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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३९

याविवर्जनं सर्वाश्रमिणां धर्म-इष्टः ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत्युदक- कमण्डलुहस्तः शुचिर्ब्राह्मणो वृषलान्नवर्जी न हीयते ब्रह्म- लोकाद्ब्रह्मलोकादिति ॥ २४ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

षडर्हा भवन्ति, ऋत्विग् विवाह्यो राजा पितृव्यमातु- लस्नातकाश्च ॥ १ ॥ वैश्वदेवस्य सिद्धस्य सायं प्रातर्गृह्या- ग्नौ जुहुयात् ॥ २ ॥ गृहदेवताभ्यो बलिं हरेत् ॥ ३ ॥ श्रोत्रिया- याऽऽगताय भागं दत्त्वा ब्रह्मचारिणे वाऽनन्तरं पितृभ्यो दद्यात् ॥ ४ ॥ ततोऽतिथिं भोजयेत्, श्रेयांसं श्रेयांसमानुपूर्व्येण स्वगृह्याणां कुमारबालवृद्धतरुणप्रभृतींस्ततोऽपरान्गृह्यान् ॥ ५ ॥


परित्याग करना चारो आश्रम वाले ब्राह्मणादिका परम कर्त्तव्य है ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत धारण किये, जल सहित कमण्डलु हाथ में लिये, शूद्रादि नीचोंका अन्न न खाने वाला शुद्ध ब्राह्मण ब्रह्मलोक को प्राप्त होके वहां से च्युत नहीं होता है ॥ २४ ॥

यह वसिष्ठ प्रोक्त धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १०

ऋत्विज्, विवाह के समय वर, राजा, चाचा, मामा, और ब्रह्मचर्य को समाप्त करने वाला स्नातक ये छः पुरुष सत्कार विधि से पूजा करने योग्य होते हैं ॥ १ ॥ विश्वेदेवों के निमित्त पकाये नैत्यक भोजन में से सायं प्रातः काल अपने गृह्यसूत्रोक्त मन्त्रों से गृह्याग्नि में देवयज्ञ नामक होम करे ॥ २ ॥ तदनन्तर गृहाभिमानी पूर्वादिदिग् के इन्द्रादि देवताओं के लिये बलि नाम ग्रास धरना रूप भूतयज्ञ करे ॥ ३ ॥ आये हुए वेदपाठी ब्राह्मण को वा भिक्षार्थ आये ब्रह्मचारी को भाग देकर पश्चात् पितरों को बलि देवे वा इसी अवसर में पितरों को जल देना रूप तर्पण करे (इस तर्पण में देवयज्ञ ऋषियज्ञ और पितृयज्ञ तीनों के अंग संमिलित जाते हैं) ॥ ४ ॥ तदनन्तर अतिथि को भोजन करावै । उन में भी जो २ विशेष मान्य हों उन २ को पहिले २ क्रमशः भोजन कराके अपने घर के कुमार बालक, वृद्ध, और तरुण आदि को क्रम से जिमावै । तदनन्तर घरके अन्य लोगों को जिमावै ॥ ५ ॥ कुत्ता, चाण्डाल, पतित और

४० | वसिष्ठस्मृतिः ॥

श्वचाण्डालपतितवायसेभ्यो भूमौ निर्वपेत् ॥६॥ शूद्रायोच्छिष्टमनुच्छिष्टं वा दद्यात् ॥७॥ शेषं दम्पती भुञ्जीयाताम् ॥८॥ सर्वोपयोगेन पुनःपाकः ॥९॥ यदि निरुप्ते वैश्वदेवेऽतिथिररागच्छेद्विशेषेणास्माअन्नं कारयेत् ॥१०॥ विज्ञायते हि ॥ ११ ॥ वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहम् । तस्मादपआनयन्त्यन्नं वर्षाभ्यस्तां हि शान्तिं जना विदुरिति ॥१२॥ तं भोजयित्वोपासीताऽऽसीमान्तमनुव्रजेत्, आऽनुज्ञानाद्वा ॥ १३॥ अपरपक्ष ऊर्ध्वं चतुर्थ्याः पितृभ्यो दद्यात्पूर्वेद्युर्ब्राह्मणान्सन्निपात्य यतीन् गृहस्थान् साधून् वा परिणतवयसोऽविकर्मस्थाञ् श्रोत्रियानशिष्यानन्तेवासिनः शिष्यानपि गुणवतो भोजयेत् ॥१४॥ विलग्नशुक्लक्लीबान्धश्यावदन्तकुष्ठिकुनखिवर्जम् ॥१५॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १६ ॥


काक इन के नाम से भूमि पर एक २ ग्रास घरे ॥६॥ शूद्रको उच्छिष्ट वा जो उच्छिष्ट न हो वैसा भोजन यथेच्छ देवे ॥७॥ शेष बचे अन्नको स्त्री पुरुष खावें ॥८॥ यदि सभी भोजन अन्यों को देने में ही चुक जावे तो फिर से अपने लिये पकावे ॥ ९ ॥ यदि वैश्वदेव करलेने पर अतिथि आजावे तो विशेष कर उन के लिये भोजन करावे ॥ १० ॥ श्रुति से जाना जाता है कि ॥११॥ “अतिथि ब्राह्मण वैश्वानर के रूप से गृहस्थ के घर पर आता है। उन के सत्कारार्थ जल और अन्न गृहस्थ लोग उपस्थित करते हैं। एक वर्ष अभ्यास की अतिथि सेवा परम शान्ति सुख देने वाली होती ऐसा विद्वान् लोग जानते मानते हैं” ॥ १२ ॥ उस अतिथि को भोजन कराके समीप बैठे। जब अतिथि चले तो गांव की सीमातक पीछे २ चले अथवा जहां से लौटने की आज्ञा करे वहां से लौट आवे ॥ १३ ॥ कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि के पश्चात् पितरों का श्राद्ध करे। श्राद्ध से पहिले दिन यति, गृहस्थ, साधु शुभकर्मी, शिष्यों से भिन्न समीपवर्ती वा वृद्ध ब्राह्मणों को अथवा गुणी विद्वान् शिष्यों को भी निमन्त्रित करके श्राद्धकाल में भोजन करावे ॥ १४ ॥ विषयी, श्वेतकुष्ठी, नपुंसक, अन्धे, काले दांतों वाले, कुष्ठी और जिन के नख बिगड़े हों ऐसों को श्राद्ध में भोजन न करावे ॥ १५ ॥ इस पर श्लोक भी प्रमाण में कहते हैं कि

भाषाऽर्थसहिता ॥ ४१

अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपङ्क्तिदूषणैः ।
अदूष्यंतंयमःप्राह पङ्क्तिपावनएवसः ॥ १७ ॥
श्राद्धेनोद्वासनीयानि उच्छिष्टान्यादिनक्षयात्
श्रोतन्तेहिसुधाधारास्ताःपियन्त्यकृतोदकाः ॥ १८ ॥
उच्छिष्टंनप्रमृज्यात्तु यावन्नास्तमितोरविः ।
क्षीरधारास्ततोयान्ति,अक्षय्याः पङ्क्तिभागिनः ॥१९॥
प्राक्संस्कारप्रमीतानां स्ववंश्यानामितिश्रुतिः ।
भागधेयंमनुःप्राह उच्छिष्टोच्छेषणेउभे ॥ २०॥
उच्छेषणंभूमिगतं विकिरंल्लेपसोदकम् ।
अन्नंप्रेतेषुविसृजेदप्रजानामनायुषाम् ॥ २१ ॥
उभयोःशाखयोर्मुक्तं पितृभ्योऽन्नंनिवेदितम् ।
तदन्तरंप्रतीक्षन्ते ह्यसुरादुष्टचेतसः ॥ २२ ॥
तस्मादशून्यहस्तेन कुर्यादन्नमुपागतम् ।


॥१६॥ यदि वेदवेत्ता ब्राह्मण अङ्गहीन होना आदि पङ्क्ति में दूषित शरीर वाला भी हो तो भी महर्षि यमने उसको निर्दोष पङ्क्तिपावन ही कहा है ॥१७॥ श्राद्ध में भोजन कराये ब्राह्मणों की जूठन को सूर्यास्त होने समय तक न उठावे। क्योंकि अमृत की धारा झरती हैं उनको वे पितर पीते हैं जिन ने जल दान नहीं किया ॥ १८ ॥ जब तक सूर्य अस्त नहीं तब तक उच्छिष्ट को उठाके स्थान की शुद्धि न करे क्योंकि उस से अक्षय दूध की धारा पङ्क्तिभागी पितरों को प्राप्त होती हैं ॥ १९ ॥ पिण्ड बनाये अन्नका शेष लेप और ब्राह्मणों के भोजन का उच्छिष्ट ये दोनों उपनयन संस्कार होने से पहिले मरे अपने वंशवालों के भाग मनुजी ने कहे हैं ॥२०॥ पात्र में लिया वा भूमि पर गिरा उच्छेषणभाग को निर्वंश होकर कम आयु में मरों के अन्नको जल सहित प्रेतों के निमित्त छोड़े ॥ २१ ॥ दोनों ओर की अंगुलियों से छोड़े पितरों को निवेदन किये अन्न के पात्र में पहुंचने से पहिले दुष्ट विचार वाले असुर लोग बीच में मारखाने की प्रतीक्षा करते हैं ॥ २२ ॥ तिस से कुश हाथ में ले कर कुशों के सहारे से अन्न का निवेदन करे। अथवा भोजन का स्पर्श करके दोनों प्रकार के शेष

४२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

भोजनंवासमालभ्य तिष्ठेतोच्छेषणेउभे ॥ २३ ॥
द्वौदैवेपितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्रवा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि नप्रसज्येतविस्तरे ॥ २४ ॥
सत्क्रियां देशकालौच शौचं ब्राह्मणसम्पदः ।
पञ्चैतान्विस्तरोहन्ति तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥ २५ ॥
अपिवाभोजयेदेकं ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
श्रुतशीलोपसंपन्नं सर्वलक्षणवर्जितम् ॥ २६ ॥
यद्येकंभोजयेच्छ्राद्धे देवंतत्रकथंभवेत् ।
अन्नंपात्रे समुद्धृत्य सर्वस्यप्रकृतस्यतु ॥ २७ ॥
देवतायतनेकृत्वा ततःश्राद्धंप्रवर्त्तयेत् ।
प्रास्येदग्नौतदन्नंतु दद्याद्वाब्रह्मचारिणे ॥ २८ ॥
यावदुष्णंभवत्यन्नं यावदश्नन्तिवाग्यतः ।
तावद्धिपितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ताहविर्गुणाः ॥२९॥


भागों की यथास्थान रक्षा करे ॥२३॥ विश्वेदेव सम्बन्धी दो और तीन पितृ ब्राह्मणों को वा दोनों में एक २ ब्राह्मण को भोजन करावे । धनाढ्य हो तो भी अधिक विस्तृत पांति को भोजन कराने को तत्पर न हो ॥२४॥ क्योंकि सत्कार, देश, काल, शुद्धि और सुपात्र ब्राह्मणों का मिलना इन पांचों को बहुतों का भोजन कराना नष्ट करता है तिस से श्राद्ध में बड़ी पांति करने की चेष्टा न करे ॥२५॥ अथवा वेद पारंगत, शास्त्राभ्यासी, सौम्य स्वभाव युक्त, सब कुलक्षणों से रहित, धर्म कर्म निष्ठ एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में भोजन करावे ॥ २६ ॥ यदि एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे तो वही एक विश्वेदेवों और पितरों दोनों के लिये कैसे होगा ? । इसका समाधान यह है कि पकाये हुए सब अन्न में से विश्वेदेवों के निमित्त एक पात्र में अन्न परोस कर ॥ २७ ॥ किसी देवस्थान मन्दिरादि में सुरक्षित रख कर श्राद्ध करे पश्चात् उस विश्वेदेवों के भोजन को अग्नि में होम करदे वा किसी ब्रह्मचारी को देदेवे ॥ २८ ॥ जब तक भोजन गर्म रहता और जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण मौन हो कर भोजन करते हैं तथा जबतक भोज्य पदार्थों के गुण वर्णन नहीं कहेगये तभी तक ब्राह्मणों के साथ पितर लोग भोजन करते हैं ॥२९॥

भाषार्थसहिता ॥ ४३

हविर्गुणानवक्तव्याः पितरोयावदतर्पिताः ।
पितृभिस्तर्पितैःपश्चाद् वक्तव्यंशोभनं हविः ॥ ३० ॥
नियुक्तस्तुयदाश्राद्धे दैवेमांसंसमुत्सृजेत् ।
यावन्तिपशुरोमाणि तावन्नरकमृच्छति ॥ ३१ ॥
त्रीणिश्राद्धे पवित्राणि दौहित्रःकुतपस्तिलाः ।
त्रीणिचात्रप्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ ३२ ॥
दिवसस्याष्टमेभागे मन्दीभवतिभास्करः ।
सकालःकुतपोनाम पितॄणांदत्तमक्षयम् ॥ ३३ ॥
श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच मैथुनंयोऽधिगच्छति ।
भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंरेतसोभुजः ॥ ३४ ॥
यस्ततोजायतेगर्भो दत्त्वाभुक्त्वाचपैतृकम् ।
नसविद्यांसमाप्नोति क्षीणायुश्चैवजायते ॥ ३५ ॥


जबतक पितृगण तृप्त नहीं तबतक हविष्य भोज्य पदार्थों के गुण वर्णन न करे। पितरों के तृप्त होजाने पश्चात् कहे कि हविष्यान्न बहुत उत्तम बना है ॥ ३० ॥ जब श्राद्धमें निमन्त्रण स्वीकार करके यजमान के यहां किसी कारण मांस बनाया परोषा जाय और उस को त्याग देवे तो पशु के शरीर में जितने रोम होते उतने वर्षों तक नरक में वसता है ॥ ३१ ॥ श्राद्ध में तीन वस्तु विशेष पवित्र होते हैं एक दौहित्र (पुत्री का पुत्र) द्वितीय कुतप (दिन का आठवां भाग) और तिल। तथा शुद्धि, क्रोधका त्याग और शीघ्रता न करना ये तीनों ठीक २ करे तो प्रशंसा के योग्य श्राद्ध होगा ॥ ३२ ॥ दिन के आठवें भाग में चार घड़ी दिन शेष रहे सूर्य का तेज मन्द हो जाता है उस चार घड़ी काल को कुतप कहते हैं उस काल में पितरों के निमित्त श्राद्ध करने से अक्षय फल होता है ॥ ३३ ॥ श्राद्ध जिमाने वाला तथा जीमने वाला इन में से जो कोई श्राद्ध की समाप्ति में उसी दिन मैथुन करता है उस के पितर उस एक महीने तक वीर्य को खाने वाले होते हैं ॥ ३४॥ श्राद्ध में भोजन करने कराने वालों के उसी दिन किये मैथुन से जो सन्तान होता है वह विद्या को समाप्त नहीं कर पाता और थोड़ी आयु में नष्ट हो जाता है ॥ ३५ ॥

४४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

पितापितामहश्चैव तथैवप्रपितामहः ।
उपासतेसुतंजातं शकुन्ताइवपिप्पलम् ॥ ३६ ॥
मधुमांसैश्चशाकैश्च पयसापायसेनवा ।
एषनोदास्यतिश्राद्धं वर्षासुचमघासुच ॥ ३७ ॥
संतानवर्द्धनं पुत्र मुद्यतं पितृकर्मणि ।
देवब्राह्मणसंपन्नमभिनन्दन्तिपूर्वजाः ॥ ३८ ॥
नन्दन्तिपितरस्तस्य सुवृष्टैरिवकर्षकाः ।
यद्गयास्थोददात्यन्नं पितरस्तेनपुत्रिणः ॥ ३६ ॥
श्रावण्याग्रहायण्योरन्वष्टक्यां च पितृभ्यो दद्याद्
द्रव्यदेशब्राह्मणसन्निधाने वा, न कालनियमः ॥४०॥ अवश्यं च

पिता पितामह और प्रपितामह ये तीनों उत्पन्न हुए पुत्र के शरीर पर रहते हुए ऐसे ही वाट देखते हैं कि जैसे पीपल आदि वृक्षों पर रहते हुए पक्षी लगने वाले फलों की आशा रखते हैं ॥३६॥ कि सहत, मांस, शाक, दूध, खीर, वा खोया से यह सन्तान हमारे लिये पिण्ड देगा श्राद्ध करेगा। और विशेषकर वर्षा ऋतु के मघा नक्षत्र में दिया श्राद्ध विशेष सन्तोष जनक होता है ॥ ३७ ॥ देवता और ब्राह्मण से युक्त, पितरों के श्राद्धकर्म में उद्यत अपने कुल की सन्तति बढ़ाने वाले पुत्र को उनके पूर्वज लोग धन्यवाद देते हैं कि तू कुलतारक कुलदीपक कुल को तारनेवाला है ॥ ३८ ॥ जैसे अच्छी वर्षा होने से किसान लोग प्रसन्न ...न होते वैसे उस सुपुत्र के पितर लोग आनन्द मानते हैं । जो गया क्षेत्र ...कर पितृश्राद्ध करता है पितर लोग उससे अपने को पुत्रवाला मानते ... ॥ ३९ ॥ श्रावण तथा मार्ग शीर्ष महिने की पौर्णमासी, माघ कृष्ण पक्ष की तिथि वा आठ अन्वष्टका में पितरों का श्राद्ध करे । अथवा जब कभी श्राद्ध के यो-ग्य शास्त्रोक्त उत्तम स्थान और सुपात्र ब्राह्मण प्राप्त हों तभी श्राद्ध करे काल का नियम होने पर भी साधनों की ठीक २ प्राप्ति ही उत्तम कक्षा के श्राद्ध का ... है । इस कारण काल नियम से साधन संचय बलवान् है ॥ ४० ॥ ब्राह्मणा... अग्नियों का विधिपूर्वक स्थापन अवश्यमेव करे । दर्शेटि, पौर्ण-मासेष्टि, आग्रयण ( नवान्नेष्टि ) वैश्वदेवपर्व-वरुणप्रघासपर्व-साकमेधपर्व-

भावार्थसंहिता ॥ ४५

ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, दर्शपूर्णमासाग्रयणेष्टिचातुर्मास्यपशु- सोमैश्च यजेत नैयमिकं ह्येतदृणसंस्तुतं च ॥ ४१ ॥ विज्ञा- यते हि त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् ब्राह्मणो जायते । इति ॥ ४२ ॥ यज्ञेन देवेभ्यः, प्रजया पितृभ्यः, ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्य इत्येष वाऽनृणो यज्वा यः पुत्री ब्रह्मचर्यवानिति ॥ ४३ ॥ गर्भाष्ट- मेषु ब्राह्मणमुपनयीत, गर्भेकादशेषु राजन्यं, गर्भद्वादशेषु वै- श्यम् ॥४४॥ पालाशो बैल्वो वा दण्डो ब्राह्मणस्य, नैयग्रोधः क्षत्रियस्य वा, औदुम्बरो वा वैश्यस्य ॥४५॥ केशसंमितो ब्रा- ह्मणस्य, ललाटसंमितः क्षत्रियस्य, घ्राणसंमितो वैश्यस्य ॥४६॥ मौञ्जी रशना ब्राह्मणस्य, धनुर्ज्या क्षत्रियस्य, शणतान्तवी वै- श्यस्य ॥ ४७ ॥ कृष्णाजिनमुत्तरीयं ब्राह्मणस्य, रौरवं क्षत्रि-


शुनासीरीयपर्व ये चारों चातुर्मास्य, निरूढपशुयाग, और सोमयाग (अग्निष्टोम) इतने यज्ञ नियम से करे क्योंकि इन सबका करना ऋण चुकाने की प्रशंसा में परिगणित है ॥ ४१ ॥ श्रुति में लिखा है कि "द्विजत्व के संस्कार को प्राप्त हुआ ब्राह्मण तीन प्रकार के ऋणों से ऋणी हो जाता है,, ॥ ४२ ॥ यज्ञों के द्वारा देवों का, पुत्रोत्पत्ति द्वारा पितरों का, और ब्रह्मचर्याश्रम के नियम धर्म पालन द्वारा पितरों का ऋण चुकावे, यज्ञों का करनेवाला, पुत्रोंवाला और ब्रह्मचर्याश्रम युक्त होने पर तीनों ऋणों से मुक्त हुआ मोक्ष का पूर्णाधिकारी हो जाता है ॥ ४३ ॥ गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का, गर्भ से ग्यारहवें वर्ष क्षत्रिय का, और गर्भ से बारहवें वर्ष में वैश्य के बालक का उपनयन संस्कार करे ॥ ४४ ॥ पलाश (ढांक) का वा विल्व का दण्ड ब्राह्मण ब्रह्मचारी का, (वट बरगद) का क्षत्रिय ब्रह्मचारी का और गूलर का दण्ड वैश्य ब्रह्मचारी का होवे ॥ ४५ ॥ चोटी की बराबर ऊंचा ब्राह्मण का, मस्तक तक क्षत्रिय का और नासिका के मूल तक वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड रखना चाहिये ॥ ४६ ॥ मूंज की मेखला (कन्धनी) ब्राह्मण की, धनुर्ज्या क्षत्रिय की और शण की मेखला वैश्य ब्रह्मचारी के लिये होवे ॥४७॥ काला (कर्णायल) मृगचर्म ब्राह्मण को, रुरु (रोज) मृग का क्षत्रिय को और बैल वा बकरेका चर्म वैश्य ब्रह्मचारी को दुपट्टा के स्थान

४६ वसिष्ठस्मृतिः ॥

यस्य, गव्यं बस्ताजिनं वा वैश्यस्य ॥ ४८ ॥ शुक्लमहतं वासो ब्राह्मणस्य, माञ्जिष्ठं क्षत्रियस्य, हारिद्रं कौशेयं वैश्यस्य, सर्वे- षां वा तान्तवमरक्तम् ॥ ४९ ॥ भवत्पूर्वां ब्राह्मणो भिक्षां याचेत, भवन्मध्यां राजन्यो, भवदन्त्यां वैश्यः ॥ ५० ॥ आ- षोडशाद्ब्राह्मणस्य नातीतः कालः ॥ ५१ ॥ आद्वाविंशात्क्ष- त्रियस्य ॥५२॥ आचतुर्विंशाद्वैश्यस्य ॥५३॥ अतऊर्ध्वं पतितसा- वित्रीका भवन्ति ॥ ५४ ॥ नैतानुपनयेन्नाध्यापयेन्न याजये- न्नैभिर्विवाहयेयुः ॥ ५५॥ पतितसावित्रीक उद्दालकव्रतं चरे- त् ॥५६॥ द्वौ मासौ यावकेन वर्तयेत्, मासं पयसा, अर्धमासमा- मिक्षयाऽष्टरात्रं घृतेन, षड्रात्रमयाचितेन, त्रिरात्रमब्भक्षो


में ओढ़ने को देवे ॥४८॥ जो किसी थान में से फाड़ा न हो किन्तु चीरा सहित बिना हुआ सफेद वस्त्र ब्राह्मण का, मंजीठ से रंगा लाल वस्त्र क्षत्रिय का और हल्दी से रंगा पीला रेशमी वस्त्र वैश्य ब्रह्मचारी का हो अथवा तीनों ब्रह्म- चारियों को बिना रंगे कपास के वस्त्र दिये जावें ॥ ४९ ॥ ब्राह्मण ब्रह्मचारी (भवति! भिक्षां देहि) क्षत्रिय (भिक्षां भवति! देहि) और वैश्य ब्रह्मचारी (भि- क्षां देहि भवति!) ऐसा वाक्य बोल कर अपनी २ माता से प्रथम भिक्षा मांगे ॥ ५० ॥ सोलह वर्ष के आयु तक ब्राह्मण के उपनयन संस्कार का काल अतीत नहीं होता ॥५१॥ बाईस वर्षतक क्षत्रिय के संस्कार का काल है ॥५२॥ और चौबीस वर्ष तक वैश्य के संस्कार का समय है ॥ ५३ ॥ इस से उपरान्त तीनों ही अपने २ सावित्री गुरुमन्त्र से पतित हो जाते हैं ॥ ५४ ॥ तब उन पतित हुए ब्राह्मणादि का न यज्ञोपवीत संस्कार करावे, न वेद पढ़ावे, न यज्ञ करावे और न उन के साथ कन्या का विवाह करे ॥ ५५ ॥ वह पतित सावि- त्रीक ब्राह्मणादि पुरुष निम्न रीति से उद्दालक व्रत करे ॥५६॥ प्रथम दो महिने तक आठ ग्रास कुलत्थ खाताहुआ एकान्त में रहे। एक मास तक दूध से रहे पन्द्रह दिन तक आमिक्षा (गर्म दूधमें दही डालने से फटा दूध) से, आठ दिन गौ के घृत से, छः दिन तक बिन मांगे जो मिले उस से, तीनदिन तक जलमात्र पीकर और एक दिनरात निर्जल उपवास करे । इसप्रकार चार महीने तथा

भाषार्थसंहिता ॥ ४९

ऽहोरात्रमपुवसेत् ॥ ५७ ॥ अश्वमेधावभृथं वा गच्छेत् ॥५८॥ 
व्रात्यस्तोमेन वा यजेद्वायजेत् ॥ ५६ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

अथातःस्नातकव्रतानि ॥१॥ स न किंचिद्याचेतान्त्यत्र रा-
जान्तेवासिभ्यः ॥२॥ क्षुधा परीतस्तु किंचिदेव याचेत कृतमकृतं 
वा,क्षेत्रं गामजाविकमन्ततो हिरण्यं धान्यमन्नं वा,न तु स्ना-
तकः क्षुधाऽवसीदेदित्युपदेशः॥३॥ न मलिनवाससा सह संवसे-
त,न रजस्व Turn to: लया,नायोग्यया, नकुलं कुलं स्यात्॥४॥ वत्सतन्त्रीं-
विततान्नातिक्रामेत् ॥५॥ नोद्यन्तमादित्यं पश्येत् ॥ ६ ॥ ना-
स्तमयन्तम् ॥ ७ ॥ नाप्सु मूत्रपुरीषे कुर्यात् ॥ ८ ॥ न निष्ठीवे-
त् ॥ ६ ॥ परिवेष्टितशिरा भूमिमयज्ञियैस्तृणैरन्तर्धाय मूत्र-

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तीन दिन ( १२३ दिन ) एकान्त में भजन पूजन करता हुआ व्रत करे ॥५७॥ 
अथवा अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान के समय ब्राह्मणों की आज्ञा से सब 
के साथ स्नान करके शुद्ध होता है ॥ ५८ ॥ अथवा व्रात्यस्तोम यज्ञ करे ॥ ५९॥ 
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

अब ब्रह्मचर्य व्रत को समाप्त कर गृहस्थ होने वाले स्नातक के लिये नि-
यम कहते हैं ॥१॥ वह स्नातक राजा और अपने शिष्यों से भिन्न अन्य किसी 
से कुछ न मांगे ॥२॥ यदि क्षुधा से पीड़ित हो तो पकाया वा कच्चा थोड़ा अन्न 
मांगलेवे । अन्त में यदि कुछ न मिले तो खेत-गौ-बकरी-भेड़, सुवर्ण धान्य 
अन्न इत्यादि जो मिले मांग लेवे किन्तु भूखों मरता हुआ दुःख न भोगे यही 
उस के लिये शास्त्र का उपदेश है ॥ ३ ॥ मलिन वस्त्रोंवाली, रजस्वला और 
बाल्यावस्था की अयोग्य स्त्री के साथ सहवास ( संग ) न करे । नकुल को 
कुल ऐसा व्यवहार करे ॥ ४ ॥ विस्तृत फैली हुई बछड़े की रस्सी को लांघकर 
न निकले ॥ ५ ॥ उदय होते हुए सूर्य को न देखे ॥ ६ ॥ अस्त होते समय भी 
सूर्य को न देखे ॥ ७ ॥ जल में मल मूत्र का त्याग न करे ॥ ८ ॥ जल में न थूके 
॥ ९ ॥ शिर पर अंगोछा लपेट कर यज्ञ में काम न आनेवाले सूखे तृणों को

४८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

पुरीषे कुर्यात् ॥ १० ॥ उदङ्मुखश्चाहनि नक्तं दक्षिणामुखः सन्ध्यामासीतोत्तरामुदाहरन्ति ॥ ११ ॥ स्नातकानांतु नित्यंस्यादन्तर्वासस्तथोत्तरम् । यज्ञोपवीतेद्वेयष्टिः सोदकञ्चकमण्डलुः ॥ १२ ॥ अप्सुपाणौचकाष्ठेच कथितःपावकःशुचिः । तस्मादुदकपाणिभ्यां परिमृज्यात्कमण्डलुम् ॥ १३ ॥ पर्यग्निकरणंह्येतन्मनुराहप्रजापतिः । कृत्वाचावश्यकर्माणि आचामेच्छौचवित्तमः । इति ॥१४॥ प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत ॥१५॥ तूष्णीं साङ्गुष्ठं कृत्स्नग्रासंग्रसेत् ॥ १६ ॥ न च मुखशब्दं कुर्यात् ॥ १७ ॥ ऋतुकालाभिगामी स्यात् पर्ववर्जं स्वदारेषु ॥१८॥ अतिर्यगुपेयात्॥१९॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ २० ॥


भूमि पर बिछाकर उन पर मल मूत्र का त्याग करे ॥१०॥ दिन में उत्तर को और रात्रि में दक्षिण को मुख करके मल मूत्र त्याग करे। सन्ध्याओं के समय भी उत्तर को मुख कर मलमूत्र त्यागे ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥११॥ स्नातक पुरुषों के एक भीतरी और दूसरा ऊपरी वस्त्र नित्य ( प्रत्येक समय ) साथ रहे। दो यज्ञोपवीत धारण करे, एक बांस की छड़ी और जल सहित एक कमण्डलु भी साथ रक्खे ॥१२॥ जल में, हाथ में, और काष्ठ में पवित्र अग्नि व्याप्त कहा है तिस से जल सहित हाथों से कमण्डलु को शुद्ध करे ॥ १३ ॥ प्रजापति मनु जी ने इस कृत्य को पर्यग्निकरण कर्म कहा है। अवश्य कर्त्तव्य कर्मों को करने बाद शौच धर्म का तत्त्व जानने वाला ब्राह्मण आचमन कियाकरे ॥१४॥ पूर्व को मुख करके भोजन किया करे ॥ १५ ॥ मौन होके भोजन करे। अङ्गुष्ठ सहित पूरा ग्रास मुख में दिया करे ॥ १६ ॥ भोजन करते समय मुख से ( चप चप आदि ) शब्द न करे ॥ १७ ॥ अमावास्या अष्टमी पौर्णमासी चतुर्दशी इन पर्वतिथियों को छोड़ के ऋतु काल में अपनी विवाहिता पत्नी से संग करे ॥ १८ ॥ तिरछा होकर संग न करे किन्तु सीधा बैठ के करे ॥ १९ ॥ यहां श्लोक भी प्रमाण में कहते हैं कि ॥२०॥ जो पुरुष अपनी विवा-

भाषार्थसहिता ॥ ४९

यस्तुपाणिगृहीताया आस्येकुर्वीतमैथुनम् । भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंरेतसोभुजः ॥ २१ ॥ यास्यादनित्यचारेण रतिःसाऽधर्मसंश्रिता ॥ २२ ॥ अपि च काठके विज्ञायते ॥२३॥ अपि नः श्वोविजनेष्यमा- णाः पतिभिः सह शयीरन्निति स्त्रीणामिन्द्रदत्तो वर इति ॥२४॥ न वृक्षमारेहेत् ॥२५॥ न कूपमवरोहेत् ॥२६॥ नाग्निं मुखेनो- पधमेत् ॥२७॥ नाग्निं ब्राह्मणं चान्तरेण व्यपेयात् ॥२८॥ ना- ग्न्योर्न ब्राह्मणयोरननुज्ञाप्य वा भार्य्यया सह नाश्नीयाद्वी- र्य्यवदपत्यं भवतीति वाजसनेयके विज्ञायते ॥ २९ ॥ नेन्द्र- धनुर्नाम्ना निर्द्दिशेत् ॥ ३० ॥ मणिधनुरिति ब्रूयात् ॥ ३१ ॥ पालाशमासनं पादुके दन्तधावनमिति वर्जयेत् ॥ ३२ ॥ नो- त्संगे भक्षयेन्न सन्ध्यायां भुञ्जीत ॥३३॥ वैणवं दण्डंधारयेद्रुक्म-


हित पत्नी के मुख में मैथुन करे उस के पितर उस एक महिने तक उस का वीर्य खाने वाले होते हैं ॥ २१ ॥ जो उपस्थेन्द्रिय से भिन्न अन्य मार्ग में रति करे वह अधर्म सम्बन्धी कर्म है ॥ २२ ॥ और भी वेद की कठ शाखा में लिखी श्रुति से जाना जाता है कि ॥ २३ ॥ कल बालक पैदा होगा और आज एक दिन पहिले स्त्रियां पतियों के साथ शयन करें यह स्त्रियों को इन्द्रदेवता ने वरदान दिया है ॥ २४ ॥ स्नातक गृहस्थ वृक्ष पर न चढ़े ॥ २५ ॥ कूप में न घुसे ॥ २६ अग्नि को मुख से न फूंके ॥ २७ ॥ अग्नि और ब्राह्मण को छोड़के वा अनादर करके कोई काम न करे ॥२८॥ स्वीकार कराये बिना अग्नियों और ब्राह्मणों के मध्य में पत्नी के साथ भोजन न करे। ऐसा करने से निर्बल पराक्रम हीन सन्तान होता है यह वाजसनेय श्रुति से जाना जाता है ॥ २९ ॥ इन्द्रधनुः ऐसा नाम लेकर किसी को न दिखावे ॥ ३० ॥ किन्तु उस को 'मणिधनुः' ऐसा कहे ॥ ३१ ॥ ढांक का लकड़ी का पट्टा चौकी, खड़ाऊं, और दातौन न बनावे ॥ ३२ ॥ गोदी में अन्न को धर के वा मातादि की गोदी में बैठकर तथा सन्ध्या के समय भोजन न करे ॥ ३३ ॥ बांस की छड़ी और सु-

५० वसिष्ठस्मृतिः ॥

कुण्डले च ॥३४॥ न बहिर्मालां धारयेदन्यत्र रुक्ममय्याः३५ सभा समवायांश्च वर्जयेत् ॥ ३६ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥३७॥

अप्रामाण्यंचवेदानामार्षाणांचैवकुत्सनम् । अव्यवस्थाचसर्वत्र एतन्नाशनमात्मनः । इति ॥ ३८ ॥

नावृतो यज्ञं गच्छेत् ॥ ३९॥ यदि व्रजेत्प्रदक्षिणं पुनरा- व्रजेत् ॥४०॥ अधिवृक्षसूर्यमध्वानं न प्रतिपद्येत ॥४१॥ नावं च सांशयिकीं नाधिरोहेत् ॥४२॥ बाहुभ्यां न नदीं तरेत् ॥४३॥ उत्थायापररात्रमधीत्य न पुनः प्रतिसंविशेत् ॥४४॥ प्राजापत्ये मुहूर्त्ते ब्राह्मणः कांश्चिन्नियमाननुत्तिष्ठेदनुत्तिष्ठेदिति ॥४५॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

अथातः स्वाध्यायोपाकर्म्म श्रावण्यां पौर्णमास्यां प्रौष्ठ- पद्यां वाऽग्निमुपसमाधाय कृताधानो जुहोति देवेभ्य ऋषिभ्य-


वर्णके कुण्डल नित्य धारण करे ॥ ३४ ॥ सुवर्ण को छोड़कर अन्य पुष्पादि की माला बाहर केशादि में न धारण करे किन्तु कण्ठ में भले ही धारण करे ॥ ३५॥ मनुष्यों की सभादि भीड़ में न जावे ॥३६ ॥ यहां श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥ ३७ ॥ वेदों का प्रमाण न मानना, ऋषि प्रोक्त धर्मशास्त्रादि की निन्दा करना, किसी बात पर स्थिर न रहना ये आत्मा नाम अपने नाश के लक्षण हैं ॥३८॥ वरण किये विना किसी के यज्ञ में न जावे ॥३९॥ यदि जावे तो प्रदक्षिणा ( परिक्रमा ) करिके लौट आवे ॥ ४० ॥ वृक्ष पर चढ़ के सूर्य को न देखे और सूर्य के सामने मार्ग में न चले ॥ ४१ ॥ डूबने वा टूटने के सन्देह वाली नौका पर न चढ़े ॥ ४२ ॥ भुजाओं के द्वारा तर के नदी के पार न जावे वा नदी को न तरे ॥ ४३ ॥ आधी रात के पश्चात् उठ कर वेदादि का पाठ करके फिर न सोवे ॥ ४४ ॥ ब्राह्ममुहूर्त्त अर्थात् चार घड़ी रात रहे से ब्राह्मण किन्हीं शौच स्नान सन्ध्योपासनादि नियमों का अनुष्ठान अवश्य करे यह न बने तो किसी प्रकार प्रातःस्मरणादि ही करे ॥ ४५ ॥

यह वासिष्ठ धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में बारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

अब वेदाध्ययन के उपाकर्म का विचार दिखाते हैं । श्रावण वा भादों की पौर्णमासी को जिस ने अग्नियोंका विधि पूर्वक आधान किया हो वह पुरुष अपने सामने अग्नि को स्थापन करके आघारादि सामान्य विधि

भाषार्थसहिता ॥ ५१

छन्दोभ्यश्चेति ॥ १ ॥ ब्राह्मणान्स्वस्तिवाच्य दधि प्राश्य ततोऽध्यायानुपाकुर्वीरन् ॥ २ ॥ अर्धपञ्चममासानर्द्ध-षष्ठान्वाऽतऊर्ध्वं शुक्लपक्षेष्वधीयीत कामं तु वेदाङ्गानि ॥३॥

तस्यानध्यायाः ॥ ४ ॥ संध्यास्तमिते सन्ध्यास्वान्तःशवदिवाकीर्त्येषु नगरेषु कामं गोमयपर्युषिते परिलिखिते वा श्मशानान्ते शयानस्य श्राद्धिकस्य ॥ ५ ॥ मानवं चात्र श्लोकमुदाहरन्ति ॥ ६ ॥

फलान्यापस्तिलान्भक्ष्यान्यच्चान्यच्छ्राद्धिकंभवेत् । प्रतिगृह्याप्यनध्यायः पाण्यास्या ब्राह्मणाः स्मृताः।इति॥७॥

धातवः पूतिगन्धप्रभृताविरिणे, वृक्षमारूढस्य नावि सेनायां च भुक्त्वा चाऽऽर्द्रपाणेर्वाणशब्दे चतुर्दश्याममावास्या-


पूर्वक देवों ऋषियों और छन्दों के नाम से प्रधान आहुति करे ॥ १ ॥ ब्राह्मणों का स्वस्ति वाचन करा और दधि प्राशन करके अध्यायों का उपाकरण (प्रारम्भ) करें ॥२॥ साढ़ेचार वा साढ़ेपांच महिने निरन्तर वेदाध्ययन करके पश्चात् उत्सर्ग करके शुक्ल पक्षों में वेदों को और वेदाङ्गों को शुक्लकृष्ण दोनों पक्षों में यथेच्छ पढ़ाकरे ॥३॥ उस वेद के अनध्याय ये निम्न लिखित हैं ॥४॥ सायं प्रातः काल में सूर्यनारायण के अस्त होते वा उदय होते समय, गांव वा मुहल्ले में मुर्दा के विद्यमान होते, चाण्डालादि के समीप, और नगरों के भीतर वेद को न पढ़े। पहिले दिन का गोबर पड़ा होने, वा सब ओर खोदी भूमि पर रुचि हो तो पढ़े । श्मशान में वा श्मशान के समीप वेद को न पढ़े । लेटा हुआ, श्राद्ध करने बाद वा श्राद्ध में भोजन करके भी न पढ़े ॥५॥ यहां मनु जी का श्लोक प्रमाण में कहते हैं कि ॥६॥ फलों, जल, तिलों तथा भक्ष्य पदार्थों का और श्राद्ध सम्बन्धी वस्तु का दान लेकर वेद को न पढ़े क्योंकि हाथ ही जिनका मुख है ऐसे ब्राह्मण माने गये हैं ॥ ७ ॥ शरीर के धातु रुधिरादि के निकलने पर अथवा वात पित्त कफ के कोप में, दुर्गन्धादि से घृणित स्थान में, ऊषर भूमि में, वृक्ष पर चढ़के, नौका में बैठा हुआ, भोजन करके, गीले हाथ होने पर, बाण का शब्द होने पर, चतुर्दशी, अमावस्या, अष्टमी, अष्टका, गांठों को आसन पर लगा के,

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५२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

यामष्टम्यामष्टकासु प्रसारितपादोपस्थकृतस्योपाश्रितस्य च गुरुसमीपे मैथुनव्यपेतायां वाससा मैथुनव्यपेतेनानिर्णिंक्तेन ग्रामान्ते छर्दितस्य मूत्रितस्योच्चारितस्य ऋग्यजुषां च सामशब्दे वाऽजीर्णे निर्घाते भूमिचलने चन्द्रसूर्योपरागे दिङ्नादपर्वतनादकम्पपातेषूपलरुधिरपांशुवर्षेष्वाकालिकम् ॥ ८ ॥ उल्काविद्युत्स्रमासे त्रिरात्रम् ॥ ९ ॥ उल्काविद्युत्सज्योतिषम् ॥ १०॥ अपर्त्तावाकालिकमाचार्ये प्रेते त्रिरात्रमाचार्य्यपुत्रशिष्यभार्यास्वहोरात्रम् ॥११॥ ऋत्विग्योनिसंबन्धेषु च गुरोः पादोपसंग्रहणं कार्यम् ॥ १२ ॥ ऋत्विक्श्वशुरपितृव्यमातुलाननवरवयसः प्रत्युत्थायाभिवदेत् ॥ १३ ॥ येचैव

किसी की गोदी में बैठकर, गुरु जनों के समीप में, मैथुन किये आसन वा शय्या पर, वा मैथुन कर चुकी स्त्री के निकट, मैथुन करने समय के वस्त्र पहन के, ग्राम के समीप, वमन करने पर, मल मूत्र त्याग के बाद शुद्धि किये बिना, वेद को न पढ़े । सामवेद की उच्च ध्वनि होने पर ऋग्वेद यजुर्वेद को न पढ़ें। आकाश में शब्द होने पर, भूमि के चलने पर, चन्द्रग्रहण वा सूर्यग्रहण के समय, दिशाओं में वा पर्वत में गूंजने का शब्द हो वा पर्वत कांपे, वा पर्वत का कुछ भाग गिरे, पत्थर, रुधिर, तथा धूलिवर्षने पर इन सब हालतों में एक दिन रात वेद का अनध्याय रक्खे ॥ ८ ॥ उल्कापात और बिजली का गिरना साघर हो तो तीन दिन वेद न पढ़े ॥ ९ ॥ और उल्कापात वा बिजली का प्रबल भयंकर शब्द होने पर उसी दिन धारात भर का अनध्याय करे ॥ १० ॥ उल्कापात वा बिजली का शब्द वर्षा से भिन्न ऋतु में होतो एक दिन रात (उपद्रव के समय से अगले दिन उसी समय तक) अनध्याय करे। गुरु का स्वर्गवास होने पर तीन दिन तथा गुरु के पुत्र शिष्य और गुरुपत्नी के मरने पर एक दिन रात वेद न पढ़े ॥ ११ ॥ ऋत्विज् तथा मामा श्वशुरादि के मरने पर भी एक दिन रात का अनध्याय करे । ऋत्विज् या श्वशुरादि में भी जो गुरु हो अर्थात् जिस के पास वेदादि पढ़ा हो तो उस के पगों को छूना चाहिये ॥ १२ ॥ ऋत्विज, श्वशुर, चाचा, मामा, ये सब अपने से अधिक आयु के हों तो उन को आता देख के खड़ा हो जाय और अभिवादन करे ॥१३॥ जिन के

पादग्राह्यास्तेषां भार्या गुरोश्च मातापितरौ यो विद्यादभि-

भाषार्थमहिमा ॥ ५३

पादग्राह्यास्तेषां भार्या गुरोश्च मातापितरौ यो विद्यादभि- वन्दितुमहंमयंभोइति ब्रूयाद्यश्च न विद्यात् प्रत्यभिवाद- ममन्त्रिते स्वरोऽन्त्यः प्लवते सन्ध्यक्षरमप्रगृह्यमायावाभावं चाऽऽपद्यते यथा भो भाविति ॥ १४ ॥ पतितः पिता त्याज्यो माता तु पुत्रे न पतति ॥ १५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १६ ॥ उपाध्यायाद्दशाऽऽचार्य आचार्याणांशतंपिता । पितुर्दशशतंमाता गौरवेणातिरिच्यते ॥ १७ ॥ भार्याःपुत्राश्चशिष्याश्च संसृष्टाःपापकर्मभिः । परिभाष्यपरित्याज्याः पतितोयोऽन्यथात्यजेत् ॥१८॥ ऋत्विगाचार्यावयाजकानध्यापकौ हेयावन्यत्र हाना-


पग छूने उचित हैं उन की स्त्रियों को भी अभिवादन करे और गुरु के माता पिता को भी अभिवादन करे। जो (वैयाकरण होने से) अभिवादन करना जानता हो वह (अभिवादये देव शर्माऽहंभोः) ऐसा कहे। और जो पुरुष अभिवादन के प्रत्युत्तर (जिस के सम्बोधन में अन्त्य स्वर प्लुत होता और प्रगृह्य संज्ञा न होने पर एकार ओकारादि सन्ध्यक्षर को अय् आव् आदेश होता है जैसे भो इति। भाविति) को नहीं जानता उस मान्य को भी शास्त्र विधि से अभिवादन न करे किन्तु लोक भाषा में बोलकर पाद स्पर्श कर लेवे ॥ १४ ॥ पतित हुए पिता को पुत्र त्याग देवे परन्तु पुत्र के लिये माता पतित नहीं होती अर्थात् पतित हुई माता की भी भोजन वस्त्रादि देके पुत्र रक्षा वा सेवा करता रहे ॥१५॥ यहां श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि॥१६॥ अध्यापक वा उपाध्याय से दश गुणी मान प्रतिष्ठा आचार्य की, आचार्य से सौ गुणा मान्य पिता का और पिता से हजार गुणा मान्य माता का करना चाहिये और इस से भी जितना अधिक गौरव माता का करे सो सब उचित ही जानो ॥ १७ ॥ स्त्री पुत्र और शिष्य लोग यदि विशेष कर पाप कर्मों से युक्त हों तो उन से कहदे (नोटिस दे देवे) कि तुम लोग अब आगे ऐसा मत करो तथा पिछले किये का प्रायश्चित्त करलो ऐसा सुना देने पर भी न मानें तो उन को त्याग देवे। बिना सुनाये त्यागे तो त्यागने वाला भी पतित हो जाता है ॥ १८ ॥ ऋत्विज् यज्ञ न करासके वा किसी कारण से न

५४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

त्पतति ॥ १९॥ पतितोत्पन्नः पतितो भवतीत्याहुरन्यत्र स्त्रियाः ॥ २०॥ सा हि परगामिनी तामरिक्थामुपेयात् ॥ २१ ॥
गुरोर्गुरौसन्निहिते गुरुवद्वृत्तिरिष्यते ।
गुरुवद्गुरुपुत्रस्य वर्तितव्यमिति श्रुतिः ॥ २२ ॥
शस्त्रं विषं सुरा चाप्रतिग्राह्याणि ब्राह्मणस्य ॥ २३॥ विद्या वित्तं वयः संबन्धः कर्म च मान्यम् ॥२४॥ पूर्वः पूर्वो गरीयान् स्थविरबालातुरभारिकस्त्रीचक्रिवतां पन्थाः समागमे परस्मै देयः ॥ २५ ॥ राजस्नातकयोः समागमे राज्ञा स्नातकाय देयः ॥ २६ ॥ सर्वैरेव च वध्वा उह्यमानायै ॥ २७ ॥ तृणभूम्यम्बूदकवाक्सूनृतानसूयाः सतां गृहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन कदाचनेति ॥ २८ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥


करावे तथा जो आचार्य वेद को न पढ़ावे उन दोनों को त्याग देना चाहिये। न त्यागे तो पतित हो जाता है ॥ १९ ॥ पतित से उत्पन्न हुआ भी पुत्री को छोड़ कर पतित होता है ऐसा ऋषि लोग कहते मानते हैं ॥ २० ॥ वह स्त्री पतित को प्राप्त हुई इस से उसके साथ के वस्त्राभूषणादि धन को त्याग के केवल कन्या को स्वीकार करे ॥ २१ ॥ गुरु के गुरु भी समीपस्थ हों तो उन के साथ गुरु कासा बर्त्ताव करे और गुरुपुत्र के साथ भी गुरु के तुल्य बर्त्ताव करे ॥ २२ ॥ शस्त्र, विष और मद्य इन को ब्राह्मण दान में न लेवे ॥ २३ ॥ विद्या, कर्म, अवस्था, कुटुम्ब, और धन ये पांच मान्य के स्थान हैं ॥ २४ ॥ इन में पर २ की अपेक्षा पूर्व २ को अधिक मान्य करे। वृद्ध, बालक, रोगी, बोझावाला, स्त्री और गाड़ीवाला इन का समागम होने पर पिछले २ के लिये रास्ता देना चाहिये ॥ २५ ॥ राजा और स्नातक के समागम में राजा स्नातक के लिये मार्ग छोड़े ॥ २६ ॥ तत्काल विवाह हो कर आई बहू के लिये सभी वृद्धादि मार्ग छोड़ें ॥ २७॥ कुशासन या चटाई, भूमि, अग्नि, जल, कोमल वाणी, निन्दा का त्याग, सत्पुरुषों के घर में इन आसनादि मिलने का कदापि अभाव नहीं होता अर्थात् जिन के घर पर आये हुये का आसनादि मिलने द्वारा अवश्य सत्कार हो, वे ही सत्पुरुष हैं ॥ २८ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ५५

अथातो भोज्याभोज्यं च वर्णयिष्यामः ॥१॥ चिकित्सक- मृगयुपुंश्चलोदण्डिकस्तेनाभिशस्तषण्डपतितानामन्नमभो- ज्यम् ॥ २ ॥ कदर्यदीक्षितबद्धातुरसोमविक्रयितक्षकरजक- शौण्डिकसूचकवार्धुषिकचर्मावकृत्तानां शूद्रस्य चास्त्रभृत स्त्रीष्वपतेर्यश्चोपपतिं मन्यते, यश्च गृहान्दहेत् यश्च वधार्हं नोपहन्द्यात्, को भक्षयत इति ॥ ३ ॥ वाचाभिघुष्टं गणान्नं गणिकान्नं चेति ॥४॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५ ॥ नाश्नन्ति श्ववतोदेवा नाश्नन्तिवृषलीपतेः । भार्याजितस्यनाश्नन्ति यस्यचोपपतिर्गृहे । इति ॥ ६ ॥ एधोदकयवसकुशलाजाभ्युद्यतयानावसथसफरीप्रियङ्गु स्रगन्धमधुमांसानीत्येतेषां प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७ ॥ अथाप्यु- दाहरन्ति ॥ ८ ॥


अब इस चौदहवें अध्याय में भक्ष्याभक्ष का विचार दिखाते हैं ॥१॥ वैद्य, व्याधा, व्यभिचारिणी स्त्री, लाठी आदि से पशु हत्या करने वाला, चोर, निन्दित, नपुंसक और पतित इन सबका अन्न अभक्ष्य है ॥ २ ॥ कंजूस, दीक्षित, कदी, रोगी, सोम बेंचने वाला, बढ़ई, धोबी, मद्य बनाने बेंचने वाला कलवार, चुगल, ब्याज लेनेवाला-सूदखोर, शूद्र, अस्त्रधारी, जो अन्य जीवित पुरुष की पत्नी से संग करता हो, जो अपनी स्त्री के जार को मानता ( स्वीकार करता ) हो, जो घरों में आग लगावे, और जो वध करने योग्य को न मारडाले, इन का अन्न कोई न खावे ॥ ३ ॥ वाणी से निन्दित, चन्दा का, और वेश्या का अन्न भी अभक्ष्य है ॥४॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥५॥ कुत्ता पालने वाले, वेश्यागामी, स्त्री की आज्ञा में चलने वाले, अर्थात् जिनको स्त्री ने जीत लिया हो और जिस की स्त्री का दूसरा पति जार पुरुष हो इन सब के होमादि को देवता लोग ग्रहण नहीं करते ॥ ६ ॥ ईंधन, जल, भूसा, कुश, धान वा खीलें, नये बने हुए-सवारी, घर, मछली, कंगुनी, माला, चांवल, शहद, और मांस इन पदार्थों को वैद्यादि निन्दितों सेभी लेलेवे ॥७॥ इस विषय में श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥८॥ माता पितादि मान्य और स्त्री पुत्रादि दुःखित हों तो उन के निर्वाहार्थ और देवता तथा अतिथियों के

५६ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

गुरून्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन्देवतातिथीन् । सर्वतःप्रतिगृह्णीयान्नतुतृप्येत्स्वयंततः । इति ॥ ६ ॥ न मृगयोरिषुचारिणः परिवर्ज्यमन्नम् ॥ १०॥ विज्ञायते ह्यगस्त्यो वर्षसाहस्रिके सत्रे मृगयां चकार, तस्याऽऽसंस्तु रस- मयाः पुरोडाशा मृगपक्षिणां प्रशस्तानाम् ॥११॥ अपि ह्यत्र प्राजापत्याञ् श्लोकानुदाहरन्ति ॥ १२ ॥ उद्यतामाहृतांभिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् । भोज्यां प्रजापतिर्मेने अपिदुष्कृतकारिणः ॥ १३ ॥ श्रद्दधानैर्नभोक्तव्यं चोरस्यापिविशेषतः । नत्वेवबहुयाज्यस्य यश्चोपनयतेबहून् ॥ १४॥ नतस्यपितरोऽश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्चच । नचहव्यंवहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ १५ ॥ चिकित्सकस्यमृगयोः शल्यहस्तस्यपापिनः ।


पूजन के लिये सब किसी से अन्न को ग्रहण करले परन्तु उसको स्वयं न खावे तो दोष नहीं लगता है ॥९॥ धनुष बाण लेकर विचरने वाले व्याध का अन्न वर्जित नहीं ॥ १० ॥ क्योंकि शास्त्रों में लिखा है कि अगस्त्य ऋषि ने हजार वर्ष के सत्र यज्ञ में प्रशस्त मृगों और पक्षियों की शिकार की, उस के रस रूप पुरोडाश बनाये गये । ( यह किन्हीं का मत है । अगस्त्य महर्षि ने तपो बल के प्रभाव से दोष को नष्ट किया इस से साधारण व्याध के अन्न में कुछ दोष रहेगा । इस कारण दशवां सूत्र एक देशी मत जानो )॥ ११ ॥ इस भक्ष्या भक्ष्य विषय में प्रजापति के कहे श्लोक कहते हैं कि॥ १२॥ दाता ने पहिले से न कहा हो कि अमुक वस्तु तुम को मैं दूंगा और अकस्मात् बिना मांगे लाकर सामने धर दे तो ऐसी भिक्षा दुष्कर्मी पुरुष की भी भोजन वा ग्रहण करने योग्य है ॥ १३ ॥ धर्म में श्रद्धा रखने वाले ब्राह्मणों को चोरों का, एक साथ बहुतों को यज्ञ कराने तथा एक साथ बहुतों का उपनयन कराने वाले का अन्न नहीं खाना चाहिये ॥ १४ ॥ जो पुरुष उस अकस्मात् आयी पूर्वोक्त भिक्षा का तिरस्कार करता है उस के श्राद्ध को पितर लोग १५ पन्द्रह वर्ष तक स्वीकार नहीं करते और उस के हविष्यांश को अग्नि देवताओं में नहीं पहुंचाता ॥ १५ ॥ वैद्य, व्याधा, भाला व शूल हाथ लिये पापी

भाषार्थसहिता ॥ ५७

षण्डस्यकुलटायाश्च उद्यतापिनगृह्णतइति ॥ १६ ॥

उच्छिष्टमगुरोर्भोज्यं, स्वमुच्छिष्टोपहतं च ॥ १७ ॥ यदशनं केशकीटोपहतं च ॥१८॥ कामं तु केशकीटानुद्धृत्याद्भिः प्रोक्ष्य भस्मनाऽवकीर्य वाचा प्रशस्तमुपभुञ्जीत ॥१९॥ अपिह्यत्र प्राजापत्यान् श्लोकानुदाहरन्ति ॥ २० ॥

त्रीणिदेवाःपवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्चवाचाप्रशस्यते ॥ २१ ॥
देवद्रोण्यांविवाहेषु यज्ञेषुप्रकृतेषुच ।
काकैःश्वभिश्चसंस्पृष्टमन्नंतन्नविसर्जयेत् ॥ २२॥
तस्मादन्नमुद्धृत्य शेषंसंस्कारमर्हति ।
द्रवाणांप्लावनेनैव घनानांप्रोक्षणेनतु ।


हत्यारा, हिजड़ा, और व्यभिचारिणी स्त्री इन की अकस्मात् आयी भिक्षा को भी ग्रहण न करे ॥ १६ ॥ गुरु से भिन्न का उच्छिष्ट, अपना उच्छिष्ट और जिस में उच्छिष्ट का मेल हो गया हो ऐसा अन्न अभक्ष्य है ॥ १७ ॥ जिस भोजन में बाल वा कीड़ा पड़ गये हों वह भी अभक्ष्य है ॥ १८ ॥ जिस में बालादि पड़गये उस में से बालों और कीड़ों को निकाल कर जल सेचन कर भस्म विखेर के वाणी से मन्त्रों ( पितुंनुस्तोषं २ ) द्वारा अन्नस्तुति किये अन्न को भले ही खावे तब दोष नहीं लगता है ॥ १९ ॥ और भी प्रजापति के कहे श्लोकों का उदाहरण देते हैं कि ॥२०॥ देवता लोगों ने ब्राह्मणों के लिये तीन प्रकार के पदार्थ पवित्र कहे हैं-एक जिस में बिना देखी जानी कोई अशुद्धि हो,द्वितीय मन्त्र पूत जल से वा धोने आदि द्वारा जो पवित्र किया गया हो और तीसरा वाणी से जिस की प्रशंसा की गयी हो ॥ २१ ॥ देव द्रोणी अर्थात् दश सेर आदि के भोजन से जहां देव पूजा की जाय, विवाहों में तथा अन्य यज्ञों में बहुत से पकाये अन्न के ढेर में कौवा वा कुत्ता मुख लगा देवें तो उस अन्न का त्याग न करे ॥ २२ ॥ किन्तु उस में से उच्छिष्टांश अन्न को निकाल कर शेष अन्न की शुद्धि कर लेवे । यदि पतले कढ़ी आदि हों तो हिलोराने से, कड़े रोटी पूरी आदि की कुशों द्वारा मार्जन से शुद्धि होती है । और बिल्ली का

५८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

मार्जारमुखसंस्पृष्टं शुचिरेवहितद्भवेत् ॥ २३ ॥
अन्नं पर्युषितं भावदुष्टं सकृल्लेखं पुनःसिद्धमाममांसं पक्वं च कामं तु दध्ना घृतेनाभिघारितमुपयुञ्जीत ॥ २४ ॥ अपि-
ह्यत्र प्राजापत्यान् श्लोकानुदाहरन्ति ॥ २५ ॥
हस्तदत्तास्तुयेस्नेहा लवणव्यञ्जनानि च ।
दातारंनोपतिष्ठन्ति भोक्ताभुङ्क्तेचकिल्विषम् ॥ २६ ॥
प्रदद्यान्नतुहस्तेन नाऽऽयासेनकदाचन, इति ॥ २७ ॥
लशुनपलाण्डुकवकगृञ्जनश्लेष्मातकवृक्षनिर्या सलोहितव्रश्चनश्वकाकावलीढशूद्रोच्छिष्टभोजनेषु कृच्छ्रातिकृच्छ्रइतरेष्व-
न्यत्र मधुमांसफलविकर्षेष्वग्राम्यपशुविषयः ॥२८॥ संधिनी-
क्षीरमवत्साक्षीरं गोमहिष्याजानामनिर्दशाहानमन्तर्नाव्यु-


मुख भोज्यान्न में लग गया होतो वह अन्न शुद्ध ही है ॥ २३ ॥ बासी पहिले दिन का धरा हुआ, जिस में ग्लानि वा शंका हो गयी हो, एक बार किसी जान वरने पंजा मार दिया हो, फिर से पकाया, कच्चा मांस, वा पकाया मांस ये सब अभक्ष्य हैं । परन्तु बासे घरे हुये अन्नादि को दही वा घी से संस्कार करके भले ही खालेवे ॥ २४ ॥ और भी यहां प्रजापति के श्लोक उदाहरण में कहते हैं कि ॥२५॥ घी आदि स्नेह, लवण और दही आदि व्यञ्जन ये सब हाथ पर दिये जांय तो देने वाले को दुर्लभ हो जाते और इन को खाने वाला पाप को खाता है अर्थात् भोजन करते हुये को लवण घृतादि हाथ पर नहीं देने चाहिये किन्तु पात्र वा पत्तल पर धर देवें ॥२६॥ और देने वाला भी उक्त पदार्थों को हाथ से न देवे और लोभ में आकर कष्ट मानता हुआ भी कदापि दान न देवे ॥२७॥ लहसन, प्याज, कठफून, गाजर, शलगम, लसोढ़ा, (लभेडा) वृक्षों का गोंद, लाल गोंद, वृक्षों के गोदने से निकला रस वा दूध, कुत्ते कौवे का चाटा हुआ अन्नादि, और शूद्र का उच्छिष्ट इन सब को खालेने पर कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत करे तथा शहद मांस और जिन से फलों की हानि हो ऐसे वृक्षों के फूल वा कली आदि को छोड़ के अन्य अभक्ष्यों में भी यही कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत जानो और वह मांस ग्राम के पशुओं से भिन्न जंगल का जानों ॥ २८ ॥ गाभिन गौ का, जिस का बच्छा मर गया हो, सद्या गौ भैंसि बकरी का व्याने पर दश दिन के भीतर का दूध, नौका का जल, ये सब अभक्ष्य हैं । पुन्ना,