्षात् ॥ ४॥ आचार्ये प्रमीतेऽग्निं परिचरेत् ॥५॥ विज्ञायते हि तत्राग्निरारचार्यइति ॥ ६ ॥ संयतवाक्चतुर्थषष्ठाष्टमकालभोजी भैक्षमाचरेत् ॥ ७ ॥ गुर्वधीनो जटिलः शिखाजटो वा गुरुं गच्छन्तमनुगच्छेत् ॥ ८ ॥ आसीनं च तिष्ठञ्शयानं चासीन उपासीत ॥ ९ ॥ आहूताध्यायी सर्वं लब्धं निवेद्य तदनुज्ञया भुञ्जीत ॥ १० ॥ खट्वाशयनदन्तप्रक्षालनाञ्जनाभ्यञ्जनापानच्छत्रवर्जी तिष्ठेदहनि रात्रावासीत


शान्तस्वरूप पूर्णतत्त्वज्ञानी वैराग्यवान् पूरा वा उत्तम कोटिका ब्राह्मण है ॥४१॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी ये चार आश्रम कहाते हैं ॥१॥ प्रथम एक दो वा तीनों वेदों को अङ्गों सहित पढ़ जानके ब्रह्मचर्य जिस का स्खलित न हुआ हो ऐसा हो कर जिस आश्रम में रहने की इच्छा हो उसी में ठहरे ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मचारी रहे तो आचार्य की सेवा करे इसी में अपने इष्ट की पूर्ण सिद्धि माने ॥ ३ ॥ जीवन भर गुरुसेवा करे ॥ ४ ॥ गुरु का स्वर्गवास हो जाने पर अग्नि की सेवा करे ॥ ५ ॥ क्योंकि श्रुति में लिखा है कि ( तेरा आचार्य अग्नि है ) ॥६॥ वाणी को वश में रक्खे। चौथे छठे वा आठव प्रहर में एकबार भोजन करे ॥ ७ ॥ गुरु के अधीन रहे। सब जटा रखावे वा केवल शिखामात्र रक्खे। चलते हुए गुरु जी के पीछे २ चला करे ॥८॥ गुरु बैठे हों तब खड़ा रहे और लेटे हों तो बैठाहुआ उपासना करे ॥ ९ ॥ पढ़ने को गुरु बुलावें तब जा कर गुरु के समीप में पढ़े। प्राप्तहुए भिक्षादि सब पदार्थों को गुरु की सेवा में निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१०॥ खटिया पर सोना, दातौन करना, आंखों में अञ्जन, शरीर में तैल लगाना, जूता और छाता इन सब का त्याग रक्खे। विशेष कर दिनमें खड़ा रहे रात्रि

भाषार्थसहित ॥ ३३

॥ ११ ॥ त्रिःकृत्वोऽभ्युपेयादपोऽभ्युपेयादपः । इति ॥ १२॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

गृहस्थो विनीतक्रोधहर्षो गुरुणाऽनुज्ञातः स्नात्वाऽस- मानार्षामस्पृष्टमैथुनां यवीयसीं सदृशीं भार्यां विन्देत ॥१॥
पञ्चमीं मातृबन्धुभ्यः सप्तमीं पितृबन्धुभ्यः ॥ २ ॥ वैवाह्य- मग्निमिन्धीत ॥ ३ ॥ सायमागतमतिथिं नावरुन्ध्यात् ॥४॥
नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥ ५ ॥
यस्यनाश्नातिवासार्थी ब्राह्मणोगृहमागतः ।
सुकृतंतस्ययत्किंचित्सर्वमादायगच्छति ॥ ६ ॥
एकरात्रंतु निवसन्मतिथिर्ब्राह्मणःस्मृतः ।
अनित्यंहि स्थितोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ७ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसांगतिकांस्तथा ।


में बैठा रहा करे ॥ ११ ॥ सायं प्रातःकाल और मध्यान्ह में तीनोंकाल जला- शय के निकट जा कर शौचाचमनादिपूर्वक सन्ध्योपासनादि किया करे ॥१२॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

यदि वह गृहस्थाश्रम में रहे तो गुरु की आज्ञा से समावर्त्तन स्नान क- रके अधिक क्रोध हर्षका त्याग करताहुआ रागद्वेष रहित होके जिसका किसी पुरुष से संग न हुआ हो जो अपने गोत्र की न हो ऐसी युवति अपने तुल्य कुल सम्पत्तिआदि वाली स्त्री से विवाह करे ॥१॥ मातृकुल की पांचवीं पीढ़ी की अथवा पितृ कुल की सातवीं पीढ़ी की कन्या से भी विवाह हो सकता है ॥ २ ॥ फिर गृह्याग्नि को विवाह की वेदी से ला कर विधिपूर्वक स्थापित करे ॥ ३ ॥ सायंकाल में आये अभ्यागत का अनादर न करे ॥ ४ ॥ बिना भो- जन किया अतिथि गृहस्थ के घर पर भूखा न पड़ा रहे ॥ ५ ॥ जिस के घर में ठहरने को आया ब्राह्मण भोजन मिले बिना भूखा रहता है । उस गृहस्थ के जन्मभर में किये सब पुण्य को लेजाता है ॥ ६ ॥ एक दिन निवास करने से अनित्य स्थिति होने के कारण ब्राह्मण अतिथि कहाता है ॥ ७ ॥ अपने ही गांव में रहने वाला तथा पहिले से मेली मिलापी ब्राह्मण अतिथि नहीं क-

३४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

कालेप्राप्तेअकालेवा नास्यानश्नन्गृहेवसेत् ॥ ८ ॥
श्रद्धाशीलोऽस्पृहयालुरलमग्न्याधेयाय नानाहिताग्निः स्यात् ॥९॥ अलं च सोमपानाय नासोमयाजी स्यात् ॥ १० ॥
युक्तः स्वाध्याये प्रजनने यज्ञे च ॥ ११ ॥ गृहेष्वभ्यागतं प्रत्युत्थानासनशयनवाक्सूनूताऽनसूयाभिर्मानयेत् ॥१२॥ यथाशक्ति चान्नेन सर्वभूतानि ॥ १३ ॥
गृहस्थ एवयजते गृहस्थस्तप्यतेतपः ।
चतुर्णाम्याश्रमाणांतु गृहस्थस्तुविशिष्यते ॥ १४ ॥
यथानदीनदाःसर्वे समुद्रेयान्तिसंस्थितिम् ।
एवमाश्रमिणःसर्वे गृहस्थेयान्तिसंस्थितिम् ॥ १५ ॥
यथामातरमाश्रित्य सर्वेजीवन्तिजन्तवः ।
एवंगृहस्थमाश्रित्य सर्वेजीवन्तिभिक्षवः ॥ १६ ॥


होता है । अतिथि पुरुष समय कुसमय कभी आने पर बिना भोजन किये गृहस्थ्य के घर पर भूखा न वसे ॥ ८ ॥ निर्लोभ श्रद्धालु गृहस्थ अग्निस्थापन करने योग्य होता है । गृहस्थ पुरुष अनाहिताग्नि न रहे । किन्तु यथासम्भव अग्नि को अवश्य स्थापन करे ॥९॥ और वेषा गृहस्थ सोमयाग करने योग्य भी होता है इस से सोमयाग ( अग्निष्टोमादि ) भी करे ॥१०॥ वेदाध्ययन में यज्ञ करने में और सन्तानों के उत्पन्न करने में तत्पर रहे ॥ ११ ॥ अपने घर पर आये अभ्यागत को देखके उठना, आसन देना, लेटने को शय्या देना, कोमल वाणी बोलना और स्तुति प्रशंसा करना इत्यादि प्रकार से उसका मान्य करे ॥१२॥ यथाशक्ति अन्न देकर अन्य प्राणियों का भी आदर करे ॥१३॥ गृहस्थ ही यज्ञकरता, और गृहस्थ तप करता है इस कारण चारो आश्रमों में विशेष कर गृहस्थ उत्तम है ॥ १४ ॥ जैसे सब नद और नदियां इधर उधर चलती हुई समुद्र में जा कर ठहरती हैं वैसे ही जहां तहां घूमते हुए सब साधु संन्यासी ब्रह्मचारी गृहस्थ के यहां आ कर ठहर जाते हैं ॥१५॥ जैसे सब जीव अपनी अपनी माता का आश्रय लेकर जीवित रहते हैं । ऐसे ही सब भिक्षुक लोग गृहस्थ का आश्रय लेकर भोजनादि से जीविका निर्वाह करते हैं ॥१६॥

भाषार्थसहिता ॥ ३५

नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान्न- वर्जी । ऋतौ च गच्छन्विधिवच्च जुह्वन्न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्म- लोकान्, ब्रह्मलोकादिति ॥ १७ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

वानप्रस्थो जटिलश्चीराजिनवासा ग्रामं च न प्रविशेत् ॥ १॥ न फालकृष्टमधिनिष्ठेत् ॥२॥ अकृष्टं मूलफलं संचिन्वी- त, ऊर्ध्वरेताः क्षमाशयः ॥ ३ ॥ मूलफलभैक्षेणाऽऽश्रमागत- मतिथिमभ्यर्चयेत् ॥ ४ ॥ दद्यादेव न प्रतिगृह्णीयात् ॥ ५ ॥ त्रिषवणमुदकमुपस्पृशेत् ॥६॥ श्रावणकेनाग्निमाधायाऽऽहि- ताग्निः स्याद्वृक्षमूलिकः ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वं षड्भ्यो मासेभ्योऽन- ग्निरनिकेतः ॥ ८ ॥ दद्याद्देवपितृमनुष्येभ्यः स गच्छेत्स्वर्ग- मानन्त्यमानन्त्यम् ॥ ९ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

यज्ञोपवीत, एक जलपात्र गृहस्थ नित्य साथ रक्खे नीच वा पतितों के अन्न का त्याग रक्खे, नित्य वेदाध्ययन करे, ऋतुकाल में पत्नी से संग करे और शास्त्रोक्त विधि से नित्य होम करे ऐसा गृहस्थ ब्राह्मण ब्रह्मलोक को जन्मान्तर में प्राप्त होता है फिर वहां से च्युत नहीं होता ॥ १७ ॥

यह वासिष्ठ धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

वानप्रस्थ पुरुष जटाधारी, फटे चिथरा वस्त्र वा मृग चर्म को ओढ़े, गांव में न घुसे ॥ १ ॥ हल से जोती हुई भूमि पर न बैठे लेटे ॥ २ ॥ बिन जोती भूमि से उत्पन्न हुए मूल तथा फलों को भोजन के लिये लाया करे । ऊर्ध्वरेता (जिसका वीर्य नीचे को कदापि न गिरे) रहे पृथिवी पर सोया लेटा करे ॥ ३ ॥ कन्द मूल फल रूप भिक्षा से अपने आश्रम पर आये अतिथि का सत्कार करे ॥ ४ ॥ दिया ही करे किसी से कुछ न लेवे ॥ ५॥ सायं प्रातःकाल और मध्याह्न में तीनोंकाल स्नान सन्ध्यादि कृत्य किया करे ॥ ६ ॥ श्रावणक द्वारा अग्निस्थापन करके आहिताग्नि हो जावे । वृक्षों की जड़ों पर वृक्षों के नीचे निवास किया करे ॥ ७ ॥ फिर छः महिनों के बीतने पर अग्नि और एक स्थान का निवास त्याग देवे ॥८॥ देवयज्ञ, पितृयज्ञ, और अतिथियज्ञ द्वारा देव पितर और मनुष्यों को दिया करे तो वह अनन्त मोक्ष के आनन्द को प्राप्त होता है ॥ ९॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में नवम अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

३६ वसिष्ठस्मृतिः ॥

परिव्राजकः सर्वभूताभयदक्षिणां दत्त्वा प्रतिष्ठेत ॥ १ ॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ २ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वाचरतियोमुनिः ।
तस्यापिसर्वभूतेभ्यो नभयंजातुविद्यते ॥ ३ ॥
अभयंसर्वभूतेभ्यो दत्त्वायस्तुनिवर्तते ।
हन्तिजातानजातांश्च द्रव्याणिप्रतिगृह्यच ॥ ४ ॥
संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदमेकंनसन्न्यसेत् ।
वेदसंन्यसनाच्छूद्रस्तस्माद्वेदंनसन्न्यसेत् ॥ ५ ॥
एकाक्षरंपरंब्रह्म प्राणायामः परन्तपः ।
उपवासात्परंभैक्षं दयादानाद्विशिष्यते ॥ ६ ॥
मुण्डोऽममोऽपरिग्रहः सप्तागारण्यसंकल्पितानि चरेद्भैक्षं विधूमे सन्नमुसले ॥ ७ ॥ एकशाटीपरिवृतोऽजिनेन


अब इस दशम अध्याय में संन्यास धर्म कहते हैं । संन्यासी होता हुआ ब्राह्मण सब प्राणियों को निर्भयरूप दक्षिणा देकर एक स्थान वा संसार के पदार्थों से प्रस्थान करे ॥ १ ॥ यहां श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ २ ॥ सब प्राणियों को अभयदान देकर जो मुनि संन्यासी विचरता है उसको भी सब प्राणियों से कदापि कहीं भय नहीं है ॥ ३ ॥ सब प्राणियों को अभय दान देकर जो निवृत्ति मार्ग में चलता है। वह द्रव्यादि को ग्रहण करके भी होचुके वा होनेवाले सब दोषों को नष्ट कर देता है ॥ ४ ॥ विरक्त संन्यासी पुरुष संसार के सब कामों को त्याग देवे परन्तु एक वेद कात्याग न करे क्योंकि वेद का त्याग करने से शूद्र होजाता है तिससे वेद को न त्यागे ॥ ५ ॥ एक अक्षर ओंकार परमोत्तम वेद है, प्राणायाम उत्तम तप है । भिक्षा मांगकर परिमित सूक्ष्म भोजन करना उपवास करने से अच्छा और दान धर्म से दया बड़ी है ॥ ६ ॥ संन्यासी शिर के तथा दाढ़ी मूंछों के सब बाल मुंड़ाया करे, ममता को त्यागे, संसारी सुख के पदार्थों का संचय वा रक्षा न करे, गृहस्थों के घरों में धानादि कूटने पीसने खाने पकाने के समाप्त होजाने पर पहिले से जिनका संकल्प न किया हो ऐसे सात घरों से संन्यासी पकाये अन्न की भिक्षा मांगलावे और एकान्त में जाकर खावे ॥ ७ ॥ कौपीन (लंगोट.) के ऊपर एक धोती संन्यासी पहने उसी में से आधी ओढ़ लिया करे, अथवा मृग चर्म से श-

भाषार्थसहिता ॥ ३९

वा गोप्रलूनेस्तृणैर्वेष्टितशरीरः स्थण्डिलशाय्यनित्यां वसतिं वसेत् ग्रामान्ते देवगृहे शून्यागारे वृक्षमूले वा मनसा ज्ञानमधीयमानः ॥ ८ ॥ अरण्यनित्यो न ग्राम्यपशूनां संदर्शने विहरेत् ॥ ९ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १० ॥

अरण्यनित्यस्यजितेन्द्रियस्य सर्वेन्द्रियप्रीतिनिवर्त्तकस्य ।
अध्यात्मचिन्तागतमानसस्य ध्रुवाह्यनावृत्तिरुपेक्षकस्याइति ११

अव्यक्तलिङ्गो व्यक्ताचारः, अनुन्मत्त उन्मत्तवेषः॥१२॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ १३॥
नशब्दशास्त्राभिरतस्यमोक्षो नचापि लोकग्रहणेरतस्य ।
नभोजनाच्छादनतत्परस्य नचापिरम्यावसथप्रियस्य ॥१४
नचोत्पातनिमित्ताभ्यां ननक्षत्राङ्गविद्यया ।


शीर की ढांपे। गौओं के खाने से बची घास शरीर में लपेटे । स्थण्डिल भूमि भागपर सोवे । किसी एक स्थान में अधिक दिनों तक न बसे, गांव के समीप में, देवस्थान (शिवालय आदि) में, किसी सूने घर में, अथवा वृक्षों के नीचे इनमें से किसी अनुकूल निर्विघ्न स्थान में मन से तत्त्वज्ञान का स्मरण वा पाठ करता हुआ बसे ॥ ८ ॥ नित्य ही एकान्त वन आदि में रहे । गांव के पशुओं के देखने में मनको भ्रमण न करे ॥ ९ ॥ इस पर श्लोक का प्रमाण कहते हैं ॥ १० ॥ सब इन्द्रियों को उनर के विषय भुगाने द्वारा प्रसन्न करने से निवृत्त हुए जितेन्द्रिय हो के नित्य एकान्त में बसनेवाले, अध्यात्म चिन्ता में जिस का मन लगा हो ऐसे उपेक्षावृत्तिवाले संन्यासी को मोक्ष से पुनरावृत्ति नहीं होती है ॥ ११ ॥ महात्मा पन के चिन्ह प्रकट न करे पर शुद्ध आचार प्रकट रक्खे, ऊपरी वेष से उन्मत्त जान पड़े, अर्थात् उन्मत्तों कासा वेष रक्खे और भीतरी विचारों में उन्मत्त न रहे ॥ १२ ॥ इस पर श्लोकों का प्रमाण कहते हैं ॥ १३ ॥ व्याकरण के पढ़ने पढ़ाने, वाद विवाद में, तथा संसारी मनुष्यों को प्रसन्न रखने में, अच्छे२ भोजन वस्त्रों की प्राप्ति में, अच्छे घर में निवास करने में, तत्पर संन्यासी का मोक्ष नहीं हो सकता है ॥ १४ ॥ उत्पात (होने वाली भयंकर घटना) बताने, काम सिद्ध होने के निमित्त बताने, ज्योतिष

३८वसिष्ठस्मृतिः ॥

नानुशासनवादाभ्यां भिक्षांलिप्सेतकहिंचित् ॥ १५ ॥
अलाभेनविषादीस्याल्लाभं चैव न हर्षयेत् ।
प्राणयात्रिकमात्रःस्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ॥१६॥
नकुट्यांनोदकेसङ्गो नचैले नत्रिपुष्करे ।
नाऽऽगारेनासनेनाऽन्ने यस्यवैमोक्षवित्तमः । इति ॥१७॥
ब्राह्मणकुले वा यल्लभेत्त तद्भुञ्जीत, सायं प्रातर्मधुमांस-
परिवर्जम् ॥ १८ ॥ यतीन्साधूंश्च गृहस्थान्सायं प्रातश्चतर्पये-
त् ॥ १९ ॥ ग्रामे वा वसेत् ॥ २०॥ अजिह्योऽशरणोऽसङ्कुसु-
को नचेन्द्रियसंयोगं कुर्वीत केनचित् ॥ २१ ॥ उपेक्षकः सर्व-
भूतानां हिंसानुग्रहपरिहारेण ॥ २२ ॥ पैशुन्यमत्सराभिमा-
नाहंकाराश्रद्धाऽनार्जवात्मस्तवपरगर्हादम्भलोभमोहक्रोधाऽसू-


विद्या, वा अङ्ग विद्या, धर्मादि का उपदेश और वाद विवाद करने द्वारा संन्यासी उत्तम भिक्षादि मिलने की इच्छा कदापि न करे ॥ १५ ॥ भिक्षादि न मिलने पर दुःख न माने और भिक्षादि के लाभ का हर्ष भी न करे प्राणों के निर्वाहमात्र के लिये कुछ थोड़ा सा अन्न जैसा मिले खालिया करे । इतना तथा ऐसा ही भोजनादि मिले ऐसा विचार न रक्खे ॥ १६ ॥ ॥ उत्तम कुटी, जलाशय, वस्त्र, स्वर्ग, उत्तम स्थान ( बगीचा आदि ) उत्तम आसन इत्यादि किसी से भी जो आसक्त नहीं वह यति होकर मोक्ष पद को जाननेवाला है ॥१७ ॥ अथवा ब्राह्मण के घर से मधु मांस का अंश छोड़के अन्य जो मिलजाय वही सायंप्रातः दोवार खा लेवे ॥ १८ ॥ साधु यतियों और अकल गृहस्थों को सायं प्रातःकाल अपनी मङ्गलमूर्ति के दर्शन देकर तृप्तकरे ॥ १९ ॥ अथवा ग्राम में वसे ॥ २० ॥ कुटिलतान करे, चित्त वा शरीर की चंचलता त्यागे, किसी का सहारा न लेवे और किसी विषयके साथ इन्द्रियों का संग न करे ॥२१॥ किसी को दुःख देने वा अनुग्रह की चेष्टा न करता हुआ सब प्राणियों से उदासीन भाव रक्खे ॥२२॥चुगली मत्सरता, अभिमान, अहंकार, अश्रद्धा अविश्वास, कठोरता निर्दयता, आत्मश्लाघा ( अपनी प्रशंसा ) परनिन्दा, दम्भ, लोभ, मोह, क्रोध, अन्य के शुभ गुणों में भी दोषारोप करना रूप असूया, इन चुगली आदि का सर्वथा

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३९

याविवर्जनं सर्वाश्रमिणां धर्म-इष्टः ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत्युदक- कमण्डलुहस्तः शुचिर्ब्राह्मणो वृषलान्नवर्जी न हीयते ब्रह्म- लोकाद्ब्रह्मलोकादिति ॥ २४ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

षडर्हा भवन्ति, ऋत्विग् विवाह्यो राजा पितृव्यमातु- लस्नातकाश्च ॥ १ ॥ वैश्वदेवस्य सिद्धस्य सायं प्रातर्गृह्या- ग्नौ जुहुयात् ॥ २ ॥ गृहदेवताभ्यो बलिं हरेत् ॥ ३ ॥ श्रोत्रिया- याऽऽगताय भागं दत्त्वा ब्रह्मचारिणे वाऽनन्तरं पितृभ्यो दद्यात् ॥ ४ ॥ ततोऽतिथिं भोजयेत्, श्रेयांसं श्रेयांसमानुपूर्व्येण स्वगृह्याणां कुमारबालवृद्धतरुणप्रभृतींस्ततोऽपरान्गृह्यान् ॥ ५ ॥


परित्याग करना चारो आश्रम वाले ब्राह्मणादिका परम कर्त्तव्य है ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत धारण किये, जल सहित कमण्डलु हाथ में लिये, शूद्रादि नीचोंका अन्न न खाने वाला शुद्ध ब्राह्मण ब्रह्मलोक को प्राप्त होके वहां से च्युत नहीं होता है ॥ २४ ॥

यह वसिष्ठ प्रोक्त धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १०

ऋत्विज्, विवाह के समय वर, राजा, चाचा, मामा, और ब्रह्मचर्य को समाप्त करने वाला स्नातक ये छः पुरुष सत्कार विधि से पूजा करने योग्य होते हैं ॥ १ ॥ विश्वेदेवों के निमित्त पकाये नैत्यक भोजन में से सायं प्रातः काल अपने गृह्यसूत्रोक्त मन्त्रों से गृह्याग्नि में देवयज्ञ नामक होम करे ॥ २ ॥ तदनन्तर गृहाभिमानी पूर्वादिदिग् के इन्द्रादि देवताओं के लिये बलि नाम ग्रास धरना रूप भूतयज्ञ करे ॥ ३ ॥ आये हुए वेदपाठी ब्राह्मण को वा भिक्षार्थ आये ब्रह्मचारी को भाग देकर पश्चात् पितरों को बलि देवे वा इसी अवसर में पितरों को जल देना रूप तर्पण करे (इस तर्पण में देवयज्ञ ऋषियज्ञ और पितृयज्ञ तीनों के अंग संमिलित जाते हैं) ॥ ४ ॥ तदनन्तर अतिथि को भोजन करावै । उन में भी जो २ विशेष मान्य हों उन २ को पहिले २ क्रमशः भोजन कराके अपने घर के कुमार बालक, वृद्ध, और तरुण आदि को क्रम से जिमावै । तदनन्तर घरके अन्य लोगों को जिमावै ॥ ५ ॥ कुत्ता, चाण्डाल, पतित और

४० | वसिष्ठस्मृतिः ॥

श्वचाण्डालपतितवायसेभ्यो भूमौ निर्वपेत् ॥६॥ शूद्रायोच्छिष्टमनुच्छिष्टं वा दद्यात् ॥७॥ शेषं दम्पती भुञ्जीयाताम् ॥८॥ सर्वोपयोगेन पुनःपाकः ॥९॥ यदि निरुप्ते वैश्वदेवेऽतिथिररागच्छेद्विशेषेणास्माअन्नं कारयेत् ॥१०॥ विज्ञायते हि ॥ ११ ॥ वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहम् । तस्मादपआनयन्त्यन्नं वर्षाभ्यस्तां हि शान्तिं जना विदुरिति ॥१२॥ तं भोजयित्वोपासीताऽऽसीमान्तमनुव्रजेत्, आऽनुज्ञानाद्वा ॥ १३॥ अपरपक्ष ऊर्ध्वं चतुर्थ्याः पितृभ्यो दद्यात्पूर्वेद्युर्ब्राह्मणान्सन्निपात्य यतीन् गृहस्थान् साधून् वा परिणतवयसोऽविकर्मस्थाञ् श्रोत्रियानशिष्यानन्तेवासिनः शिष्यानपि गुणवतो भोजयेत् ॥१४॥ विलग्नशुक्लक्लीबान्धश्यावदन्तकुष्ठिकुनखिवर्जम् ॥१५॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १६ ॥


काक इन के नाम से भूमि पर एक २ ग्रास घरे ॥६॥ शूद्रको उच्छिष्ट वा जो उच्छिष्ट न हो वैसा भोजन यथेच्छ देवे ॥७॥ शेष बचे अन्नको स्त्री पुरुष खावें ॥८॥ यदि सभी भोजन अन्यों को देने में ही चुक जावे तो फिर से अपने लिये पकावे ॥ ९ ॥ यदि वैश्वदेव करलेने पर अतिथि आजावे तो विशेष कर उन के लिये भोजन करावे ॥ १० ॥ श्रुति से जाना जाता है कि ॥११॥ “अतिथि ब्राह्मण वैश्वानर के रूप से गृहस्थ के घर पर आता है। उन के सत्कारार्थ जल और अन्न गृहस्थ लोग उपस्थित करते हैं। एक वर्ष अभ्यास की अतिथि सेवा परम शान्ति सुख देने वाली होती ऐसा विद्वान् लोग जानते मानते हैं” ॥ १२ ॥ उस अतिथि को भोजन कराके समीप बैठे। जब अतिथि चले तो गांव की सीमातक पीछे २ चले अथवा जहां से लौटने की आज्ञा करे वहां से लौट आवे ॥ १३ ॥ कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि के पश्चात् पितरों का श्राद्ध करे। श्राद्ध से पहिले दिन यति, गृहस्थ, साधु शुभकर्मी, शिष्यों से भिन्न समीपवर्ती वा वृद्ध ब्राह्मणों को अथवा गुणी विद्वान् शिष्यों को भी निमन्त्रित करके श्राद्धकाल में भोजन करावे ॥ १४ ॥ विषयी, श्वेतकुष्ठी, नपुंसक, अन्धे, काले दांतों वाले, कुष्ठी और जिन के नख बिगड़े हों ऐसों को श्राद्ध में भोजन न करावे ॥ १५ ॥ इस पर श्लोक भी प्रमाण में कहते हैं कि

भाषाऽर्थसहिता ॥ ४१

अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपङ्क्तिदूषणैः ।
अदूष्यंतंयमःप्राह पङ्क्तिपावनएवसः ॥ १७ ॥
श्राद्धेनोद्वासनीयानि उच्छिष्टान्यादिनक्षयात्
श्रोतन्तेहिसुधाधारास्ताःपियन्त्यकृतोदकाः ॥ १८ ॥
उच्छिष्टंनप्रमृज्यात्तु यावन्नास्तमितोरविः ।
क्षीरधारास्ततोयान्ति,अक्षय्याः पङ्क्तिभागिनः ॥१९॥
प्राक्संस्कारप्रमीतानां स्ववंश्यानामितिश्रुतिः ।
भागधेयंमनुःप्राह उच्छिष्टोच्छेषणेउभे ॥ २०॥
उच्छेषणंभूमिगतं विकिरंल्लेपसोदकम् ।
अन्नंप्रेतेषुविसृजेदप्रजानामनायुषाम् ॥ २१ ॥
उभयोःशाखयोर्मुक्तं पितृभ्योऽन्नंनिवेदितम् ।
तदन्तरंप्रतीक्षन्ते ह्यसुरादुष्टचेतसः ॥ २२ ॥
तस्मादशून्यहस्तेन कुर्यादन्नमुपागतम् ।


॥१६॥ यदि वेदवेत्ता ब्राह्मण अङ्गहीन होना आदि पङ्क्ति में दूषित शरीर वाला भी हो तो भी महर्षि यमने उसको निर्दोष पङ्क्तिपावन ही कहा है ॥१७॥ श्राद्ध में भोजन कराये ब्राह्मणों की जूठन को सूर्यास्त होने समय तक न उठावे। क्योंकि अमृत की धारा झरती हैं उनको वे पितर पीते हैं जिन ने जल दान नहीं किया ॥ १८ ॥ जब तक सूर्य अस्त नहीं तब तक उच्छिष्ट को उठाके स्थान की शुद्धि न करे क्योंकि उस से अक्षय दूध की धारा पङ्क्तिभागी पितरों को प्राप्त होती हैं ॥ १९ ॥ पिण्ड बनाये अन्नका शेष लेप और ब्राह्मणों के भोजन का उच्छिष्ट ये दोनों उपनयन संस्कार होने से पहिले मरे अपने वंशवालों के भाग मनुजी ने कहे हैं ॥२०॥ पात्र में लिया वा भूमि पर गिरा उच्छेषणभाग को निर्वंश होकर कम आयु में मरों के अन्नको जल सहित प्रेतों के निमित्त छोड़े ॥ २१ ॥ दोनों ओर की अंगुलियों से छोड़े पितरों को निवेदन किये अन्न के पात्र में पहुंचने से पहिले दुष्ट विचार वाले असुर लोग बीच में मारखाने की प्रतीक्षा करते हैं ॥ २२ ॥ तिस से कुश हाथ में ले कर कुशों के सहारे से अन्न का निवेदन करे। अथवा भोजन का स्पर्श करके दोनों प्रकार के शेष

४२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

भोजनंवासमालभ्य तिष्ठेतोच्छेषणेउभे ॥ २३ ॥
द्वौदैवेपितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्रवा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि नप्रसज्येतविस्तरे ॥ २४ ॥
सत्क्रियां देशकालौच शौचं ब्राह्मणसम्पदः ।
पञ्चैतान्विस्तरोहन्ति तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥ २५ ॥
अपिवाभोजयेदेकं ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
श्रुतशीलोपसंपन्नं सर्वलक्षणवर्जितम् ॥ २६ ॥
यद्येकंभोजयेच्छ्राद्धे देवंतत्रकथंभवेत् ।
अन्नंपात्रे समुद्धृत्य सर्वस्यप्रकृतस्यतु ॥ २७ ॥
देवतायतनेकृत्वा ततःश्राद्धंप्रवर्त्तयेत् ।
प्रास्येदग्नौतदन्नंतु दद्याद्वाब्रह्मचारिणे ॥ २८ ॥
यावदुष्णंभवत्यन्नं यावदश्नन्तिवाग्यतः ।
तावद्धिपितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ताहविर्गुणाः ॥२९॥


भागों की यथास्थान रक्षा करे ॥२३॥ विश्वेदेव सम्बन्धी दो और तीन पितृ ब्राह्मणों को वा दोनों में एक २ ब्राह्मण को भोजन करावे । धनाढ्य हो तो भी अधिक विस्तृत पांति को भोजन कराने को तत्पर न हो ॥२४॥ क्योंकि सत्कार, देश, काल, शुद्धि और सुपात्र ब्राह्मणों का मिलना इन पांचों को बहुतों का भोजन कराना नष्ट करता है तिस से श्राद्ध में बड़ी पांति करने की चेष्टा न करे ॥२५॥ अथवा वेद पारंगत, शास्त्राभ्यासी, सौम्य स्वभाव युक्त, सब कुलक्षणों से रहित, धर्म कर्म निष्ठ एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में भोजन करावे ॥ २६ ॥ यदि एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे तो वही एक विश्वेदेवों और पितरों दोनों के लिये कैसे होगा ? । इसका समाधान यह है कि पकाये हुए सब अन्न में से विश्वेदेवों के निमित्त एक पात्र में अन्न परोस कर ॥ २७ ॥ किसी देवस्थान मन्दिरादि में सुरक्षित रख कर श्राद्ध करे पश्चात् उस विश्वेदेवों के भोजन को अग्नि में होम करदे वा किसी ब्रह्मचारी को देदेवे ॥ २८ ॥ जब तक भोजन गर्म रहता और जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण मौन हो कर भोजन करते हैं तथा जबतक भोज्य पदार्थों के गुण वर्णन नहीं कहेगये तभी तक ब्राह्मणों के साथ पितर लोग भोजन करते हैं ॥२९॥