भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ४९

यस्तुपाणिगृहीताया आस्येकुर्वीतमैथुनम् । भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंरेतसोभुजः ॥ २१ ॥ यास्यादनित्यचारेण रतिःसाऽधर्मसंश्रिता ॥ २२ ॥ अपि च काठके विज्ञायते ॥२३॥ अपि नः श्वोविजनेष्यमा- णाः पतिभिः सह शयीरन्निति स्त्रीणामिन्द्रदत्तो वर इति ॥२४॥ न वृक्षमारेहेत् ॥२५॥ न कूपमवरोहेत् ॥२६॥ नाग्निं मुखेनो- पधमेत् ॥२७॥ नाग्निं ब्राह्मणं चान्तरेण व्यपेयात् ॥२८॥ ना- ग्न्योर्न ब्राह्मणयोरननुज्ञाप्य वा भार्य्यया सह नाश्नीयाद्वी- र्य्यवदपत्यं भवतीति वाजसनेयके विज्ञायते ॥ २९ ॥ नेन्द्र- धनुर्नाम्ना निर्द्दिशेत् ॥ ३० ॥ मणिधनुरिति ब्रूयात् ॥ ३१ ॥ पालाशमासनं पादुके दन्तधावनमिति वर्जयेत् ॥ ३२ ॥ नो- त्संगे भक्षयेन्न सन्ध्यायां भुञ्जीत ॥३३॥ वैणवं दण्डंधारयेद्रुक्म-


हित पत्नी के मुख में मैथुन करे उस के पितर उस एक महिने तक उस का वीर्य खाने वाले होते हैं ॥ २१ ॥ जो उपस्थेन्द्रिय से भिन्न अन्य मार्ग में रति करे वह अधर्म सम्बन्धी कर्म है ॥ २२ ॥ और भी वेद की कठ शाखा में लिखी श्रुति से जाना जाता है कि ॥ २३ ॥ कल बालक पैदा होगा और आज एक दिन पहिले स्त्रियां पतियों के साथ शयन करें यह स्त्रियों को इन्द्रदेवता ने वरदान दिया है ॥ २४ ॥ स्नातक गृहस्थ वृक्ष पर न चढ़े ॥ २५ ॥ कूप में न घुसे ॥ २६ अग्नि को मुख से न फूंके ॥ २७ ॥ अग्नि और ब्राह्मण को छोड़के वा अनादर करके कोई काम न करे ॥२८॥ स्वीकार कराये बिना अग्नियों और ब्राह्मणों के मध्य में पत्नी के साथ भोजन न करे। ऐसा करने से निर्बल पराक्रम हीन सन्तान होता है यह वाजसनेय श्रुति से जाना जाता है ॥ २९ ॥ इन्द्रधनुः ऐसा नाम लेकर किसी को न दिखावे ॥ ३० ॥ किन्तु उस को 'मणिधनुः' ऐसा कहे ॥ ३१ ॥ ढांक का लकड़ी का पट्टा चौकी, खड़ाऊं, और दातौन न बनावे ॥ ३२ ॥ गोदी में अन्न को धर के वा मातादि की गोदी में बैठकर तथा सन्ध्या के समय भोजन न करे ॥ ३३ ॥ बांस की छड़ी और सु-

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