भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 745

भाषार्थसहिता ॥ ५५

अथातो भोज्याभोज्यं च वर्णयिष्यामः ॥१॥ चिकित्सक- मृगयुपुंश्चलोदण्डिकस्तेनाभिशस्तषण्डपतितानामन्नमभो- ज्यम् ॥ २ ॥ कदर्यदीक्षितबद्धातुरसोमविक्रयितक्षकरजक- शौण्डिकसूचकवार्धुषिकचर्मावकृत्तानां शूद्रस्य चास्त्रभृत स्त्रीष्वपतेर्यश्चोपपतिं मन्यते, यश्च गृहान्दहेत् यश्च वधार्हं नोपहन्द्यात्, को भक्षयत इति ॥ ३ ॥ वाचाभिघुष्टं गणान्नं गणिकान्नं चेति ॥४॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५ ॥ नाश्नन्ति श्ववतोदेवा नाश्नन्तिवृषलीपतेः । भार्याजितस्यनाश्नन्ति यस्यचोपपतिर्गृहे । इति ॥ ६ ॥ एधोदकयवसकुशलाजाभ्युद्यतयानावसथसफरीप्रियङ्गु स्रगन्धमधुमांसानीत्येतेषां प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७ ॥ अथाप्यु- दाहरन्ति ॥ ८ ॥


अब इस चौदहवें अध्याय में भक्ष्याभक्ष का विचार दिखाते हैं ॥१॥ वैद्य, व्याधा, व्यभिचारिणी स्त्री, लाठी आदि से पशु हत्या करने वाला, चोर, निन्दित, नपुंसक और पतित इन सबका अन्न अभक्ष्य है ॥ २ ॥ कंजूस, दीक्षित, कदी, रोगी, सोम बेंचने वाला, बढ़ई, धोबी, मद्य बनाने बेंचने वाला कलवार, चुगल, ब्याज लेनेवाला-सूदखोर, शूद्र, अस्त्रधारी, जो अन्य जीवित पुरुष की पत्नी से संग करता हो, जो अपनी स्त्री के जार को मानता ( स्वीकार करता ) हो, जो घरों में आग लगावे, और जो वध करने योग्य को न मारडाले, इन का अन्न कोई न खावे ॥ ३ ॥ वाणी से निन्दित, चन्दा का, और वेश्या का अन्न भी अभक्ष्य है ॥४॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥५॥ कुत्ता पालने वाले, वेश्यागामी, स्त्री की आज्ञा में चलने वाले, अर्थात् जिनको स्त्री ने जीत लिया हो और जिस की स्त्री का दूसरा पति जार पुरुष हो इन सब के होमादि को देवता लोग ग्रहण नहीं करते ॥ ६ ॥ ईंधन, जल, भूसा, कुश, धान वा खीलें, नये बने हुए-सवारी, घर, मछली, कंगुनी, माला, चांवल, शहद, और मांस इन पदार्थों को वैद्यादि निन्दितों सेभी लेलेवे ॥७॥ इस विषय में श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥८॥ माता पितादि मान्य और स्त्री पुत्रादि दुःखित हों तो उन के निर्वाहार्थ और देवता तथा अतिथियों के