भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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५० वसिष्ठस्मृतिः ॥

कुण्डले च ॥३४॥ न बहिर्मालां धारयेदन्यत्र रुक्ममय्याः३५ सभा समवायांश्च वर्जयेत् ॥ ३६ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥३७॥

अप्रामाण्यंचवेदानामार्षाणांचैवकुत्सनम् । अव्यवस्थाचसर्वत्र एतन्नाशनमात्मनः । इति ॥ ३८ ॥

नावृतो यज्ञं गच्छेत् ॥ ३९॥ यदि व्रजेत्प्रदक्षिणं पुनरा- व्रजेत् ॥४०॥ अधिवृक्षसूर्यमध्वानं न प्रतिपद्येत ॥४१॥ नावं च सांशयिकीं नाधिरोहेत् ॥४२॥ बाहुभ्यां न नदीं तरेत् ॥४३॥ उत्थायापररात्रमधीत्य न पुनः प्रतिसंविशेत् ॥४४॥ प्राजापत्ये मुहूर्त्ते ब्राह्मणः कांश्चिन्नियमाननुत्तिष्ठेदनुत्तिष्ठेदिति ॥४५॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

अथातः स्वाध्यायोपाकर्म्म श्रावण्यां पौर्णमास्यां प्रौष्ठ- पद्यां वाऽग्निमुपसमाधाय कृताधानो जुहोति देवेभ्य ऋषिभ्य-


वर्णके कुण्डल नित्य धारण करे ॥ ३४ ॥ सुवर्ण को छोड़कर अन्य पुष्पादि की माला बाहर केशादि में न धारण करे किन्तु कण्ठ में भले ही धारण करे ॥ ३५॥ मनुष्यों की सभादि भीड़ में न जावे ॥३६ ॥ यहां श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥ ३७ ॥ वेदों का प्रमाण न मानना, ऋषि प्रोक्त धर्मशास्त्रादि की निन्दा करना, किसी बात पर स्थिर न रहना ये आत्मा नाम अपने नाश के लक्षण हैं ॥३८॥ वरण किये विना किसी के यज्ञ में न जावे ॥३९॥ यदि जावे तो प्रदक्षिणा ( परिक्रमा ) करिके लौट आवे ॥ ४० ॥ वृक्ष पर चढ़ के सूर्य को न देखे और सूर्य के सामने मार्ग में न चले ॥ ४१ ॥ डूबने वा टूटने के सन्देह वाली नौका पर न चढ़े ॥ ४२ ॥ भुजाओं के द्वारा तर के नदी के पार न जावे वा नदी को न तरे ॥ ४३ ॥ आधी रात के पश्चात् उठ कर वेदादि का पाठ करके फिर न सोवे ॥ ४४ ॥ ब्राह्ममुहूर्त्त अर्थात् चार घड़ी रात रहे से ब्राह्मण किन्हीं शौच स्नान सन्ध्योपासनादि नियमों का अनुष्ठान अवश्य करे यह न बने तो किसी प्रकार प्रातःस्मरणादि ही करे ॥ ४५ ॥

यह वासिष्ठ धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में बारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

अब वेदाध्ययन के उपाकर्म का विचार दिखाते हैं । श्रावण वा भादों की पौर्णमासी को जिस ने अग्नियोंका विधि पूर्वक आधान किया हो वह पुरुष अपने सामने अग्नि को स्थापन करके आघारादि सामान्य विधि