अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 738, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
पुरीषे कुर्यात् ॥ १० ॥ उदङ्मुखश्चाहनि नक्तं दक्षिणामुखः सन्ध्यामासीतोत्तरामुदाहरन्ति ॥ ११ ॥ स्नातकानांतु नित्यंस्यादन्तर्वासस्तथोत्तरम् । यज्ञोपवीतेद्वेयष्टिः सोदकञ्चकमण्डलुः ॥ १२ ॥ अप्सुपाणौचकाष्ठेच कथितःपावकःशुचिः । तस्मादुदकपाणिभ्यां परिमृज्यात्कमण्डलुम् ॥ १३ ॥ पर्यग्निकरणंह्येतन्मनुराहप्रजापतिः । कृत्वाचावश्यकर्माणि आचामेच्छौचवित्तमः । इति ॥१४॥ प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत ॥१५॥ तूष्णीं साङ्गुष्ठं कृत्स्नग्रासंग्रसेत् ॥ १६ ॥ न च मुखशब्दं कुर्यात् ॥ १७ ॥ ऋतुकालाभिगामी स्यात् पर्ववर्जं स्वदारेषु ॥१८॥ अतिर्यगुपेयात्॥१९॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ २० ॥
भूमि पर बिछाकर उन पर मल मूत्र का त्याग करे ॥१०॥ दिन में उत्तर को और रात्रि में दक्षिण को मुख करके मल मूत्र त्याग करे। सन्ध्याओं के समय भी उत्तर को मुख कर मलमूत्र त्यागे ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥११॥ स्नातक पुरुषों के एक भीतरी और दूसरा ऊपरी वस्त्र नित्य ( प्रत्येक समय ) साथ रहे। दो यज्ञोपवीत धारण करे, एक बांस की छड़ी और जल सहित एक कमण्डलु भी साथ रक्खे ॥१२॥ जल में, हाथ में, और काष्ठ में पवित्र अग्नि व्याप्त कहा है तिस से जल सहित हाथों से कमण्डलु को शुद्ध करे ॥ १३ ॥ प्रजापति मनु जी ने इस कृत्य को पर्यग्निकरण कर्म कहा है। अवश्य कर्त्तव्य कर्मों को करने बाद शौच धर्म का तत्त्व जानने वाला ब्राह्मण आचमन कियाकरे ॥१४॥ पूर्व को मुख करके भोजन किया करे ॥ १५ ॥ मौन होके भोजन करे। अङ्गुष्ठ सहित पूरा ग्रास मुख में दिया करे ॥ १६ ॥ भोजन करते समय मुख से ( चप चप आदि ) शब्द न करे ॥ १७ ॥ अमावास्या अष्टमी पौर्णमासी चतुर्दशी इन पर्वतिथियों को छोड़ के ऋतु काल में अपनी विवाहिता पत्नी से संग करे ॥ १८ ॥ तिरछा होकर संग न करे किन्तु सीधा बैठ के करे ॥ १९ ॥ यहां श्लोक भी प्रमाण में कहते हैं कि ॥२०॥ जो पुरुष अपनी विवा-