अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 744, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें५४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
त्पतति ॥ १९॥ पतितोत्पन्नः पतितो भवतीत्याहुरन्यत्र स्त्रियाः ॥ २०॥ सा हि परगामिनी तामरिक्थामुपेयात् ॥ २१ ॥
गुरोर्गुरौसन्निहिते गुरुवद्वृत्तिरिष्यते ।
गुरुवद्गुरुपुत्रस्य वर्तितव्यमिति श्रुतिः ॥ २२ ॥
शस्त्रं विषं सुरा चाप्रतिग्राह्याणि ब्राह्मणस्य ॥ २३॥ विद्या वित्तं वयः संबन्धः कर्म च मान्यम् ॥२४॥ पूर्वः पूर्वो गरीयान् स्थविरबालातुरभारिकस्त्रीचक्रिवतां पन्थाः समागमे परस्मै देयः ॥ २५ ॥ राजस्नातकयोः समागमे राज्ञा स्नातकाय देयः ॥ २६ ॥ सर्वैरेव च वध्वा उह्यमानायै ॥ २७ ॥ तृणभूम्यम्बूदकवाक्सूनृतानसूयाः सतां गृहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन कदाचनेति ॥ २८ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
करावे तथा जो आचार्य वेद को न पढ़ावे उन दोनों को त्याग देना चाहिये। न त्यागे तो पतित हो जाता है ॥ १९ ॥ पतित से उत्पन्न हुआ भी पुत्री को छोड़ कर पतित होता है ऐसा ऋषि लोग कहते मानते हैं ॥ २० ॥ वह स्त्री पतित को प्राप्त हुई इस से उसके साथ के वस्त्राभूषणादि धन को त्याग के केवल कन्या को स्वीकार करे ॥ २१ ॥ गुरु के गुरु भी समीपस्थ हों तो उन के साथ गुरु कासा बर्त्ताव करे और गुरुपुत्र के साथ भी गुरु के तुल्य बर्त्ताव करे ॥ २२ ॥ शस्त्र, विष और मद्य इन को ब्राह्मण दान में न लेवे ॥ २३ ॥ विद्या, कर्म, अवस्था, कुटुम्ब, और धन ये पांच मान्य के स्थान हैं ॥ २४ ॥ इन में पर २ की अपेक्षा पूर्व २ को अधिक मान्य करे। वृद्ध, बालक, रोगी, बोझावाला, स्त्री और गाड़ीवाला इन का समागम होने पर पिछले २ के लिये रास्ता देना चाहिये ॥ २५ ॥ राजा और स्नातक के समागम में राजा स्नातक के लिये मार्ग छोड़े ॥ २६ ॥ तत्काल विवाह हो कर आई बहू के लिये सभी वृद्धादि मार्ग छोड़ें ॥ २७॥ कुशासन या चटाई, भूमि, अग्नि, जल, कोमल वाणी, निन्दा का त्याग, सत्पुरुषों के घर में इन आसनादि मिलने का कदापि अभाव नहीं होता अर्थात् जिन के घर पर आये हुये का आसनादि मिलने द्वारा अवश्य सत्कार हो, वे ही सत्पुरुष हैं ॥ २८ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥