भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 729, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 729

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३९

याविवर्जनं सर्वाश्रमिणां धर्म-इष्टः ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत्युदक- कमण्डलुहस्तः शुचिर्ब्राह्मणो वृषलान्नवर्जी न हीयते ब्रह्म- लोकाद्ब्रह्मलोकादिति ॥ २४ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

षडर्हा भवन्ति, ऋत्विग् विवाह्यो राजा पितृव्यमातु- लस्नातकाश्च ॥ १ ॥ वैश्वदेवस्य सिद्धस्य सायं प्रातर्गृह्या- ग्नौ जुहुयात् ॥ २ ॥ गृहदेवताभ्यो बलिं हरेत् ॥ ३ ॥ श्रोत्रिया- याऽऽगताय भागं दत्त्वा ब्रह्मचारिणे वाऽनन्तरं पितृभ्यो दद्यात् ॥ ४ ॥ ततोऽतिथिं भोजयेत्, श्रेयांसं श्रेयांसमानुपूर्व्येण स्वगृह्याणां कुमारबालवृद्धतरुणप्रभृतींस्ततोऽपरान्गृह्यान् ॥ ५ ॥


परित्याग करना चारो आश्रम वाले ब्राह्मणादिका परम कर्त्तव्य है ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत धारण किये, जल सहित कमण्डलु हाथ में लिये, शूद्रादि नीचोंका अन्न न खाने वाला शुद्ध ब्राह्मण ब्रह्मलोक को प्राप्त होके वहां से च्युत नहीं होता है ॥ २४ ॥

यह वसिष्ठ प्रोक्त धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १०

ऋत्विज्, विवाह के समय वर, राजा, चाचा, मामा, और ब्रह्मचर्य को समाप्त करने वाला स्नातक ये छः पुरुष सत्कार विधि से पूजा करने योग्य होते हैं ॥ १ ॥ विश्वेदेवों के निमित्त पकाये नैत्यक भोजन में से सायं प्रातः काल अपने गृह्यसूत्रोक्त मन्त्रों से गृह्याग्नि में देवयज्ञ नामक होम करे ॥ २ ॥ तदनन्तर गृहाभिमानी पूर्वादिदिग् के इन्द्रादि देवताओं के लिये बलि नाम ग्रास धरना रूप भूतयज्ञ करे ॥ ३ ॥ आये हुए वेदपाठी ब्राह्मण को वा भिक्षार्थ आये ब्रह्मचारी को भाग देकर पश्चात् पितरों को बलि देवे वा इसी अवसर में पितरों को जल देना रूप तर्पण करे (इस तर्पण में देवयज्ञ ऋषियज्ञ और पितृयज्ञ तीनों के अंग संमिलित जाते हैं) ॥ ४ ॥ तदनन्तर अतिथि को भोजन करावै । उन में भी जो २ विशेष मान्य हों उन २ को पहिले २ क्रमशः भोजन कराके अपने घर के कुमार बालक, वृद्ध, और तरुण आदि को क्रम से जिमावै । तदनन्तर घरके अन्य लोगों को जिमावै ॥ ५ ॥ कुत्ता, चाण्डाल, पतित और