अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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भाषार्थसंहिता ॥ ४९
ऽहोरात्रमपुवसेत् ॥ ५७ ॥ अश्वमेधावभृथं वा गच्छेत् ॥५८॥
व्रात्यस्तोमेन वा यजेद्वायजेत् ॥ ५६ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथातःस्नातकव्रतानि ॥१॥ स न किंचिद्याचेतान्त्यत्र रा-
जान्तेवासिभ्यः ॥२॥ क्षुधा परीतस्तु किंचिदेव याचेत कृतमकृतं
वा,क्षेत्रं गामजाविकमन्ततो हिरण्यं धान्यमन्नं वा,न तु स्ना-
तकः क्षुधाऽवसीदेदित्युपदेशः॥३॥ न मलिनवाससा सह संवसे-
त,न रजस्व Turn to: लया,नायोग्यया, नकुलं कुलं स्यात्॥४॥ वत्सतन्त्रीं-
विततान्नातिक्रामेत् ॥५॥ नोद्यन्तमादित्यं पश्येत् ॥ ६ ॥ ना-
स्तमयन्तम् ॥ ७ ॥ नाप्सु मूत्रपुरीषे कुर्यात् ॥ ८ ॥ न निष्ठीवे-
त् ॥ ६ ॥ परिवेष्टितशिरा भूमिमयज्ञियैस्तृणैरन्तर्धाय मूत्र-
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तीन दिन ( १२३ दिन ) एकान्त में भजन पूजन करता हुआ व्रत करे ॥५७॥
अथवा अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान के समय ब्राह्मणों की आज्ञा से सब
के साथ स्नान करके शुद्ध होता है ॥ ५८ ॥ अथवा व्रात्यस्तोम यज्ञ करे ॥ ५९॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
अब ब्रह्मचर्य व्रत को समाप्त कर गृहस्थ होने वाले स्नातक के लिये नि-
यम कहते हैं ॥१॥ वह स्नातक राजा और अपने शिष्यों से भिन्न अन्य किसी
से कुछ न मांगे ॥२॥ यदि क्षुधा से पीड़ित हो तो पकाया वा कच्चा थोड़ा अन्न
मांगलेवे । अन्त में यदि कुछ न मिले तो खेत-गौ-बकरी-भेड़, सुवर्ण धान्य
अन्न इत्यादि जो मिले मांग लेवे किन्तु भूखों मरता हुआ दुःख न भोगे यही
उस के लिये शास्त्र का उपदेश है ॥ ३ ॥ मलिन वस्त्रोंवाली, रजस्वला और
बाल्यावस्था की अयोग्य स्त्री के साथ सहवास ( संग ) न करे । नकुल को
कुल ऐसा व्यवहार करे ॥ ४ ॥ विस्तृत फैली हुई बछड़े की रस्सी को लांघकर
न निकले ॥ ५ ॥ उदय होते हुए सूर्य को न देखे ॥ ६ ॥ अस्त होते समय भी
सूर्य को न देखे ॥ ७ ॥ जल में मल मूत्र का त्याग न करे ॥ ८ ॥ जल में न थूके
॥ ९ ॥ शिर पर अंगोछा लपेट कर यज्ञ में काम न आनेवाले सूखे तृणों को